विधानसभा में हंगामा

सदन जनता के हित के मुद्दों पर चर्चा करने की जगह है, न कि जानबूझकर हंगामा करने की। विपक्षी पार्टियों ने उत्तर प्रदेश सरsanjay sharma editor5कार पर बिगड़ती कानून व्यवस्था, गन्ना किसानों के बकाए आदि मुद्दों को लेकर हमला किया। यह सच है कि प्रदेश में आपराधिक घटनाएं बढ़ी हैं। लचर कानून व्यवस्था की वजह से महिला हिंसा में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन सदन में हंगामा करने से क्या इस मामले का हल निकल जाएगा।

संसद के मानसून सत्र समाप्त होने के साथ कांग्रेस का हंगामा खत्म तो यूपी के विधानसभा के मानसून सत्र में हंगामा शुरू हो गया। उत्तर प्रदेश के विधानसभा के मानसून सत्र की शुरुआत हंगामेदार रही। विधानसभा के दूसरे दिन सदन को दो बार स्थगित करना पड़ा। विपक्षी पार्टियों ने तो पहले से ऐलान कर रखा था कि सदन चलने नहीं देंगे। कुछ दिनों पहले संसद का मानसून सत्र बिना किसी सार्थकता के समाप्त हो गया। कांग्रेस के हंगामे की वजह से न किसी मुद्दे पर चर्चा हो सकी और न ही कोई बिल पास हो सका। संसद न चलना किसी भी लोकतंत्र के लिए काला धब्बा है। ससंद में जो दृश्य था वही दृश्य अब विधानसभा में देखने को मिल रहा है।
सदन जनता के हित के मुद्दों पर चर्चा करने की जगह है, न कि जानबूझकर हंगामा करने की। विपक्षी पार्टियों ने उत्तर प्रदेश सरकार पर बिगड़ती कानून व्यवस्था, गन्ना किसानों के बकाए आदि मुद्दों को लेकर हमला किया। यह सच है कि प्रदेश में आपराधिक घटनाएं बढ़ी हैं। लचर कानून व्यवस्था की वजह से महिला हिंसा में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन सदन में हंगामा करने से क्या इस मामले का हल निकल जाएगा। किसी भी समस्या का समाधान हंगामा करने से नहीं बल्कि सकारात्मक तरीके से बहस व चर्चा करने से निकलता है। पर इससे हमारे देश के नेताओं को कोई सरोकार नहीं है।
चर्चा में बने रहने के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं। उन्हें जनता के हित से कोई सरोकार नहीं है। विधायकों और सांसदों को इससे मतलब नहीं कि सदन की कार्यवाही में कितने पैसे की बर्बादी हो रही है। अब तो अक्सर सदन की कार्यवाही प्रभावित की जाती है। जिस तरीके से सदन की कार्यवाही प्रभावित हो रही है वह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। यदि ऐसे ही सदन का कीमती वक्त हंगामे में गुजर जाएगा तो जनता के हित में तो कोई फैसला हो ही नहीं पाएगा। यह विडंबना ही है कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार होने के बाद भी सदन का कार्य प्रभावित हो रहा है।
जन प्रतिनिधियों के इस व्यवहार से न सिर्फ सदन की गरिमा और गंभीरता खत्म होती बल्कि हंगामा करने वाले नेताओं के कारण जनता में सरकार और के प्रति अविश्वास पैदा भी होता है। सदन में बैठे नेताओं के लिये यही हितकर होगा कि वह तर्कसंगत और जनहित से जुड़े मुद्ïदों पर सकारात्मक बात करें न कि बिना बात के हंगामा।

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