विजय माल्या मामला बैंकिंग तंत्र के लिए सबक

नीरज कुमार दुबे
कई बैंकों की ओर से इरादतन डिफाल्टर घोषित किये जा चुके उद्योगपति विजया माल्या आखिरकार कानून को धता बताते हुए देश से बाहर जाने में सफल हो गये। बैंकों के कंसोर्टियम ने माल्या को शीर्ष अदालत में पेश होने और उनके पासपोर्ट पर रोक लगाने का निर्देश जारी किये जाने की मांग करते हुए उच्चतम न्यायालय में जब याचिका दायर की तो मामले पर सुनवाई के समय अटार्नी जनरल ने सीबीआई से प्राप्त सूचना का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि माल्या देश छोडक़र जा चुके हैं। न्यायालय ने इस मामले में बैंकों से सही सवाल किया कि जब माल्या पहले ही ऋण संबंधी उल्लंघनकर्ता थे और अदालत में सुनवाई का सामना कर रहे थे तो उन्हें फिर ऋण क्यों दिया गया। अदालत ने माल्या तक उनके ईमेल पते, लंदन में भारतीय उच्चायोग और उनके वकील के माध्यम से नोटिस पहुंचाने और कोर्ट में पेश होने को कहा है लेकिन पूर्व के उदाहरणों को देखें तो माल्या शायद ही आसानी से लौटेंगे। हालांकि उन्होंने बैंकों से जो ऋण लिया उससे कहीं ज्यादा संपत्ति उनकी विदेश में है लेकिन देखना होगा कि सरकार कैसे बैंकों को उनकी कर्ज वसूली में सहायता कर पाती है।
बैंकों का हजारों करोड़ रुपए का कर्ज किस तरह माल्या ने अय्याशी में उड़ाया है यह किसी से छिपा नहीं है। वाकई यह देश का दुर्भाग्य है कि जहाँ एक किसान साहूकार या बैंक से लिये मात्र कुछ हजार रुपए की कर्ज की अदायगी नहीं कर पाने के चलते आत्महत्या जैसा कदम उठाने तक मजबूर हो जाता है, जहाँ आम आदमी से कार लोन या गृह लोन की तीन किस्तें लगातार नहीं आने पर बैंक कार या घर पर कब्जा करने पर उतारू हो जाते हैं, जहाँ पर्सनल लोन लेने वाले जरूरतमंद व्यक्ति द्वारा एक भी किस्त समय पर नहीं दिये जाने पर खुलेआम बाउंसर भेज दिये जाते हैं यहां विजय माल्या के मामले में बैंकों ने नरमी बरतने की हद कर चौंकाया है। माल्या को लगातार डिफाल्ट करते रहने के बावजूद जिस प्रकार ऋण मिलता गया वह चौंकाता है क्योंकि जब आम आदमी कार या गृह लोन के लिए किसी सरकारी बैंक के पास आवेदन देता है तो उसके तरह तरह के रिकॉर्ड जांचे जाते हैं, सिबिल स्कोर जांचा जाता है और विभिन्न दस्तावेजों की माँग कर उसे परेशान किया जाता है जिससे उसे निजी बैंकों की ओर बढ़ी ब्याज दर के बावजूद रुख करना पड़ता है। इसी प्रकार यदि किसी लघु या मध्यम इकाई को किसी सरकारी बैंक से अपने विस्तार के लिए या ऋण के पुनर्गठन के लिए आवेदन स्वीकृत कराना हो तो उससे तरह तरह के एनओसी माँग कर फाइल को लंबे समय तक लटकाये रखा जाता है।
हाल ही में पेश केंद्रीय बजट के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ऐलान किया था कि सरकार सार्वजनिक बैंकों के सुदृढ़ीकरण के लिए रूपरेखा पेश करेगी और उसकी इन बैंकों में नये वित्त वर्ष में 25 हजार करोड़ रुपए डालने की योजना है। एक ओर तो सरकार नये टैक्स लगाकर या टैक्स का दायरा बढ़ाकर आम जनता से पैसे वसूल कर इन बैंकों का खजाना भर रही है दूसरी ओर यह बैंक कुछ ‘विलफुल डिफाल्टरों’ के आगे नतमस्तक होकर बड़ी पूंजी को आसानी से स्वाहा होने दे रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा था कि कर्ज लिया है तो चुकाना ही पड़ेगा और जनता के धन की बर्बादी नहीं होने दी जा सकती, माल्या का मामला उक्त आदेश की सरासर अवमानना है।
उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में बैंकों के वसूल नहीं हो रहे कर्ज की राशि बढऩे पर गहरी चिंता जताते हुए भारतीय रिजर्व बैंक को उन कंपनियों की सूची उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था जिन पर 500 करोड़ रुपये से अधिक का बैंक कर्ज बकाया है और वे उसे नहीं चुका रही हैं। शीर्ष अदालत ने आरबीआई से ऐसी कंपनियों की सूची भी पेश करने को कहा है, जिनके कर्ज को कंपनी ऋण पुनर्गठन योजना के तहत पुनर्गठित किया गया है। न्यायालय की ओर से यह चिंता जायज थी कि बैंक और वित्तीय संस्थानों ने किस प्रकार से उचित दिशा-निर्देशों का पालन किए बिना इतनी बड़ी राशि कर्ज में दे दी। इस मामले में याचिका एक गैर-सरकारी संगठन ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटेरेस्ट लिटिगेशन’ (सीपीआईएल) की ओर से प्रशांत भूषण ने दायर की है। याचिका में आरोप लगाया है कि करीब 40,000 करोड़ रुपये का ऋण 2015 में बट्टे खाते में डाल दिया गया।
फिलहाल दिसंबर तिमाही के नतीजों से ही बैंकों की खस्ता हालत बयां हो जाती है। 8 सरकारी बैंकों का घाटा 10000 करोड़ रुपये के पार चला गया है और किसी तिमाही में अब तक का ये सबसे ज्यादा घाटा है। वहीं तिमाही में सरकारी बैंकों का कुल एनपीए 1.5 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। दरअसल आरबीआई ने सरकारी बैंकों को खाते में एनपीए और संभावित एनपीए हटाने को कहा है, इसके बाद ही बैंकों की ये हालत सामने आई है। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों से उम्मीद जताई है कि वह 2017 तक कर्ज में फंसी राशि वसूल सकने में समर्थ होंगे। बैंकों की खस्ता हालत के लिए बड़ी कंपनियां ही नहीं राजनीति भी जिम्मेदार है क्योंकि कई बार सरकारों की ओर से ऐसी लोकप्रिय योजनाएँ लागू कर दी जाती हैं जिनमें जनता के ही पैसे का ज्यादा इस्तेमाल होता है।
विजय माल्या का मामला देश के बैंकिंग तंत्र को बड़ा सबक है कि कैसे कोई व्यक्ति सरकार और बैंकों को अपनी कंपनी की पुनरुद्धार योजना को लेकर लगातार भ्रमित करता रहा। एक तरफ माल्या बैंकों से लगातार पूंजी हासिल करते रहे दूसरी ओर अपने कर्मचारियों को महीनों तक तनख्वाह नहीं देकर उन्हें कड़ी मानिसक प्रताडऩा झेलने पर मजबूर किया। बैंकों की ओर से एकदम अंतिम समय पर माल्या को विदेश जाने से रोकने की याचिका देना भी चौंकाता है, ईडी की ओर से भी बहुत देर से कार्रवाई शुरू की गई, जबकि ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई बहुत पहले हो जानी चाहिए थी। पता नहीं क्या कारण है कि छोटे बड़े कर्जदारों की सूची होने के बावजूद बैंक बड़ा साम्राज्य चला रहे लोगों पर हाथ नहीं डालते जबकि आम आदमी से पैसे वसूलने के लिए उनके पास अच्छा खासा तंत्र है।

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