विकास के मुद्दे को कैसे अनदेखा कर देगा बिहार?

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
निर्वाचकों का दायरा जितना छोटा होता जाता है उतना ही उन तत्वों का प्रभाव बढ़ता जाता है जिसे हम भ्रष्ट मानते हैं। जाति, सम्प्रदाय नशीले पदार्थों का उपयोग, धन का वितरण तो आम बात हो चुकी है। जाति और संप्रदाय में भी विभक्तियां हो जाती हैं। विधान सभाओं के जो निर्वाचन इस और अगले वर्ष होने वाले हैं, विशेषकर, बिहार और उत्तर प्रदेश जब उनकी संभावनाओं का अनुमान लगाया जाता है तो संभवत: उन्हीं कारणों से उसमें जातीय समीकरण को सबसे अधिक प्रभावकारी माना जाता है। लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने विकास को मुख्य मुद्दा बनाया था। यह मुद्दा सभी प्रकार की उन विभक्तियों पर हावी हो गया था जो लोकतंत्र को भ्रष्ट करती हैं। लोकसभा चुनावों के बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी ने इसी को मुद्दा बनाया था और आगे आने वाले विधानसभा चुनाव में भी उसका यही मुद्दा बना रहने वाला है।
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच यदि सामंजस्य बैठ गया तो यह माना जा रहा है कि उससे जो जातीय और सांप्रदायिक धु्रवीकरण होगा, वह भाजपा के विकास के मुद्दे पर भारी पड़ेगा। इस आकलन में वस्तुस्थिति के संज्ञान की पैठ कितनी है, यह तो चुनाव परिणाम आने पर पता चलेगा, लेकिन इस समय देश को जो माहौल है, उससे यह स्पष्ट होता है कि लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने विकास के जिस मुद्दे को केंद्र बनाया था, अब कोई भी चुनाव हो-पंचायत से लेकर लोकसभा तक-विकास के मुद्दे की अवहेलना नहीं की जा सकती।
जहां केंद्रीय सरकार विकास की योजनाओं को गतिशील बनाने और विपक्ष पर संसद को ठप कर उनमें बाधा डालने का आरोप लगा रही हैं, वहीं प्राय: प्रत्येक राज्य केंद्र से और अधिक विकास के लिए सहायता की अपेक्षा प्रकट कर रही है तथा जहां वह विकास कार्यों में पिछड़ रही है-जैसे उत्तर प्रदेश-तो उसका ठीकरा केंद्रीय सरकार के सिर पर फोडऩे का कोई अवसर जाने नहीं देती। उसका आरोप है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों ही इस राज्य से हैं तथा सबसे अधिक सांसद चुनाव कर जो उत्तर प्रदेश देश को राजनीतिक दिशा प्रदान करता है, उसकी बदले की भावना से सबसे ज्यादा उपेक्षा हो रही है। जिस तरह से केंद्रीय उपेक्षा का ढोल पीटना शुरू हो गया वह अमला चुनाव आने तक इतना कनफोड़वा हो जायेगा कि लोगों को ढोल में पोल अपने आप समझ में आने लगेगा। क्योंकि केवल अनुबंध के मसविरे पर सहमति या फिर अपने ही आवास पर प्रतिदिन शिलारोपड़ में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी पीछे छोड़ देने की हकीकत से लोगों को अब गुमराह कर पाना संभव नहीं होगा।
जातीयता और सांप्रदायिकता के धु्रवीकरण के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश की ‘ख्याति’ बहुत पुरानी है। भारत विभाजन को इन दोनों राज्यों में हुए सांप्रदायिक धु्रवीकरण ने अंजाम दिया है और गरीबों, मजदूरों के आंदोलनों को साम्यवाद या समाजवाद के नाम पर इन दोनों ही राज्यों में जातीय धु्रवीकरण में पूर्णत: परिवर्तित किया जा चुका है। साम्यवादी अस्तित्व तो अब कार्यालय के नाम तक ही सीमित रह गया है, लेकिन समाजवादी का बिहार और उत्तर प्रदेश में-नग्न स्वरूप-जातिवाद से भी संकुचित होकर परिवार तक सीमित हो गया है उसने इन ‘क्रांतिकारी’ पहचान के नामों की स्मृति भी शेष नहीं रहने दी है। बिहार में लालू यादव की राजनीति अब बेटे-बेटियों में सिमट गई है, पत्नी राबड़ी देवी को दस वर्ष तक ‘मुख्यमंत्री’ बनाए रखने की सफलता के बाद चारा घोटाला कांड में दंडित होकर कोई भी चुनाव लडऩे के अयोग्य हो चुकने के बाद उनको यदि फिर से कहीं से रोशनी नजर आ रही है तो अपने ‘जंगलराज’ के खिलाफ सबसे सशक्त आवाज उठाने वाले नीतीश कुमार का सत्ता में लौटने का आकलन कर उनके और कांग्रेस के साथ प्रस्तावित गठबंधन से मतों के धु्रवीकरण में।
‘समाजवादी’ मुलायम सिंह यादव अपने पुत्र को विरासत सौंपने और संसद में परिवार भर तक सीमित हो जाने के बावजूद लालू और नीतीश पर दूर से इसलिए हाथ रखे हुए हैं क्योंकि उन्हें उत्तर प्रदेश में इस बार भाजपा से ही खतरा है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश से 73 (दो अपना दल सहित) सीटें जीतकर जो स्थान बनाया था उससे ग्रसित होने से बचने के लिए व भाजपा के विजय रथ को बिहार में रोकने के प्रति आशान्वित हैं। जिस मंडलवाद से उभार पाकर सत्ता में आने का इन्हें अवसर मिला था, जातिगत जनगणना के आंकड़े प्रकाशित करने के रूप में उसका पुन: लाभ पाने की अपेक्षा पूरी हो सकती थी, यदि मंडल आयोग की संस्तुति के अनुरूप अपने शासन के दौरान काम किया होता। आचरण में पहले जाति को प्रधानता प्रदान की और अब वह परिवार में सीमित हो गया है।
भारतीय जनता पार्टी को इन नारों का सहारा लेने वाले नहीं रोक सकते क्योंकि नकाब के पीछे का चेहरा सामने आ गया है। भाजपा का विजय रथ रुक सकता है तो भाजपा द्वारा ही। यदि वह स्थानीय परिस्थिति और विकास का अभिलाषा में सामंजस्य नहीं बैठा पायी। लालू यादव ने नीतीश कुमार को समर्थन देना ‘विषपान’ के समान माना है तो नीतीश ने भी उन्हें ‘भुजंग’ भाई जान बना दिया है। सार्वजनिक रूप से गलबहियां करने वाले इन लोगों के मन में क्या है, यह अपने आप फूट पड़ रहा है।

Pin It