विकास की गति तेज करने को मोदी सरकार के लिए अब कड़े फैसलों का वक्त

ओंकार चौधरी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार ऐसे समय किया है। जब उनकी सरकार ने हाल में दो साल पूरे किए हैं। अपने एजेंडे में विकास और सुरक्षा को सर्वोच्च स्थान पर रखने वाले मोदी की सरकार पर उन वादों को पूरा करने का दबाव है, जो उसने लोगों से किए हैं। प्रधानमंत्री विकास के एजेंडे पर तेजी से बढऩा चाहते हैं। इसके लिए ऐसी टीम की जरूरत हैए जो उनके इरादों को मूर्त रूप दे सके। मंत्रियों के काम-काज, सरकार की दिशा और नीतियों के नतीजों का आकलन करने का यह सही समय है। जो उन्होंने हाल में किया भी है।
जिन मंत्रियों का प्रदर्शन सही नहीं रहा। उनसे प्रधानमंत्री ने मुक्ति पा ली। मोदी ने सिर्फ प्रकाश जावडेकर को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर यह बताया है कि जो विकास को गति देने में सहायक होगा। उसे सम्मान देने से वे पीछे नहीं हटेंगे। माना जा रहा है कि बहुत सी विकास परियोजनाओं को बहुत कम से समय में जावड़ेकर ने क्लीयरेंस दिलाकर मोदी का दिल जीत लिया है। आमतौर पर इससे पूर्व पर्यावरण मंत्रालय परियोजनाओं में अडंगेबाजी के लिए बदनाम रहा है।
जब भी विस्तार अथवा फेरबदल होते हैंए तब पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पर कई तरह के दबाव रहते हैं। अगर गठबंधन सरकार हैए तब हालात और पेचीदा हो जाते हैं परन्तु नरेन्द्र मोदी ने सरकार चलाने, फैसले लेने और मंत्रीमंडल गठन के तौर तरीके बहुत हद तक बदले हैं। आपको याद होगा। मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के गठन के वक्त किस तरह डीएमके ए राजा को दूरसंचार महकमा दिलाने पर अड़ गई थी। सरकार बनाने और बचाने के लिए अंततरू उन्हें यह करना पड़ा। वैसी ही हिमाकत मोदी सरकार के गठन के वक्त शिवसेना ने की थी।
उद्धव ठाकरे दो कैबिनेट मंत्री चाहते थे, परन्तु प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया कि यह सहयोगी पार्टियां नहीं, वह तय करेंगे। शिवसेना इस बार भी इस उम्मीद से थी कि मोदी पार्टी को कैबिनेट मंत्री का दूसरा पद दे देंगे परन्तु उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इसकी बहुत हद तक एक वजह शिव सेना की तरफ से आए दिन मोदी के खिलाफ की गई बयानबाजी भी रही है। मोदी ने कुछ कड़े फैसले लेकर साफ संकेत दिए हैं। एक ही झटके में आधा दर्जन मंत्रियों की छुट्टी करके उन्होंने बताया है कि अगर विकास की गति नहीं बढ़ा सकते हैं तो अपने घर बैठिए।
विस्तार से पहले उन्होंने कहा भी कि जो मंत्री बनने जा रहे हैं, वह चुनावी मजबूरियों के चलते नहीं, काबिलियत के मद्देनजर बनाए जा रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि गुजरात में पाटीदार आंदोलन के प्रभाव को खत्म करने और उत्तर प्रदेश में मायावती के दलित कार्ड को कुंद करने की मंशा से कई चेहरे शामिल किए गए हैं। अगले डेढ़ साल में उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब और कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हैं। यूपी के चुनाव को 2019 के आम चुनाव से पहले भाजपा के लिए सेमीफाइनल माना जा रहा है। दो साल पहले 2014 में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ सपाए विपक्षी दलों बसपा और कांग्रेस का सफाया करते हुए 80 में से 72 सीटों पर जीत दर्ज की थीं। दिल्ली और बिहार में नाकामी के बाद मोदी की अगुवाई में भाजपा ने पूवरेत्तर के अहम राज्य असम में ऐतिहासिक जीत की है परन्तु उत्तर प्रदेश में फिर से सरकार गठित करने का उसका सपना अभी अधूरा है। मोदी और अमित शाह के सामने यह चुनौती है कि वे 2014 जैसा प्रदर्शन दोहराकर इस सबसे बड़े राज्य की सत्ता पर भी काबिज हों। इसके लिए सोशल इंजीनियरिंग जरूरी थी, जो उन्होंने की है।
अब मोदी सरकार में उन सहित चौदह मंत्री उत्तर प्रदेश से हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सही है कि भारत पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट कर रहा है। इसकी वजह मंदी के दौर में भी उसकी अर्थव्यवस्था और विकास दर में तेजी है। पिछले दो साल में नरेन्द्र मोदी ने विश्व के कई देशों के दौरे कर विदेशी पूंजी निवेश को आकर्षित करने के हर संभव प्रयास किए हैं। भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में सुधरी है। विश्व बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों ने भारत की साख को लेकर बड़े सकारात्मक बयान दिए हैं।
इस सबकी मोटी वजह यही मानी जा रही है कि मोदी सरकार ने आर्थिक सुधारों के मोर्चे पर जहां तेजी से कदम बढ़ाए हैं, वहीं फैसले लेने में बेवजह वक्त जाया करने की सरकारी लालफीताशाही से सिस्टम को बाहर निकाला है। पहली सरकारों के मंत्री क्लीयरेंस को लेकर आपस में मुकदमेबाजी तक में उलझे हुए थे जबकि मोदी सरकार के मंत्रियों ने एक टीम की तरह काम करने की संस्कृति विकसित कर ली है। प्रधानमंत्री जानते हैं कि उनकी सरकार पर साठ महीने के भीतर लोगों की उम्मीदों को पूरा करने की पहाड़ सरीखी चुनौती है। उन्हें न केवल आर्थिक मोर्चे पर बहुत बेहतर प्रदर्शन करना होगा बल्कि रोजगार सृजन के तौर तरीके खोजकर उन युवाओं के हाथों को काम उपलब्ध कराना होगा, जिन्होंने बहुत उम्मीदों से उन्हें देश की बागडोर सौंपी थी। अभी तो अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर विस्वभर से तारीफें मिल रही हैं, परन्तु विकास दर को दस फीसदी के पार ले जाने और वित्तीय घाटे को तीन फीसदी से नीचे लाने के लिए उन्हें कठोर कदम उठाने होंगे।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के ऐसे उपुक्रमों से तौबा करनी होगी, जो निरंतर घाटे में चल रहे हैं। कृषि क्षेत्र में जान फूंकने के लिए हालांकि कुछ प्रयास किए हैं परन्तु खेती बाड़ी में आधुनिक और नए विचारों के समावेश के लिए खास प्रयास करने होंगे। जब तक कृषि क्षेत्र को लेकर सरकार नया रवैया नहीं अपनाएगी, तब तक अन्नदाता की हालत नहीं सुधरेगी। आंध्र, पंजाब और विदर्भ से किसानों के जान देने की अशुभ सूचनाएं मिलती रहेंगी, जिनसे देश की छवि पर भी बुरा असर पड़ रहा है। मोदी सरकार के सामने आंतरिक और बाह्य सुरक्षा गंभीर चुनौती बनी हुई है। माओवाद की समस्या जस की तस बनी हुई है तो जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ और वारदातों को लेकर गृह मंत्रालय से लेकर सीमा सुरक्षा बल और केन्द्रीय रिर्जव पुलिस बल तक सवालों के घेरे में है। शहरों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। हालांकि सरकार ने सौ शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना शुरू कर दी है परन्तु बढ़ती आबादी ने शहरों को नर्क में तब्दील कर दिया है। शहरों को रहने लायक बनाना उनकी सरकार की एक और अहम चुनौती है। हाल के विधानसभा चुनावों से निश्चित ही भाजपा नेतृत्व और मोदी के आत्मविश्वास में बढोत्तरी की है। दिल्ली और बिहार के झटके से कुछ सवाल उठे थे जिनका जवाब केरल, पश्चिम बंगाल में बढ़े जनाधार और असम में बनी सरकार ने बहुत हद तक दे दिए हैं परन्तु भाजपा के लिए अब असली चुनौती उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों के चुनाव होंगे। जीएसटी बिल पर मानसून सत्र में संसद की मुहर लगवाना भी बहुत बड़ी चुनौती होगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि उन्नीस नए चेहरों के साथ अब मोदी सरकार तेजी से फैसले लेकर जनकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में तेजी से कदम बढाएगी।

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