वाह रे राजधानी पुलिस… महानगर क्षेत्र से चोरी वाहन को हजरतगंज से ढूंढने में लगा दिए दो साल

  • वाहन समन्वय सॉफ्टवेयर में पुलिस की लापरवाही हुई उजागर
  • चोरी की गाडिय़ां खोजने की बजाय फाइनल रिपोर्ट लगाने में माहिर है पुलिसकेस बंद होने के बाद मिल रहे वाहन

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। आपकी गाढ़ी कमाई से खरीदे गए वाहनों की चोरी होने के बाद पुलिस उसे ढूंढना तो दूर, उसकी रिपोर्ट दर्ज करना भी मुनासिब नहीं समझती है। वाहन स्वामियों को चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पुलिस से काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। यदि किसी तरह रिपोर्ट दर्ज हो भी जाती है, तो विवेचक चोरी गए वाहन को खोजने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं। थाने में आया केस रफा-दफा करने की नीयत से कुछ दिन बाद फाइनल रिपोर्ट लगा देते हैं। इस बात का खुलासा ‘वाहन समन्वय सॉफ्टवेयर’ से हुआ है, जिसकी मदद से शहर के कई थानों में खड़े चोरी के वाहनों को उनके मालिकों के हवाले किया गया है।
थानों में तैनात अधिकांश विवेचक (दरोगा) चोरी के वाहनों को ढूंढने की बजाय उसकी फाइनल रिपोर्ट लगाने और अपना पीछा छुड़ाने में ही समझदारी समझते हैं। इसी वजह से चोरी के वाहन कुछ दिनों बाद शहर के अन्य थाना क्षेत्रों में मिलते हैं, तो उन्हें थानों में खड़ा करवा दिया जाता है। जहां ऐसी सैकड़ों गाडिय़ां धूल फांक रही हैं। पुलिस की लापरवाही के कारण थानों में खड़े वाहन कुछ ही महीनों बाद सडऩे लगते हैं। आखिरकार थानेदार ऐसी गाडिय़ों को कूड़ा बताकर नीलामी करवाने में जुट जाते हैं। ऐसे ही वाहनों की जानकारी ‘वाहन समन्वय सॉफ्टवेयर’ में उजागर हुई है, जिसकी वजह से पुलिस महकमे की कारगुजारियां सबके सामने आ रही हैं।
केस नं. एक-
महानगर कारपोरेशन फ्लैट निवासी सुषमा त्रिपाठी की मारूति-800 यूपी-32 एक्स 1359 एक मार्च 2014 को घर के बाहर से चोरी हो गई थी। सुषमा त्रिपाठी ने बताया कि पहले तो महानगर पुलिस वाहन चोरी की रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी करती रही। तीन दिन तक थाने का चक्कर लगवाने के बाद रिपोर्ट दर्ज की गई लेकिन दरोगा ने गाड़ी ढूंढने की बजाय गाड़ी मिलने पर फोन से सूचना देने की बात कहकर टरका दिया। उन्होंने बताया कि घटना के करीब चार माह बाद विवेचक दरोगा उनके घर पहुंचा और गाड़ी नहीं मिलने की जानकारी देते हुए फाइनल रिपोर्ट लगाने की बात कहने लगा। जबकि कुछ दिन पहले हजरतगंज थाने से उन्हें सूचना दी गयी थी कि उनका वाहन हजरतगंज में खड़ा है। वहां पहुंचने पर पता चला कि वाहन 31 मार्च 2014 से हजरतगंज थाने में लावारिस हालत में खड़ा है। यह जानकर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उन्होंने पुलिस को उसकी लापरवाही पर खूब खरी-खोटी सुनाई।
केस नं. दो-
लखनऊ विश्वविद्यालय में कार्यरत चौक निवासी विजय कुमार सक्सेना ने बताया कि उनकी मोटरसाईकिल यूपी-32 एक्यू-8289 चौक थाना क्षेत्र से 27 मई 2010 को चोरी हो गयी थी। पुलिस ने करीब एक हफ्ते बाद बाइक चोरी की रिपोर्ट दर्ज की। विवेचक (दरोगा) ने तीन माह बाद मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी। इसके बाद 30 जून को एसएसपी आफिस से जानकारी दी गई कि उनकी गाड़ी अमीनाबाद थाने में खड़ी है। मौके पर पहुंचकर उसकी पहचान कर लें। जब विजय कुमार सक्सेना थाने पहुंचे तो पता चला कि वहां उनकी गाड़ी 12 अक्टूबर 2010 से खड़ी है। पुलिस की लापरवाही के खिलाफ विजय कुमार ने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि नाकारा पुलिस कर्मियों की वजह से उनकी गाड़ी पिछले छह साल से थाने में खड़ी धूल फांक रही थी। जबकि जिस वक्त गाड़ी चोरी हुई थी चालू हालत में थी। इस समय गाड़ी बिल्कुल ही कबाड़ हो गई है। अब समझ में नहीं आ रहा कि गाड़ी का क्या करें।
वाहन चोरी होने पर खंगालें शहर के थाने
एसएसपी मंजिल सैनी ने ‘वाहन समन्वय सॉफ्टवेयर’ के माध्यम से थाने में खड़े 19 लावारिस वाहनों को उनके स्वामियों को सौंपा। डीसीआरबी प्रभारी चन्द्र प्रकाश सिंह ने बताया कि शहर के विभिन्न थाने में लगभग 630 लावारिस वाहन खड़े हैं, जिसमें 553 दो पहिया, 65 चार पहिया व 11 अन्य वाहन शामिल हैं।
फिलहाल नये सॉफ्यवेयर का इतना लाभ अवश्य हुआ कि जिन लोगों की गाडिय़ां चोरी हुई हैं, उन लोगों ने अन्य थानों में जाकर अपनी गाडिय़ों की तलाश शुरू कर दी है। ऐसे में शायद उनकी गाड़ी मिल जाये। यदि पुलिस के भरोसे रहे तो गाड़ी खोजना और उसका सही सलामत वापस मिल पाना मुश्किल ही लग रहा है।

राजधानी के अलग-अलग थानों में खड़े लावारिश वाहनों का आंकड़ा
सर्किल दो पहिया चार पहिया अन्य वाहन
नगर पश्चिमी 43 04 08
नगर पूर्वी 125 12 02
नगर उत्तरी 121 17 एक भी नहीं
ट्रांसगोमती 128 09 एक भी नहीं
ग्रामीण क्षेत्र 136 42 01

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