वायरल बुखार की चपेट में आए बच्चे

  • नवजात शिशु हो रहे वायरल डायरिया का भी शिकार
  • लोहिया अस्पताल की ओपीडी में इलाज के लिए एक दिन में पहुंचे दो सौ से ज्यादा बच्चे

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। मौसम में आये बदलाव के चलते राजधानी के अस्पतालों में इलाज के लिए आने वाले मरीजों में बच्चों की संख्या में खासा इजाफा हो गया है। अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने वाले बच्चों में ज्यादातर बच्चे वायरल डायरिया से पीड़ित बताए जा रहे हैं। ओपीडी हो या इमरजेंसी हर जगह मौसम की मार से बीमार बच्चे इलाज के लिए आ रहे हैं। मंगलवार के दिन डॉ राममनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय स्थित बाल रोग विभाग में बाल रोगियों तथा उनके अभिभावकों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि लोगों को नियंत्रित करना मुश्किल था।
बाल रोगियों तथा उनके अभिभावकों को कोई समस्या न हो इसके लिए अस्पताल प्रशासन को गार्ड लगाना पड़ा। मंगलवार को डॉ. अभिषेक वर्मा की ओपीडी के सामने सैकड़ों अभिभावक अपने बच्चों के इलाज के लिए लाइन लगा कर खड़े थे। डॉ. अभिषेक वर्मा सौ से अधिक मरीज देख चुके थे कि तभी कुछ अभिभावक पहले दिखाने के चक्कर में बहस करने लगे। जिसके बाद अस्पताल प्रशासन ने गार्ड लगाकर स्थित को नियंत्रित किया। लोहिया अस्पताल प्रशासन ने वायरल डायरिया तथा वायरल फीवर के मरीजों की संख्या को देखते हुए नवजात शिशुओं के लिए छ: बेडों की इमरजेंसी का वार्ड आरक्षित कर दिया है। जिससे बाल रोगियों के इलाज में किसी प्रकार की समस्या न आये। डॉ. राम मनोहर लोहिया संयुक्ता चिकित्सालय के बाल रोग विशेषज्ञ तथा मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. ओंकार यादव का कहना है कि बदलते मौसममें जरा सी लापरवाही बच्चों के स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो सकती है। आजकल कभी ठंड तो कभी गर्मी के चलते बच्चे ज्यादा बीमार हो रहे हैं। इस तरह के मौसम में बच्चों को वायरल डायरिया, वायरल फीवर ज्यादा होता है। कभी-कभी बुखार 103 से 104 डिग्री तक पहुंच जाता है, दवा देने के बाद भी बुखार में कोई अन्तर नहीं आता है। इस प्रकार की स्थित होने पर बच्चों को चिकित्सक की देखरेख में रखना चाहिए। उन्होंने ने बताया कि इस मौसम में वायरल डायरिया और वायरल फीवर के अलावा बच्चों में निमोनिया होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अभिभावकों को बच्चों की सेहत को लेकर खासतौर से सावधानी बरतनी चाहिए। डॉ. ओंकार की मानें तो यदि इस दौरान बच्चों की सेहत के साथ खिलवाड़ किया गया तो उनके स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि विश्व में हर 20 सेकंड में एक बच्चे की मौत निमोनिया से होती है। इस प्रकार दुनिया भर में 5 वर्ष से कम उम्र के करीब 14 लाख बच्चे न्यूमोनिया की वजह से अपनी जान गवां देते हैं। यह आंकड़ा एड्स,मलेरिया और टीबी से बच्चों की मौत के कुल आंकड़े से कहीं ज्यादा है। फेफड़ों में संक्रमण की बीमारी निमोनिया दुनिया भर में बच्चों की मौत का मुख्य कारण है। जिस बच्चे को निमोनिया होता है उसके एक या दोनों फेफड़ों में पस और तरल पदार्थ भर जाते हैं, जो फेफ ड़ों को ऑक्सीजन ग्रहण करने में रुकावट पैदा करते हैं। जिससे सांस लेने में कठिनाई महसूस होती है जो बच्चों के लिए घातक है। उन्होंने बताया कि लगातार जुकाम, कफ , कंपकंपी, बुखार और सांस लेने में दिक्कत अगर समय रहते दूर न हो तो इसे केवल ठंड की बीमारी नहीं समझना चाहिए।

न्यूमोनिया के कारण

डा. ओंकार यादव ने बताया कि बच्चों में न्यूमोनिया का मुख्य कारण वायरस का संक्रमण है। आमतौर पर नाक और गले में पाए जाने वाले वायरस और बैक्टीरिया सांस लेने पर फेफड़ों को संक्रमित कर सकते हैं। निमोनिया बैक्टीरिया, वायरस और फंगस संक्रमण से होता है। हवा में मौजूद किसी की खांसी या छींक से निकले रोगाणु के कारण भी बच्चों में निमोनिया के होने की आशंका होती है। निमोनिया के प्रकार- कम्युनिटी एक्वायर्ड न्यूमोनिया और एक्वायर्ड न्यूमोनिया। कम्युनिटी एक्वायर्ड न्यूमोनिया ऐसा प्रकार है, जो घर में रहने पर भी रोगी को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। वहीं एक्वायर्ड न्यूमोनिया अस्पताल में भर्ती लोगों को ज्यादा होता है, जिसकी मुख्य वजह संक्रमण होता है।

क्या है न्यूमोनिया

न्यूमोनिया, फेफड़ों में एक प्रकार का संक्रमण है, जिसमें रोगी को सांस लेने में परेशानी होती है। इससे फेफड़ों में दर्द व सूजन आ जाती है।

Pin It