वाटर मैनेजमेंट जरूरी

sanjay sharma editor5“उदयपुर में आपदा प्रबंधन के मुद्दे पर ब्रिक्स देशों के आपदा मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान दक्षिण अफ्रीका के सहकारी शासन एवं परंपरागत मामले विभाग के मंत्री डेस वेन रोयीन ने कहा कि जल संरक्षण का जो मॉडल उन्होंने यहां देखा है, उससे इस मामले में कई नई बातें सीखी जा सकती हैं, वे इसे अपना कर अपने देश में सूखे की समस्या से निपटेंगे। जबकि करीब तीन साल पहले खबर आई थी कि राजस्थान का एक चौथाई हिस्सा पूरी तरह रेगिस्तान में तब्दील हो चुका है।”

 

देश के कई इलाकों में कुछ महीने पहले पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ था। महाराष्ट्र से लेकर बुंदेलखंड तक की जनता पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही थी। तब अरबों रुपए खर्च कर पानी से भरी रेलगाडिय़ां भेजी गर्इं। इस समस्या पर किसी तरह सरकारों ने काबू पा लिया लेकिन जल संकट से निपटने का कोई ठोस प्रबंध हकीकत में होता नहीं दिख रहा है।
भले ही सूखे को कुदरती कहर मान लिया जाए और समाज से लेकर सरकार तक अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह समझ लें। लेकिन भविष्य में जल संकट उत्पन्न न हो, इसके लिए सरकार और आम जनता को मिलकर पानी के प्रबंध के बारे में सोचना होगा। प्रकृति व्यक्ति को बार-बार बाढ़ और सूखे से बचाव का मौका देती है। वह अपने बचाव और सुविधा के पूर्व इंतजाम कर सकता है लेकिन आपदाओं से सबक लेकर कुछ सीखने की कोशिश कम ही लोग करते हैं। ऐसी समस्याओं की चपेट में आने के बाद भी बहुत ही कम लोगों ने जल संरक्षण और बाढ़ से बचाव के बारे में सोचा होगा। लेकिन राजस्थान में पानी के प्रबंध की व्यवस्था की गई है।
दरअसल राजस्थान में मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के तहत प्रथम चरण में करीब चौरानबे हजार जल संरचनाओं का निर्माण कर जल संरक्षण की एक ठोस बुनियाद रखी गई है। पानी की समस्या से जूझते रहने वाले राजस्थान की इस योजना की काफी प्रशंसा भी हो रही है। उदयपुर में आपदा प्रबंधन के मुद्दे पर ब्रिक्स देशों के आपदा मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान दक्षिण अफ्रीका के सहकारी शासन एवं परंपरागत मामले विभाग के मंत्री डेस वेन रोयीन ने कहा कि जल संरक्षण का जो मॉडल उन्होंने यहां देखा है, उससे इस मामले में कई नई बातें सीखी जा सकती हैं, वे इसे अपना कर अपने देश में सूखे की समस्या से निपटेंगे। जबकि करीब तीन साल पहले खबर आई थी कि राजस्थान का एक चौथाई हिस्सा पूरी तरह रेगिस्तान में तब्दील हो चुका है। दूसरी ओर, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में कभी-कभी अनियमित बरसात के चलते भारी मात्रा में वर्षा जल यों ही बेकार चला जाता था लेकिन अब स्थिति बिल्कुल उलट है।
इसलिए सभी राज्यों को राजस्थान की तरह पारंपरिक जल स्त्रोत को जल संरक्षण का माध्मय बनाना होगा। बाढ़ से बचाव के लिए बंधों का निर्माण, नहरों और नदियों के बहाव को एक दिशा देनी होगी। हमें ऐसी जगहों पर घर बनाने से बचना होगा, जहां बाढ़ का संकट अधिक हो। यदि हम ऐसा करने में कामयाब होंगे, तो आने वाले समय में पानी की कमी और बाढ़ की वजह से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकेगा।

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