वसूली के लिये अफसरों का नाम बेच रहा गाजीपुर का थानाध्यक्ष देवेन्द्र दुबे

पूर्व में कई कप्तानों के आदेशों को दिखा चुका है ठेंगा

अधिकारियों के सामने गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है दुबे

Capture लखनऊ। वर्तमान समय में थाने का चार्ज लेने के लिये हर दारोगा और इंस्पेक्टर लालायित है क्योंकि अवैध कमाई बढ़ जाती है। लेकिन कमाई बढ़ाने के लिये यदि कोई थानाध्यक्ष, डीआईजी और कप्तान के नाम को बेंचना शुरू कर देे तो स्वाभविक है कि आम जनता की नजरों में पुलिस की साख गिरेगी और अधिकारियों की भी प्रतिष्ठïा दांव पर लगेगी। पर इसकी परवाह किये बगैर गाजीपुर थानाध्यक्ष देवेंद्र दुबे रुपए के लिये अपने अधिकारियों का नाम बेंच रहा है। हालांकि इनका यह कारनामा नया नहीं है। इसके पूर्व भी यह कई कप्तानों के आदेश को दरकिनार कर चुके हैं। श्री दुबे को घटनाओं को भी दबाने में महारथ हासिल है।
गाजीपुर थानाध्यक्ष देवेंद्र दुबे का यह कारनामा विभाग और फुटपाथ दुकानदारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि दुकानदारों सहित अन्य स्थानों से अवैध वसूली आती है और देवेंद्र दुबे उसे बढ़ाने का दबाव बना रहे हैं। पैसे कमाने के लिये जहां पहले रहे डीआईजी/एसएसपी आर.के.चतुर्वेदी के नाम का प्रयोग किया गया वहीं वर्तमान में कप्तान राजेश कुमार पांडेेय का नाम भी बेचा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि देवेंद्र साफ तौर पर कहते हुये फिर रहे हैं कि नये कप्तान के आने से और महंगाई बढऩे के कारण वसूली बढ़ाई जाये।
वाकपटुता और अपने अधिकारियों की खुशामद करने में माहिर देवेंद्र दुबे के बारे में हर कोई जानता है, यदि इनको कोई अधिकारी लाइन हाजिर कर देता है तो यह छोटे से लेकर बड़े अधिकारी और नेताओं की शरण में पहुंच जाते हैं। श्री दूबे जिस समय गोमतीनगर थानाध्यक्ष थे उस दौरान दिल दहला देने वाली एक घटना हुई थी। लगभग चार वर्ष की मासूम बच्ची के साथ हैवानियत की गई थी वहीं उसके शरीर पर चाकू के अनगिनत घाव मौजूद थे। इसकी जानकारी जब बच्ची के परिजनों ने थाने पर दी तो देवेंद्र दूबे ने शव को देखने के बाद उसे दफनाने की बात कह दी। इसकी जानकारी जब मीडिया द्वारा उच्च अधिकारियों को हुई तो अधिकारियों ने जमकर देवेंद्र दुबे को फटकार लगाई। अधिकारियों की दखल के बाद मासूम बच्ची के शव का पोस्टमॉर्टम हुआ और मुकदमा दर्ज कि या गया। और तो और दो वर्ष बाद भी इस मामले का पर्दाफाश नहीं हो पाया। बच्ची की मौत को लेकर जब राजधानी सुलग रही थी तो तत्कालीन कप्तान जे रविन्दर गौड़ ने देवेंद्र दुबे को लाइन हाजिर कर दिया। लाइन हाजिर होने के बाद देवेन्द्र दुबे कुछ ही दिनों बाद अपनी चमचागिरी के कारण बहाल होकर अमीनाबाद में एसआई का पद पा गये। इस पर भी उन्हें संतोष नहीं हुआ। थानाध्यक्ष बनने के लिए सारे जतन कर डाले। ड्यूटी न कर अधिकारियों और नेताओं को सलामी देने में लग गए और परिणाम स्वरूप विभूतिखंड थानाध्यक्ष का चार्ज मिल गया।

वादी और प्रतिवादी दोनों से लेते हैं रुपए

चार्ज मिलने के बाद हत्या की घटना को आत्महत्या बताना और घटनाओं को मीडिया और उच्च अधिकारियों से छिपाने में दुबे माहिर है। इसी थाने पर विभू अग्रवाल ने एक व्यक्ति पर चेक बाउंस होने का मुकदमा दर्ज कराया लेकिन एक वर्ष तक देवेंद्र दुबे ने इस मामले में चार्जशीट तक कोर्ट को पेश नहीं की। वादी ने इस मामले में साफ तौर पर आरोप लगाया कि देवेंद्र दुबे चार्जशीट लगाने के लिये रुपयों की मांग कर रहे हैं। रुपये नहीं मिलने पर देवेंद्र ने दूसरे पक्ष से मोटी रकम लेकर चार्जशीट दाखिल नहीं की।

प्रवीण कुमार तो दूर यशस्वी यादव को भी दे दिया गच्चा

इस मामले में जब वादी तत्कालीन कप्तान रहे प्रवीण कुमार से फरियाद लगाई तो श्री कुमार ने देवेंद्र दुबे से बात कर चार्जशीट कोर्ट में दाखिल करने का आदेश दिया लेकिन देवेंद्र दुबे ने अपने कप्तान का आदेश ठेंगे पर रख दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री के करीबी और तत्कालीन कप्तान यशस्वी यादव ने भी देवेंद्र से सीधी वार्ता कर एक सप्ताह के अंदर चार्जशीट दाखिल करने का आदेश दिया लेकिन देवेंद्र का दुस्साहस कहें या फिर कुछ और। कई माह बाद भी चार्जशीट नहीं लगाई गई। इस पर श्री यादव ने देवेंद्र दूबे को पहले अमीनाबाद उसके बाद गाजीपुर स्थानान्तरण कर दिया।

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