वक्त की नब्ज: इस हवा का रुख समझना होगा

तवलीन सिंह

इस्लाम का गहरा रिश्ता है जिहादी आतंकवाद से, लेकिन इस बात को न सिर्फ मुसलमानों के लिए स्वीकार करना मुश्किल है, बल्कि हम जैसे सेक्युलर देश के लिए भी। हमारे राजनेता डरते हैं सत्य का सामना करने से मुस्लिम मतदाताओं के वोट खोने के मारे। हम पत्रकार डरते हैं कुछ कहने से, क्योंकि नहीं चाहते कि हमारे सेक्युलर चोले पर दाग लग जाए सांप्रदायिकता का। भारतीय पत्रकारिता में हम इस्लाम को लेकर जरूरत से ज्यादा सेक्युलर हैं। स्वामी आदित्यनाथ और साध्वी ज्योति जैसे हिंदुत्ववादी कट््टरपंथियों के बयानों की हम कड़ी निंदा करने में कभी पीछे नहीं रहते, लेकिन जब तथाकथित उदारवादी मुसलिम बुद्धिजीवी भी कहते फिरते हैं हर जिहादी हमले के बाद कि इस्लाम का कोई रिश्ता नहीं है जिहादियों का, तो हम चुप बैठ जाते हैं। हम जानते हैं कि ढाका के उस रेस्तरां में जिहादी हत्यारों ने रात भर रसोइयों से सेहरी के पकवान बनवाए। हम जानते हैं कि उन्होंने मुसलिम लोगों की जान बक्शी और गैर। मुसलिमों की बेरहमी से हत्या की अल्लाह के नाम परए लेकिन हम इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहते। सोए ध्यान ज्यादा दिया हमने उन दो दिलेर मुसलमानों परए जिन्होंने जानें गंवार्इं सिर्फ इसलिए कि वे जिहादी हत्यारों का कहना मानने को तैयार नहीं थे। फराज हुसैन अपनी दोस्त तारिषी जैन को अकेला छोडऩे के लिए राजी नहीं हुए और इश्तार अखोंड को इसलिए मारा गयाए क्योंकि उसने हिजाब नहीं पहना था और कुरान की आयतें दुहराने का हुक्म मानने से इनकार किया। इन दोनों की दिलेरी की जितनी तारीफ की जाए कम होगी, इसलिए कि इन्होंने अपनी जान गंवाईए यह दिखाने के लिए कि जब राक्षस सामने होते हैं तो उनका मुकाबला सिर्फ नेक दिलेर इंसान कर सकते हैं। उनकी बहादुरी के बारे में सुन कर मुझे याद आया अब्दुल कलाम का बयान, जब वे मुंबई आए थे 26/11 वाले हमले के बाद। इस महानगर के सहमे हुए, क्रोधित नागरिकों के एक बड़े जलसे को संबोधित करते हुए कलाम साहब ने कहा जब बुरे लोग बुरी चीजें करते हैं, तो बहुत जरूरी है अच्छे लोगों को संगठित होकर उनका सामना करना। उनकी यह नसीहत आज के दौर में ज्यादा अहमियत रखती है, क्योंकि जिहादी आतंकवाद ने एक नया वैश्विक रूप धारण कर लिया है, जबसे इराक और शाम के कुछ हिस्सों में खिलाफत का इजाद हुआ कोई दो साल पहले। इस खिलाफत में शरीअत निजाम के मुताबिक औरतों को अशिक्षित और अदृश्य कर दिया गया है और इस्लाम के नाम पर टीवी, सिनेमा, गाना-बजाना, शराब या सिगरेट पीना सब मना कर दिया गया है। इन नए उसूलों का उल्लंघन जो करते हैं उनको शरीअत कानून के आधार पर दंडित किया जाता है। इस वहाबी या सलफी इस्लाम से पैदा हो रहे हैं नए किस्म के जिहादीए जो रमजान के पाक महीने में इस्तांबुलए बगदाद, ऑरलैंडो और ढाका में बेगुनाह लोगों को मार कर खुद शहीद हुए हैं, इस भरोसे कि रमजान में शहादत पाना ज्यादा मायने रखता है। जिहादियों ने कई बार साबित करने की कोशिश की है कि उनकी हिंसा पूरी तरह से इस्लाम से जुड़ी है। कई बार इंटरनेट पर आइएसआइएस के मुजाहिदों ने कुरान की आयतों से अपनी हिंसा को जायज ठहराया है, लेकिन फिर भी आमिर खान जैसे उदारवादी मुसलिम ढाका हमले के बाद कहते हैं कि आतंकवाद का कोई लेना-देना नहीं है मजहब से। उनकी बातें सुन कर मुझे निजी तौर पर तकलीफ हुई, क्योंकि मेरा मानना है कि आमिर खान जैसे लोग जब तक कबूल करने को तैयार नहीं होंगे कि इस्लाम से पैदा हुए हैं ये जिहादी, तब तक जिहादी आतंकवाद की जीत होती रहेगी। पिछले हफ्ते बरखा दत्त के शो पर एक मुसलिम वकील ने याद दिलाया कि दूर किसी दूसरे देश में किसी मस्जिद के तोड़े जाने की खबर जब मिलती है तो भारत के शहरों में मुसलमानों के हुजूम निकल पड़ते हैं सड़कों पर और हिंसा करते हैंए लेकिन जिहादी आतंकवाद के खिलाफ आज तक कभी नहीं निकले हैं। उनकी यह बात मुझे इसलिए अच्छी लगीए क्योंकि मुझे याद आया कि भिंडरांवाले के मारे जाने के बाद कई वर्ष खालिस्तानी आतंकवाद फैलता रहा पंजाब के शहरों और देहातों में। जब तक इस कट्टरपंथी सिख विचारधारा को आम सिखों का समर्थन मिलता रहा इसका खात्मा नामुमकिन रहा। यह खत्म तब हुआ जब सिखों ने डट कर इसका मुकाबला किया। बिलकुल उसी तरह जब तक उदारवादी मुसलिम लोग सामना नहीं करेंगे जिहादियों का, तब तक जिहादी आतंकवाद दुनिया में फैलता रहेगा। आइएसआइएस अपनी खिलाफत अब तकरीबन खो बैठा है। जिन इराकी शहरों पर उन्होंने कब्जा करके अपना देश बनाया था, वहां से उनको भगाया जा रहा है। खबर यह भी है कि इस खिलाफत के खलीफा को भी मार दिया गया है। मगर इन सबके बावजूद रमजान का गुजरा महीना बेगुनाह लोगों के खून से रंगा रहा। ऐसा क्यों इस सवाल का उत्तर सारी दुनिया को ढूंढऩा होगा, लेकिन भारत में और ज्यादा, क्योंकि हमसे बड़ा बुतपरस्त देश नहीं है दुनिया में और जिहादियों के लिए काफिरो को मारना पुण्य माना जाता है। इसलिए भी जरूरी है भारत में इस सवाल का उत्तर ढूंढऩा क्योंकि इंडोनेशिया के बाद सबसे ज्यादा आबादी मुसलमानों की भारत में है और सच यह भी है कि जिस उदारवादी इस्लाम को हमने इस देश में सदियों से देखा है, वह धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। अरब देशों में जो गरम हवाएं चल रही हैं, वे हम तक पहुंच गई हैं और ये हवाएं लाई हैं अपने साथ एक नया इस्लाम।

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