लोकायुक्त तक पहुंचा कृषि प्रसार केन्द्र का प्रिंटिंग घोटाला

  • नियम कायदे दर किनार कर अफसरों ने टेंडर में किया खेल, चहेती कंपनियों के साथ काट रहे मलाई
  • चौगुने रेट पर दिया गया काम, शिकायत के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई, मामले पर जल्द हो सकती जांच

अंकुश जायसवाल
captureलखनऊ। कृषि विभाग घोटालों को लेकर हमेशा से सुर्खियों में रहा है। यहां किसानों के अनुदान राशि तक को अफसर चट कर गये। माइक्रोन्यूट्रियंट्स खरीद फरोख्त में भी करोड़ों की हेरा फेरी की गई। ताजा मामले में कृषि प्रसार केन्द्र में प्रिंटिंग में करोड़ों के घोटाले का मामला उजागर हुआ है। शिकायतों के बावजूद जब कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला अब लोकायुक्त तक पहुंच गया है। भ्रष्टाचार के इस मामले को लोकायुक्त ने गंभीरता से लिया है और जल्द ही इसकी जांच पड़ताल शुरू हो सकती है। लोकायुक्त में भेजी गई शिकायत के मुताबिक कृषि विभाग के संयुक्त कृषि निदेशक विवेक कुमार सिंह व लेखाकार विपिन कुमार ने चहेती कंपनियों के साथ साठ-गांठ कर प्रदेश सरकार को करोड़ों का चूना लगाया है। यह खेल प्रिंटिंग के टेंडर की आड़ में किया गया। यहां भ्रष्टाचार का आलम यह है कि टेंडर के सारे नियम कायदों को धता बताकर गैर पंजीकृत कंपनियों को मन मुताबिक रेटों पर प्रिंटिंग के कार्य दिये गये हैं।
कृषि प्रसार केन्द्र के अधिकारी गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हैं। यहां कागज, मुद्रण सामग्री, ऑडियो-विजुअल कार्य, रेडियो स्पॉट, कृषि तकनीकी, फिल्म निर्माण, बाइंडिंग, रद्दी-कतरन व प्रदर्शनी लगाने संबंधी कार्यों के लिए जारी किये जाने वाले टेंडर में जमकर हेरा फेरी की जा रही है।

टेंडर कराये बिना अफसर कुछ कंपनियों को लगातार फायदा पहुंचा रहे हैं और इसकी एवज में कंपनियों से मोटी रकम वसूल रहे हैं। वित्त वर्ष 2016-17 में तो प्रिंटिंग का टेंडर तक नहीं निकाला गया ताकि उन प्रिंटर्स को लाभ पहुंचाया जा सके, जिन्हें पिछले वर्ष प्रिंटिंग के रेटों में चार गुना बढ़ोतरी कर कार्य दिया गया था। जब मामला खुला तो संयुक्त कृषि निदेशक विवेक कुमार सिंह के इशारे पर लेखाकार विपिन कुमार ने प्रिंटिंग के टेंडर की फाइल आनन-फानन में शासन को भेज दी और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश की। हैरत यह है कि जिन कंपनियों को प्रिंटिंग का काम दिया गया, उसमें एक कंपनी राजकीय मुद्रण एवं लेखन सामग्री निदेशालय इलाहाबाद में पंजीकृत तक नहीं है जबकि लखनऊ में पंजीकृत दूसरी कंपनी का पंजीकरण वर्ष 2012 में ही समाप्त हो चुका है। जाहिर है दोनों कंपनियां टेंडर की न्यूनतम शर्तों को भी पूरा नहीं करती हैं। बावजूद इसके कृषि विभाग के अधीन संयुक्त निदेशक ब्यूरो कार्यालय में तैनात लेखाकार विपिन कुमार व संयुक्त कृषि निदेशक, कृषि ब्यूरो विवेक कुमार सिंह ने मिलीभगत कर इनको लाभ पहुंचाया। यही नहीं इन अधिकारियों ने टेंडर की शर्तों को जानबूझ कर ऐसा बनाया कि अधिकांश कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएं। मसलन, फर्म या कंपनी का प्रेस लखनऊ में होना अनिवार्य किया गया और प्रिंटिंग मशीन और इसके साइज को लेकर भी तमाम शर्तें जोड़ दी गई। इन शर्तों का एक मात्र उद्देश्य चहेती कंपनियों को मनचाहे रेट पर काम दिलाना था। टेंडर में भ्रष्टाचार की पुष्टि कार्यालय प्रधान महालेखाकार के दिनांक 6 मई 2016 के पत्र से भी होती है, जिसमें कहा गया है कि शासन की स्वीकृति से बचने के लिए नियमों का पालन नहीं किया गया और घोर वित्तीय अनियमितताएं की गई, जिससे सरकार को करोड़ों का घाटा हुआ। हैरत की बात यह है कि शिकायतों के बावजूद भी संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। लिहाजा मामला लोकायुक्त तक पहुंच गया है। भ्रष्टाचार की शिकायत लोकायुक्त तक पहुंचने की जानकारी से अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं। 

 भ्रष्टाचार का अड्डा  बन चुका है कृषि विभाग

कृषि विभाग घोटालों को लेकर पहले भी सुर्खियों में रहा है। करोड़ों के कई घोटालों का खुलासा 4पीएम ने समय-समय पर किया है। माइक्रोन्यूट्रियंट्स व किसानों के अनुदान में हेरा फेरी को लेकर 4पीएम में प्रकाशित खबर का संज्ञान मुख्य सचिव ने लिया था। इसके बाद उन्होंने तत्काल कार्रवाई करते हुए विभाग के कृषि निदेशक मुकेश श्रीवास्तव को हटा दिया था। इसके अलावा अन्य लोगों पर भी विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए गये थे।

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