लोकसभा में अटका महिला आरक्षण का मुद्ïदा

लोकसभा में इसे आसानी से दो तिहाई बहुमत का समर्थन हासिल हो जाएगा। लोकसभा में इसके मुख्य विरोधी जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी ही हैं। उनके सदस्यों की संख्या वहां मात्र 11 ही हैं। वर्तमान रूप में शिवसेना, बहुजन समाज पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लीमीन भी इसका विरोध करती हैं।
१११ कल्याणी शंकर
महिला आरक्षण विधेयक एक बार फिर चर्चा का विषय बन रहा है। इसे कुछ साल पहले भुला दिया गया था। इस मुद्दे को फिर से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उठा रही हैं। संसद में बोलते हुए उन्होंने इसे लोकसभा से पास कराने की मांग की। गौरतलब हो कि यह विधेयक राज्यसभा से पहले ही दो तिहाई बहुमत से पास हो चुकी है। लोकसभा भी यदि इसे पास कर दे, तो फिर राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं का आरक्षण सुनिश्चित हो जाएगा।
आज से छह साल पहले महिला आरक्षण विधेयक को सोनिया गांधी ने ही राज्यसभा से पारित करवाया था। उस समय इसका जबर्दस्त विरोध हो रहा था और उसके बावजूद उस पर चर्चा करवाई गई थी और उसे पारित करवाया गया था। इस महिला आरक्षण विधेयक को अधिकांश राजनैतिक पार्टियों का समर्थन हासिल है। इसके बावजूद इसे पारित नहीं करवाया जा रहा है।
अभी से 19 साल पहले इस विधेयक को लोकसभा में पेश किया गया था। लोकसभा का टर्म समाप्त होते ही विधेयक अपना वजूद खो दिया करता था। फिर नई लोकसभा में इसे पेश किया जाता था और उस लोकसभा का टर्म समाप्त होने के बाद वह अपना वजूद फिर खो देता था। विधेयक अपना वजूद नहीं खो दे, इसके लिए सोनिया गांधी की सलाह पर पहले राज्यसभा में पेश किया गया और वहां से पास करवा लिया गया। लेकिन लोकसभा से पास कराया जाना अभी यह बाकी है। जब 1997 में जनता दल के नेतृत्व वाले संयुक्त मोर्चे की सरकार थी, उस समय इसे पहली बार पेश किया गया था। उस सरकार में वे सभी पार्टियां शामिल थीं, जो आज इसका विरोध करती हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि आजादी के बाद हमारे देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन सुधार की यह गति बहुत धीमी है। महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए राजनीतिज्ञ जबानी जमा खर्च करने में कोई कंजूसी नहीं दिखाया करते, लेकिन जब कुछ करने की बारी आती है, तो फिर उनके मुंह पर ताला लगा दिखाई पड़ता है।
यह इस बार भी दिखाई दिया। महिला प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ने तो महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने पर बल दिया, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस पर चुप्पी साध ली।
राजीव गांधी ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए 1989 में एक बड़ा प्रयास किया था। उसके तहत पंचायती राज में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, लेकिन वह प्रयास विफल हो गया था, क्योंकि तब वह विधेयक 5 वोट से राज्यसभा में पराजित हो गया था। लेकिन नरसिंह राव सरकार ने उस विधेयक को अपने कार्यकाल में पारित करवा दिया। उसके कारण महिलाओं का प्रतिनिधित्व पंचायतों में एक तिहाई हो गया। अब वह कोटा बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया गया है। उसके कारण अब 50 फीसदी महिलाएं स्थानीय निकायों में चुनकर जा रही हैं। इसके कारण आज करीबी 10 लाख महिला प्रतिनिधि स्थानीय निकायों में हैं।
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने का मामला 20 साल पुराना है। गीता मुखर्जी के नेतृत्ववाली एक संसदीय समिति ने इसकी सिफारिश की थी। तब से इससे संबंधित विधेयक कई बार लोकसभा में पेश किया जा चुका है। सबसे पहले देवगौड़ा सरकार ने इसे पेश किया। उसके बाद गुजराल सरकार ने भी इसे पास कराने की कोशिश की। अटल बिहारी सरकार ने भी इसे पारित कराने की कोशिश की। लेकिन सबके प्रयास विफल रहे।
यूपीए ने इस राज्यसभा में पारित करा दिया, लेकिन इसका जिस तीव्रता के साथ विरोध होता है, उसे देखते हुए कांग्रेस ने भी इसे लोकसभा से पास कराने की हिम्मत नहीं जुटाई।
अब मोदी सरकार एक मजबूत सरकार है। उसे अपने बूते लोकसभा में बहुमत हासिल है। अपने सहयोगी दलों के साथ उसे 60 फीसदी लोकसभा का समर्थन हासिल है। महिला आरक्षण विधेयक को कांग्रेस का भी समर्थन हासिल है। जाहिर है, लोकसभा में इसे आसानी से दो तिहाई बहुमत का समर्थन हासिल हो जाएगा। लोकसभा में इसके मुख्य विरोधी जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी ही हैं। उनके सदस्यों की संख्या वहां मात्र 11 ही हैं। वर्तमान रूप में शिवसेना, बहुजन समाज पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लीमीन भी इसका विरोध करती हैं। मुस्लीमीन के तो मात्र एक ही सदस्य लोकसभा में हैं, जबकि बहुजन समाज पार्टी का तो कोई नहीं है। तो फिर आखिर क्यों सरकार इसे लोकसभा से पास कराने में झिझक रही है?

Pin It