लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों की रक्षा कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण

जनप्रतिनिधित्व कानून में दलबदल नहीं, बल्कि मतदाता सर्वोच्च है। इसीलिए मतदाताओं के निर्णय को पार्टी की गरिमा, विशेषाधिकार और उनके राजनीतिक स्वार्थों के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि राजनीतिक दलों के लिए कुछ अपने चुनावचिन्ह निर्धारित हैं जिनका प्रयोग उम्मीदवार पार्टी की इच्छा और सहमति तथा स्वीकृति पर ही कर सकता है।

शीतला सिंह
उत्तराखण्ड का विवाद जिस प्रकार भारतीय राजनीति पर हावी हो गया है, उसी का परिणाम है कि उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की एकल पीठ का वह निर्णय भी बड़ी पीठ को रोकना पड़ा, जिसके अनुसार 31 मार्च को विधानसभा में शक्ति परीक्षण होना था, लेकिन परिणामों की गिनती और प्रतिफल की घोषणा विधानसभा में नहीं बल्कि उच्च न्यायालय में होनी थी। दलबदल- विरोधी कानून में कांग्रेस के 9 सदस्यों की सदस्यता समाप्ति का प्रश्न भी अभी न्यायालय से निर्णीत नहीं हो पाया है।
अब यह प्रश्न उठता है कि जब ये सदस्य भी वोट करेंगे तो उन्हें निर्णायक माना जायेगा या नहीं? इसी के साथ ही उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने यह सवाल उठा भी दिया कि यदि अनुच्छेद-356 के तहत किये गये निर्णय का परीक्षण किये बिना विधान सभा में शक्ति परीक्षण करा लिया जाये तो उसके क्या प्रभाव पड़ेंगे? क्योंकि इसके लिए आवश्यक था कि विधान सभा को सक्रिय करके सरकार हटाने के निर्णय को स्थगित कर दिया गया होता। तभी सदन के अल्पमत के निर्णय को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का प्रश्न उठता।
सर्वोच्च न्यायालय का बोम्मई प्रकरण सम्बन्धी संविधान पीठ के 9 सदस्यों का निर्णय आज भी बरकरार है। वह यह कि अल्पमत या बहुमत का निर्णय सदन के बाहर नहीं बल्कि भीतर ही होना है। राज्यपाल या राष्ट्रपति के समक्ष कराई जाने वाली परेड इसका विकल्प नहीं है लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि राष्ट्रपति शासन हटे जिससे विधायकों की राय का कोई मूल्यांकन और अर्थ निकाला जा सके। इस रूप में एकल पीठ का निर्णय दोषपूर्ण माना गया कि एक ओर तो विश्वास के प्रश्न पर मतदान हो रहा है, दूसरी ओर राष्ट्रपति शासन यथापूर्व लागू है और राज्यपाल अपने सलाहकारों को विभाग बांटकर उन्हें दायित्व निर्वाह का आदेश दे रहे हैं। यही कारण था जिससे बर्खास्त मुख्यमंत्री हरीश रावत भी द्विसदस्यीय पीठ के समक्ष इस बात पर सहमत हो गये कि उन्हें राष्ट्रपति शासन लागू करने के खिलाफ सुनवाई की याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए थी। इसलिए 31 मार्च को विधान सभा में विश्वास मत वाली बैठक न करने पर दोनों पक्षों में सहमति हो गई।
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि विधानसभा अध्यक्ष, जो दल बदल कानून में फिलहाल अन्तिम निर्णायक हैं, उनके निर्णय की न्यायिक समीक्षा की प्रतीक्षा विश्वास मत के बाद नहीं पहले ही होनी चाहिए, जिससे सदस्य क्या कर रहे हैं? उनके निर्णयों का भावी प्रभाव क्या होगा? यह पहले से ही जाना जा सके और चूंकि दल बदल कानून में घोषित अयोग्यता का प्रश्न द्विसदस्यीय पीठ के पास नहीं, बल्कि एकल सदस्यीय पीठ के पास था, जिसके लिए उसने एक अप्रैल की तिथि निर्धारित कर रखी थी, इसलिए उसका निर्णय इस राजनीति के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। दलबदल कानून का निर्माण भी हुआ जिसमें किसी दल के एक तिहाई सदस्य विद्रोही बन जाने पर तो उन्हें अधिकार था कि वे अपना दल बनाकर मूल दल से असहमति और विलगता का तर्क देकर अपनी सदस्यता बचा सकते थे, लेकिन अब यह संख्या संशोधित करके आधे से अधिक बताई गई है। यानी छोटे गुट द्वारा विभाजन को किसी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जायेगा। यह तर्क सर्वोच्च न्यायालय से भी अस्वीकार नहीं है।
जनप्रतिनिधित्व कानून में दलबदल नहीं, बल्कि मतदाता सर्वोच्च है। इसीलिए मतदाताओं के निर्णय को पार्टी की गरिमा, विशेषाधिकार और उनके राजनीतिक स्वार्थों के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि राजनीतिक दलों के लिए कुछ अपने चुनावचिन्ह निर्धारित हैं जिनका प्रयोग उम्मीदवार पार्टी की इच्छा और सहमति तथा स्वीकृति पर ही कर सकता है। जो किसी पार्टी का सहारा न लेना चाहे, उन्हें अभी भी स्वतंत्र चुनाव चिन्ह प्रयोग करने की आकाादी है। वे किसी दल बदल कानून से नहीं बंधे हैं और अपने विवेक पर आधारित निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हैं।
इस प्रकार विधायकों में दो प्रकार के तत्व हैं। एक का निर्णय पार्टी के विवेक पर आधारित है और दूसरे को स्वयं तय करना है। यह भेदभाव उचित हो या अनुचित, इस पर प्रतिबंध नहीं लग सका क्योंकि चुनावों के लिए जो योग्यताएं और पात्रताएं निर्धारित हैं उनमें किसी पार्टी की बाध्यता नहीं है। इसलिए संविधान के मूल अधिकारों में संगठन बनाने की आकाादी तो अवश्य है लेकिन वह व्यक्ति के अधिकारों की कितनी विरोधी हो सकती हैं, यह सवाल उठता ही है।
दलबदल कानून एक प्रकार से पार्टी की तानाशाही का प्रतीक बताया जाता है। चूंकि उसमें स्वतंत्र विवेक इस आधार पर समाप्त कर दिया जाता है कि पार्टी के भीतर सामूहिक विवेक का पालन लोकतंत्र के लिए उपयोगी है।

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