लोकतंत्र की जीत

जब उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत की सरकार चल रही थी तो इस तरह का कृत्य कतई शोभा नहीं देता। सत्ता पर काबिज होना प्रत्येक राजनीतिक पार्टी का लक्ष्य होता है लेकिन लोकतंत्र में सत्ता सौंपने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ जनता के हाथ में है। जब जनता ने कांग्रेस को बहुमत देकर सत्ता सौंप दी तो भाजपा को गलत तरीके से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर खुद काबिज होने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

sanjay sharma editor5आखिर उत्तराखंड में जारी सियासत संकट पर विराम लग ही गया। पिछले एक माह से जारी उठापटक पर पूरे देश की निगाह बनी हुई थी। यह मामला काफी दिलचस्प इसलिए भी हो गया था, क्योंकि इस लड़ाई में केन्द्र सरकार सीधे तौर पर शामिल थी। फिलहाल हरीश रावत ने बहुमत हासिल कर केन्द्र सरकार को करारा जवाब दिया है। सही मायने में यह लोकतंत्र की जीत है। हरीश रावत ने भी बहुमत परीक्षण के बाद इसे लोकतंत्र की जीत बताया और कहा कि हम नई शुरुआत करेंगे। उत्तराखंड में मार्च माह में जिस तरीके से बागी विधायकों के बलबूते भाजपा ने अपनी सरकार बनाने की कोशिश की, वह निश्चित ही शर्मनाक घटना थी।
जब उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत की सरकार चल रही थी तो इस तरह का कृत्य कतई शोभा नहीं देता। सत्ता पर काबिज होना प्रत्येक राजनीतिक पार्टी का लक्ष्य होता है लेकिन लोकतंत्र में सत्ता सौंपने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ जनता के हाथ में है। जब जनता ने कांग्रेस को बहुमत देकर सत्ता सौंप दी तो भाजपा को गलत तरीके से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर खुद काबिज होने का प्रयास नहीं करना चाहिए। और तो और राज्य की लड़ाई में केन्द्र सरकार भी शामिल हो गई और कांग्रेस के खिलाफ अपने शक्ति का इस्तेमाल किया। यदि मामला कोर्ट में न गया होता तो आज शायद लोकतंत्र की जीत न होती। नैनीताल हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने केन्द्र सरकार को लताड़ लगायी थी। जिस तरीके से केन्द्र सरकार ने हरीश रावत के बहुमत साबित करने के एक दिन पहले वहां राष्टï्रपति शासन लगाया था, उससे स्पष्टï हो गया था कि यह कार्रवाई गलत मंशा से की गई है। खैर जो भी हो सुप्रीम कोर्ट की वजह से वहां उठापटक थम गयी। फिलहाल इस मामले में बीजेपी की बहुत किरकिरी हुई।
कुछ महीने पहले अरुणाचल में भी ऐसा ही हुआ था और वहां भी कोर्ट के दखल के बाद मामला शांत हुआ। अरुणाचल मामले में भी बीजेपी की बहुत किरकिरी हुई थी। बीजेपी पुरानी घटनाओं से सबक न लेकर सत्ता हासिल करने के लिए जिस रास्ते पर चलने की कोशिश कर रही है, वह कतई ठीक नहीं है। यह न तो स्वस्थ राजनीति है और न ही लोकतंत्र में जायज है। इस तरह के कार्यों का परिणाम घातक होता है।

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