लाल किले की प्राचीर या चुनाव सभा में फिर कुछ जुमले, फिर कुछ नारे

Captureशायद मोदी की राजनीतिक बाध्यताएं इस बार उनकी प्राकृतिक शैली जिसमें उनका सानी नहीं है भारी पड़ रही थी हालाँकि कई बार उससे निकलने की कोशिश करते रहे व्यंग के भाव में आ कर। जो रही सही कसर भाषण उबाऊ बनाने की हद तक ले जाने की, वह उनका सेवानिवृत सैनिकों के लिए ‘वन-रैंक-वन-पेंशन’ स्कीम के लिए कोई घोषणा न करना था। पूरे भाषण के धनात्मक पक्ष अगर कुछ होंगे भी तो उसे इस स्कीम की घोषणा न करके मोदी ने खत्म कर दिया। ‘जो व्यक्ति हर बार में समय सीमा की बात करता है वह इस स्कीम के बारे में समय पर समय लेता जा रहा है’ एक 85 वर्षीय पूर्व सैनिक ने क्रुद्ध भाव से अपनी प्रतिक्रिया में कहा। कुछ अपनी गलतियों से और कुछ हद तक कांग्रेस के अचानक वास्तविक विपक्ष की भूमिका में आने की वजह से भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर किसानों के बीच मोदी सरकार के अलोकप्रिय होने के कारण आज प्रधानमंत्री की तरफ से एक नयी कोशिश की गयी इस अलोकप्रियता को कम करने की।

वह शुक्रवार (जुमे) का दिन था और यह शनिवार का। लेकिन अंतर एक दिन का, या एक साल का नहीं बल्कि अंदाज का था। उस मजबूरी की थी जिसमें राष्ट्र के संबोधन दिल से नहीं दिमाग से होता है और वह भी राजनीतिक फायदे और नुकसान के तराजू पर तौल कर। मजबूरी आसन्न चुनाव की भी दिखी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लाल किले की प्राचीर से दिया गया दूसरा भाषण उस धार का, उस जज्बे का और उस गंभीरता का मोहताज रहा जो एक साल पहले के भाषण में दिखाई दी थी। पहले मोदी एक स्टेट्समैन लगे थे, एक राग-द्वेष मुक्त समाज-सुधारक दिखे थे जिसने विपक्ष की तारीफ अपने 65 मिनट के भाषण में एक बार नहीं तीन-तीन बार की थी। ‘हम बनाम वो’ अस वर्सेज देम’ का भाव नदारत था। लेकिन आज के 92 मिनट के भाषण और पिछले हफ्ते मुजफ्फरपुर में दिए गए चुनावी भाषण में शायद हीं कोई विषय-वस्तु का फर्क था। कोशिश थी पुराना जुमला नहीं जमा, कोई बात नहीं, ये लो नया जुमला। और नए जुमले थे ‘स्टैंड अप इंडिया’, स्टार्ट अप इंडिया, और तीसरा सवा सौ करोड़ की टीम इंडिया, शायद पिछले साल वाले ‘मेक इन इंडिया’ या स्किल इंडिया’ या ‘जीरो डिफेक्ट, जीरो इजेक्ट’ से प्रभाव नहीं पड़ा था। लिहाजा आज के पूरे भाषण में तीन कोशिशें थी- पिछली सरकार निष्क्रिय थी, हमारी सरकार ने तमाम योजनायें चलायी हैं और जो आलोचना करते हैं वे निराशवादी हैं लिहाजा इनको रिजेक्ट कर देना चाहिए क्योंकि ये विकास विरोधी हैं। लेकिन इन तीन कोशिशों के अलावा एक और बारीक प्रयास था और वह था धीरे से सरकार की इच्छा और सरकार के कार्य को ‘सवा सौ करोड़ लोगों की इच्छा और कार्य’ बताना। प्रधानमंत्री ने डेढ़ दर्जन बार एक नए जुमले ‘सवा करोड़ लोगों की टीम इंडिया’ का प्रयोग किया।
शायद मोदी की राजनीतिक बाध्यताएं इस बार उनकी प्राकृतिक शैली जिसमें उनका सानी नहीं है भारी पड़ रही थी हालाँकि कई बार उससे निकलने की कोशिश करते रहे व्यंग के भाव में आ कर। जो रही सही कसर भाषण उबाऊ बनाने की हद तक ले जाने की, वह उनका सेवानिवृत सैनिकों के लिए ‘वन-रैंक-वन-पेंशन’ स्कीम के लिए कोई घोषणा न करना था। पूरे भाषण के धनात्मक पक्ष अगर कुछ होंगे भी तो उसे इस स्कीम की घोषणा न करके मोदी ने खत्म कर दिया। ‘जो व्यक्ति हर बार में समय सीमा की बात करता है वह इस स्कीम के बारे में समय पर समय लेता जा रहा है’ एक 85 वर्षीय पूर्व सैनिक ने क्रुद्ध भाव से अपनी प्रतिक्रिया में कहा।
कुछ अपनी गलतियों से और कुछ हद तक कांग्रेस के अचानक वास्तविक विपक्ष की भूमिका में आने की वजह से भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर किसानों के बीच मोदी सरकार के अलोकप्रिय होने के कारण आज प्रधानमंत्री की तरफ से एक नयी कोशिश की गयी इस अलोकप्रियता को कम करने की। लिहाजा आज से भारत सरकार के कृषि मंत्रालय का नाम बदल कर ‘कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय’ रखा गया है। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं दिखा जिससे कल्याण की दिशा में किसी सार्थक योजना की झलक मिली हो। बल्कि उलटे तमाम कृषि योजना विश्लेषकों को और किसान संगठनों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री इस बार एक नयी विस्तृत फसल बीमा योजना की घोषणा करेंगे जिससे पूरे देश में किसानों का आत्महत्या करना बंद हो सकेगा, लेकिन मोदी ने निराश किया।
लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि अपने सार्थक प्रयासों को प्रधानमंत्री ने खूब भुनाने की कोशिश की। कुछ अच्छी सामाजिक सुरक्षा योजनायें जैसे प्रधानमंत्री जन-धन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, बीमा योजना, अटल पेंशन योजना आदि की चर्चा कर मोदी ने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाई। हालांकि कुछ योजनायें पूर्व की यूपीए सरकार में रही हैं खाली उनका नाम व थोड़ा स्वरूप बदला है।
मोदी ने अपने भाषण में किसानों के प्रति सरकार के रुझान की झलक लगातार देने की कोशिश की। यूरिया पर नीम की परत, देश के बचे 18,500 गांवों में 1000 दिन में ही बिजली की लाइन, फसल बर्बादी पर किसानों की सब्सिडी 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत करना, आदिवासियों और दलितों को उद्यमी बनाने के लिए बैंकों से ऋण आदि इस कोशिश को दर्शाते हैं। प्रधानमंत्री ने हाल में संसद की कार्यवाही बाधित होने की चर्चा न करते हुए भी कहा ‘मेरी सरकार पर एक नए पैसे के भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है’ शायद मोदी का ललितगेट और व्यापमं की आंच से अपनी सरकार को बचाने का एक प्रयास था।
मोदी ने यह कह कर कि सन 2005 में बने मनी लान्डरिंग कानून के बाद से जहाँ कांग्रेस के आठ साल के शासन काल में मात्र 5500 मुकदमे दर्ज हुए वहीं वर्तमान डेढ़ साल के मोदी के शासन काल में 4500 मामले दर्ज हुए। शायद भ्रष्टाचार के हाल के आरोपों से बचने का यह मोदी का पहला प्रयास था।
मोदी ने यूरिया पर नीम की परत चढ़ाने की योजना की वाहवाही लूटने का अपने भाषण में कई बार प्रयास किया। कहना न होगा कि पिछले कई दशकों से सरकार यूरिया निर्माता कंपनियों को सब्सिडी देती है ताकि किसानों के हित में इसका मूल्य कम रहे। लेकिन यह यूरिया नेपाल और बांग्लादेश को तस्करी के माध्यम से जा रही है। तमाम अन्य उद्योगों में नाइट्रोजन और अमोनिया गैर-कानूनी तरीके से इस्तेमाल की जा रही है। याने किसानों के लिए दी जाने वाली सब्सिडी धन्ना-सेठों की तिजोरी में जा रही है। यह बात कई दशकों से हो रही है लेकिन कभी भी किसी सरकार के ध्यान में नहीं आया कि इसका कोई स्थाई समाधान ढूँढा जाये। मोदी सरकार ने यूरिया पर नीम की परत चढ़ाने का फैसला किया। इससे यह यूरिया अब रासायनिक उद्योगों में अवैध तरीके से इस्तेमाल नहीं होगी और नीम की परत की वजह से किसान भी यूरिया की खपत दस प्रतिशत कम करेगा। साथ ही नीम की परत कीटनाशक का कार्य भी करेगी। इससे सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी 4500 करोड़ रुपये कम होगी।
आलोचकों की विश्वशनीयता पर हमला करते हुए मोदी की कोशिश थी कि इन्हें निराशावादी, कुंठाग्रस्त और रुग्ण मानसिकता वाला बताया। अगर उनके ‘सवा करोड़ देशवासियों की टीम इंडिया’ वाला जुमला और इसे एक कर के देखें तो मोदी यह बताने का प्रयास कर रहे थे कि जो सरकार कर रही है उसे पूरे भारत की स्वीकृति है और जो इसका विरोध करता है वह भारत विरोधी बीमार मानसिकता का है।
कुल मिलाकर मोदी अपने भाषण कला के पूरे फॉर्म में नहीं नजर आये शायद राजनीतिक बाध्यताओं की वजह से। एक साल पहले के मोदी अलग थे।

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