लापरवाह चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रहा स्वास्थ्य महकमा

  • चिकित्सकों की लापरवाही से मरीजों की जान जाने का मामला

 वीरेंद्र पांडेय
लखनऊ। राजधानी के अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीज की जान चली जाना या शरीर के किसी अंग का खराब हो जाना आम बात हो गयी है। इलाज के दौरान मरीज की मौत होने पर अक्सर चिकित्सकों पर लापरवाही का आरोप लगने लगा है। इसके बावजूद मरीजों के प्रति चिकित्सकों की कोई जिम्मेदारी तय होती नजर नहीं आ रही है। वहीं जिम्मेदार अधिकारी मरीज के इलाज में लापरवाही करने वाले चिकित्सकों की जिम्मेदारी तय करने और उनके खिलाफ कार्यवाही करने की बजाय महज खाना पूर्ति कर रहे हैं।
तीन महीने से न्याय के लिए भटक रहा पिता
तीन महीने पहले चिकित्सक तथा नर्स की लापरवाही के चलते एक बच्चा अन्तिम समय में अपने मां-बाप से बात तक नहीं कर सका। अपने जिगर के टुकड़े को अपने आंखों के सामने दम तोड़ता देखने के बाद भी एक पिता कुछ न कर सका । उस दिन के बाद से लगातार पिता अपने स्वर्गवासी बच्चे को न्याय दिलाने के दर-दर भटक रहा है। पीडि़त ने तीन महीने में कम से कम दस बार सिविल अस्पताल के चक्कर लगाये होंगे, उसका मकसद अपने बच्चे को न्याय दिलाना और उसकी तरह किसी और मजबूर मां-बाप के बच्चे की जान चिकित्सकों की लापरवाही की भेंट चढऩे से बचाना है। इस मामले में सिविल अस्पताल के अधिकारियों ने पीडि़त से कई बार पूछताछ भी की लेकिन लापरवाह चिकित्सक और नर्स पर कार्रवाई नहीं हुयी। जानकारों की मानें तो आने वाले समय में भी उन दोनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी सिर्फ कागजों का खेल खेलने में व्यस्त हैं।
तीन साल से अस्पताल के चक्कर काट रहा पीडि़त
इन्दिरानगर स्थित इस्माइलगंज निवासी राकेश कुमार मेहरोत्रा (55) के आंखों की रोशनी गये तीन साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी वो आंखों की रोशनी वापस लाने के लिए नेत्र रोग विभाग के चक्कर लगा रहे हैं। राकेश कुमार मेहरोत्रा ने बताया कि तीन साल पहले आंखों में धुंधलापन और दर्द की समस्या होने पर केजीएमयू में ही आपरेशन कराया था। उसी दौरान उनके आंखों की रोशनी चली गयी थी। उसके बाद चिकित्सकों ने कहा था कि धीरे-धीरे रोशनी आ जायेगी। लेकिन रोशनी आना तो दूर अब उनको दिखाई देना ही बन्द हो गया है।

नर्स बोली चाय पिलाओ ठीक हो जायेगा

एलडीए कॉलोनी निवासी कानपुर रोड निवासी सुबोध कुमार की सास राजरानी को सांस लेने में तकलीफ थी। परिजन उन्हें लेकर सिविल अस्पताल की इमरजेन्सी में पहुंचे। यहां उन्हें भर्ती कर लिया गया। इसके बाद तबीयत स्थिर होने पर इमरजेन्सी में डॉक्टरों ने उन्हे द्वितीय तल के वार्ड में शिप्ट कर दिया गया। सुबोध के अनुसार रात तकरीबन एक बजे सास की तबियत बिगड़ी। कई बार डॉक्टर को बुलाया गया पर कोई सुनवाई नहीं हुई। तीमारदारों ने वार्ड में तैनात नर्स से काफी गुजारिश की। सुबह तीन बजे फिर नर्स को मरीज की स्थिति खराब होने की जानकारी दी गई। नर्स ने तीमारदारों से कहा कि दवा की नहीं बल्कि गर्म चाय की जरूरत है। उन्हें चाय पिलाओ उसके 10 मिनट बाद स्ट्रेप्सिल खिलाओ, आराम मिल जायेगा। यह कह कर नर्स चली गई। आखिर में सुबह तकरीबन सवा सात बजे बुजुर्ग की सांसे थम गई।

ट्रॉमा में आपरेशन के बाद चली गई आंखों की रोशनी

बीते महीने बिहार के बक्सर निवासी रामपित्त महतो अपने दस साल के बेटे निरंजन के साथ आजमगढ़ आए थे। पांच जुलाई को निरंजन छत से नीचे गिर गया था। उसके सिर में गम्भीर चोटे आई। सिर से खून का रिसाव होने लगा। डॉक्टरों ने प्राथमिक इलाज के बाद बच्चे को केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया। गम्भीर अवस्था में परिजन रात में बच्चे को ट्रॉमा सेंटर ले आये। डॉक्टरों ने सीटी स्कैन समेत अन्य दूसरी जांच के बाद ऑपरेशन की बात कही। चिकित्सकों ने बच्चे के सिर का ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के चार घंटे बाद मासूम होश में आया। लेकिन उसने अपनी आंखों के आगे अंधेरा छाने की शिकायत की। इसकी जानकारी परिजनों ने डॉक्टर को दी। डॉक्टर ने हप्ते भर में सबकुछ ठीक होने की बात कही, लेकिन तीन सप्ताह बीतने के बाद भी निरंजन के आंखों की रोशनी वापस न आ सकी।

क्या था मामला

तेलीबाग खरिका की कुम्हार मंडी निवासी संतोष राय का बेटा वत्सल (11) वृंदावन कॉलोनी स्थित सेंट फ्रांसिस स्कूल में कक्षा पांच का छात्र था। परिजनों के मुताबिक कुछ दिन पहले उसके पैर में चोट लगी थी। इस वजह से पैर सूज गया था और उसमें दाने निकल आए थे। वत्सल का इलाज सिविल अस्पताल से चल रहा था। इसी बीच एक दिन बच्चे की हालत अधिक बिगडऩे पर परिवार के लोग सिविल अस्पताल ले गए। वहां इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया और हालत गंभीर बताकर पेशेंट को इमरजेंसी वार्ड में ही भर्ती कर लिया। संतोष का आरोप है कि बच्चे की हालत बिगडऩे पर वार्ड में मौजूद नर्स से डॉक्टर को बुलाने का आग्रह किया गया था लेकिन उसने डॉक्टर को नहीं बुलाया। नर्स ने अपनी मर्जी से बच्चे को कोई इंजेक्शन लगा दिया। इसके चंद मिनटों बाद ही वत्सल की हालत और अधिक बिगडऩे लगी। तब डॉक्टर को बुलाने के लिए नर्स से दोबारा आग्रह किया गया लेकिन नर्स ने परिजनों को डांट-फटकार कर शांत करा दिया। आखिरकार एक घंटे बाद चिकित्सक मौके पर पहुंचे और उन्होंने पेशेंट की जांच करने के तत्काल बाद बच्चे को ड्रिप लगाने का निर्देश नर्स को दिया। इसके कुछ ही क्षणों बाद बच्चे की मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि सिविल अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी अपने चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी वजह से बच्चे की मौत के कारणों की जांच करवाये बिना चिकित्सकों ने फैसला सुना दिया कि बच्चे की मौत खून का थक्का जमने वाली बीमारी के कारण हुई। जबकि अस्पताल की तरफ से अब तक बच्चे की कोई जांच ही नहीं कराई गई थी।

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