लखनऊ में तैयार हो रहे दुर्लभ प्रजाति के पौधे

आयुर्वेदिक महत्व वाले पौधों को भी तैयार किया जा रहा

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। कुकरैल नर्सरी में दुर्लभ प्रजाति के पौधे तैयार किए जा रहे हैं। इसमें रेगिस्तान में उगने वाले अफोह नामक पौधे की प्रजाति को विपरीत परिस्थितियों में जिन्दा रखने का Captureसफल प्रयास किया गया है। इसके अलावा धार्मिक और आयुर्वेदिक महत्व वाले पौधों को भी तैयार किया गया है। कई पौधे 100 साल से भी अधिक आयु वाले हैं, जिनमें वरना, दहिया, महोगिनी, सिहोर, जंगली बादाम, गुलाबी तून का पौधे शामिल है।
राजधानी में तैयार हो रहे दुर्लभ प्रजाति के पौधों की मांग उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य प्रदेशों से भी हो रही है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने में पेड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका होने की वजह से पौध रोपण को भी सरकार की तरफ से बढ़ावा दिया जा रहा है, इसलिए सडक़ों के किनारे ऐसे पेड़ों को लगाने की योजना बनाई जा रही है जो कम पानी और विपरीत परिस्थितियों में भी जिन्दा रह सकें। कुकरैल नर्सरी में जिन पौधों की प्रजातियों को विपरीत परिस्थिति में रहने के लिए तैयार किया गया है। वे सभी देशज हैं। इनमें कुछ ऐसे पेड़ भी हैं जिनसे हमारा जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी रूप में अभिन्न जुड़ाव रहता है। देश की जनसंख्या में तेजी से बढ़ोतरी तथा विकास कार्यों का सबसे बुरा असर देशज पेड़ों को ही भुगतना पड़ रहा है। दरअसल ये पेड़ प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को आर्थिक लाभ नहीं देते हैं। इसी कारण अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। इनकी अनेक प्रजातियां समाप्त होने की कगार पर हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो पृथ्वी पर पेड़ पौधों की लगभग दो लाख प्रजातियों की पहचान हो चुकी है। प्रदेश में पेड़ों की ऐसी कई प्रजातियां हैं, जो सदियों से मनुष्यों के लिए चिरपरिचित रही हैं लेकिन लोभ और उपभोगवादी दृष्टिकोण के कारण कई पेड़ों की प्रजातियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
अवध वन प्रभाग के डीएफओ एस.सी. यादव के मुताबिक अफोह देशज वृक्ष है। यह हमारी अमूल्य धरोहर है। इनका ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व पर्यावरणीय महत्व है। इन वृक्षों की ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, वरना सदियों से मनुष्य के साथी और जीवनदायक व आश्रयदायक पेड़ मात्र किताब के पन्नों में सिमट जायेगा। इस मामले को गंभीरता से लेकर विलुप्त हो रहे पौधों की प्रजातियों को देश के कई स्थानों से एकत्रित करके उनकी नर्सरी तैयार कराई गई है।
इनमें कल्पवृक्ष, कैथ, सिहोर, ढाक, बीजासाल, सादन, पानन, तमाल, वरना, माहेगिरी, जंगली बादाम, आल, हल्दू, खिरनी, पीलू, हरड़, ढेरा, करधई और अफोह मुख्य हैं। इन वृक्षों की कमी के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार हैं। जिस तरह बाघ, चीता, गैंडा, कृष्णमृग जैसे जंतुओं को बचाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं, उसी तरह संकटग्रस्त अफोह और अन्य देशज प्रजातियों के वृक्षों को भी बचाए जाने की जरूरत है।

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