रेस्पाइरेटरी विभाग को मशीनों की दरकार

विभाग ने शासन को मशीन उपलब्ध कराने के लिए भेजा प्रोजेक्ट, चाहिए 9 करोड़ का बजट

शासन की तरफ से अभी तक नहीं पास किया गया बजट, मरीजों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधायें देने का दावा साबित हो रहा फेल

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। किंगजार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के रेस्पाइरेटरी मेडिसिCaptureन विभाग की ओपीडी में रोजाना तीन सौ से अधिक मरीज इलाज के लिए आते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के चलते उनके इलाज में चिकित्सकों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। रेस्पाइरेटरी मेडिसिन विभाग में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को बेहतर इलाज मुहैया कराने के लिए विभाग द्वारा शासन से कुछ उपकरणों की मांग की गयी थी, लेकिन एक लम्बा अरसा बीतने के बाद भी उपकरण आना तो दूर की बात अभी तक शासन की तरफ से इसके लिए बजट को मंजूर तक नहीं किया गया है।
मरीजों के बेहतर इलाज के लिए विभाग को जिन उपकरणों की दरकार विभाग को है, उनमें इन्डोबोकल अल्ट्रासाउण्ड, बॉडी पैथोलाज्मोंग्राफी, स्लीप मशीन, वाइपपैप मशीन आदि शामिल हैं। जानकारों की मानें तो इन उपकरणों की कुल कीमत लगभग 9 करोड़ के आसपास है। रेस्पाइरेटरी मेडिसिन विभाग द्वारा शासन को प्रोजेक्ट बनाकर काफी पहले दे दिया गया है। इसके पास होते ही मरीजों को और बेहतर इलाज मिलने की उम्मीद है। रेस्पाइरेटरी मेडिसिन विभाग की तरफ से जिस इन्डोबोंकल अल्ट्रासाउण्ड मशीन की मांग की गयी है, उसके आ जाने से मरीजों को फेफड़ों में होने वाली गांठ की जांच के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा, बल्कि उनकी जांच विभाग में ही हो जाया करेगी। इस मशीन के जरिये फेफड़ों में होने वाले टीबी तथा कैंसर का पता लगाना आसान होगा।

पूरे प्रदेश में नहीं है बॉडी पैथोलॉज्मोग्राफी
चिकित्सकों के अनुसार बॉडी पैथोलॉज्मोग्राफी मशीन चिकित्सा क्षेत्र के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण उपकरण है। 60 लाख की कीमत वाली ये मशीन फेफड़े सम्बन्धी बीमारियों के शोध में सहायक होती है। विशेषज्ञों की मानें इस उपकरण का चिकित्सा क्षेत्र में इतना महत्व होने के बाद भी केजीएमयू ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में यह मशीन नहीं है, जिसके कारण शोध कार्यों में चिकित्सकों को समस्या का सामना करना पड़ता है।

एक मशीन वह भी खराब

विभाग में एक ही स्लीप मशीन है, वो भी आये दिन खराब रहती है। यहां आने वाले मरीजों को स्लीप मशीन से खर्राटे की जांच की जाती है। मशीन खराब होने के चलते मरीजों की जांच में काफी समस्या होती है। वहीं रेस्पाइरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डा. सूर्यकान्त ने बताया कि हमने शासन से चार स्लीप मशीनों की मांग की है। उन्होंने बताया कि हमारे यहां विभाग में मौजूद स्लीप मशीन अक्सर खराब रहती है। इस कारण फिजियोलॉजी डिपार्टमेन्ट में मौजूद स्लीप मशीन से मरीजों की जांच करवानी पड़ती है। स्लीप मशीन से सोते समय खर्राटे आने वाले कारणों का पता लगया जाता है। साथ ही दिमाग की गतिविधियों का भी इस मशीन के माध्यम से पता किया जाता है। यह बेहद ही महत्वपूर्ण उपकरण है। डॉ. सूर्यकान्त का कहना है कि हमारे यहां लोगों में एक भ्रामक धारणा है कि खर्राटे आने का मतलब गहरी नींद है, परंतु सच तो यह है कि खर्राटे लेना गहरी नींद आना नहीं बल्कि एक प्रकार की बीमारी है। उन्होंने बताया कि बुलकार्क रिसर्च इंस्टीट्यूट में 14 लैब एक साथ चलायी जाती हैं। वहां पर लोगों मेें खर्राटे को लेकर काफी जागरूकता है। हमारे यहां इसको महत्वपूर्ण नहीं माना जाता है। जबकि हमारे यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों में 30 साल से ज्यादा उम्र के मरीजों में से 4 प्रतिशत पुरूष तथा 2 प्रतिशत महिलायें होती हैं जिनमें खर्राटे आने की समस्या पाई जाती है। खर्राटे लेने को चिकित्सा की भाषा में स्लीप एपनिया भी कहा जाता हैं। दुनियाभर में लगभग हर 5 में से एक व्यक्ति इससे पीडि़त है। ऐसा अनुमान है कि लगभग 45 प्रतिशत पुरुष और 30 प्रतिशत महिलाएं खर्राटे की समस्या से पीडि़त रहते हैं। खर्राटे लेने वाले व्यक्ति को समाज में कई बार सोते समय तेज आवाज के खर्राटों के कारण शॄमदगी भी झेलनी पड़ती है। खर्राटों के कारण लोगों का मजाक भी उड़ाया जाता है। खर्राटे लेते समय कभी-कभी ठीक से सांस लेने में तकलीफ हो सकती है और 10 सेकंड तक श्वास नहीं ले पाने से शरीर में आक्सीजन का पर्याप्त संचारण नहीं होता है। ऐसे में पूरी नींद से उठने के बाद भी आलस लगना, कमजोरी और चिड़चिड़ापन होना आम बात हो जाती है। खर्राटे और कमजोरी की ज्यादा समस्या होने पर डॉक्टर स्लीप स्टडी करके मरीज का इलाज करते हैं।

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