रेल हादसों से कब सबक लेगी सरकार

सवाल यह है कि आखिर यात्रा के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली ट्रेनें यात्रियों के लिए काल क्यों बनती जा रही हैं? क्या रेल मंत्रालय हादसों से सबक लेने को तैयार नहीं है? क्या ऐसी ही लचर व्यवस्था के बूते सरकार बुलेट ट्रेन चलाने का सपना देख रही है? क्या यात्रियों के जान-माल की सुरक्षा की गारंटी रेलवे की जिम्मेदारी नहीं है?

sajnaysharmaकानपुर में एक बार फिर यात्री ट्रेन हादसे का शिकार हो गई। कानपुर से करीब 70 किमी की दूरी पर स्थित रूरा स्टेशन के पास सियालदह-अजमेर एक्सप्रेस के 15 डिब्बे पटरी से उतर गए। हादसे में कम से कम चार दर्जन यात्री घायल हो गए। सरकार ने हादसे की जांच के आदेश दिए हैं क्योंकि अधिकांश रेल हादसों की तरह इस दुर्घटना के कारणों का भी रेलवे को पता नहीं है। केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने मुआवजे का ऐलान भी कर दिया है। सवाल यह है कि आखिर यात्रा के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली ट्रेनें यात्रियों के लिए काल क्यों बनती जा रही हैं? क्या रेल मंत्रालय हादसों से सबक लेने को तैयार नहीं है? क्या ऐसी ही लचर व्यवस्था के बूते सरकार बुलेट ट्रेन चलाने का सपना देख रही है? क्या यात्रियों के जान-माल की सुरक्षा की गारंटी रेलवे की जिम्मेदारी नहीं है? देश में इस वर्ष कम से कम एक दर्जन से अधिक ट्रेनें बड़े हादसों का शिकार हुईं हैं। हाल के कुछ वर्षों में सबसे बड़ा रेल हादसा गत माह कानपुर के पुखरायां में हुआ। इस दुर्घटना में पटना-इंदौर एक्सप्रेस की 14 बोगियां पटरी से उतर गई थीं। हादसे में कम से कम 150 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 200 से अधिक लोग जख्मी हो गए थे।
सवाल यह है कि ट्रेनें बार-बार दुर्घटना का शिकार क्यों हो रही हैं जबकि हर दुर्घटना के बाद रेल मंत्रालय अधिक सुरक्षित रेल यात्रा का दावा करता है। तमाम इंतजाम की बात करता है। लेकिन फिर कोई न कोई ट्रेन हादसे का शिकार हो जाती है। ये दुर्घटनाएं तब हो रही हैं जब रेलवे की सुरक्षित यात्रा को सुनिश्चित करने के लिए भारी भरकम अमला है। विशेषज्ञों की टीम है। ट्रैक का नियमित निरीक्षण किया जा रहा है। सिग्नल सिस्टम है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर खामी कहां है। क्या रेलवे तमाम जांचों के बावजूद इनको ठीक नहीं करा पा रही है या फिर इन जांच रिपोर्टों और इसमें दिए गए सुधारों की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डालकर निश्ंिचत हो जाती है। जिस तरह रेल हादसे हो रहे हैं, उससे तो यही लगता है। यदि विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर काम किया जाता तो निश्चित रूप से सुरक्षा कुछ तो मजबूत होती। सरकार को समझना चाहिए कि यदि ऐसे ही हादसे होते रहे तो यह रेलवे के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है। ऐसे हादसों से सरकार को सबक लेने की जरूरत हैं। सरकार को चाहिए कि वह एक बार फिर से रेलवे के सुरक्षा मानकों की समीक्षा करे और खामियों को ठीक करे अन्यथा ट्रेनें हादसों का शिकार होती रहेंगी और जान-माल का नुकसान होता रहेगा।

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