रूस को सबक सिखाने वालों को लेने के देने पड़ रहे

शानदार मिलिट्री परेड के बाद जब अपने हाथों में पोस्टर और वीरगति को प्राप्त अपने प्रियजनों के बड़े-बड़े फोटो लेकर लाल चौक पर लाखों मास्कोवासियों की भीड़ उमड़ी तो संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून इसे पुतिन विरोधी प्रदर्शन मान बैठे। उन्होंने खुद यह स्वीकार किया।
-विनय शुक्ला

जनवरी में अपनी भारत यात्रा के दौरान नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ प्रेस सम्मलेन में एक ‘प्लांटेड’ प्रश्न का उत्तर देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कड़े शब्दों में घोषणा की थी कि यूक्रेन के संकट के लिए रूस को दुनिया ने राजनीतिक अलगाव में डाल दिया है और उसके खिलाफ प्रतिबंधों का शिकंजा और कसा जायेगा अगर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया।
यही नहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के नेतृत्व में पश्चिमी देशों के नेताओं ने 9 मई को जर्मनी पर विजय की 70वीं जयंती की परेड और समारोहों में भाग लेने से इंकार करके रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के राजनयिक बहिष्कार का जबरदस्त प्रयास किया।
विश्व युद्ध में मारे गए सोवियत संघ के 2 करोड़ 70 लाख नागरिकों को श्रद्धांजलियां देने के लिए भारत और चीन के राष्ट्रपतियों की ऐतिहासिक लाल चौक पर उपस्थिति और इतिहास में पहली बार वहां रूसी सेनाओं के साथ भारत और चीन की सैन्य टुकडिय़ों की परेड ने न केवल रूस के आर्थिक और राजनयिक बहिष्कार को विफल किया बल्कि पुतिन के साथ रूस की जनता को और एकजुट कर दिया।
शानदार मिलिट्री परेड के बाद जब अपने हाथों में पोस्टर और वीरगति को प्राप्त अपने प्रियजनों के बड़े-बड़े फोटो लेकर लाल चौक पर लाखों मास्कोवासियों की भीड़ उमड़ी तो संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून इसे पुतिन विरोधी प्रदर्शन मान बैठे। उन्होंने खुद यह स्वीकार किया। विजय दिवस की यह एक परम्परा बन गई है कि देशभर में लाखों-करोड़ों लोग युद्ध में लड़े अपने माता-पिताओं और दादा-दादियों की याद में ‘अमर रेजीमेंट’ के मार्च निकालते हैं। स्वाभाविक ही है कि इसका असर यूरोप की सोच पर भी हुआ।
10 मई को जर्मनी की चांसलर एंजेला मेर्केल पश्चिम की रूस विरोधी एकजुटता को भुला कर मास्को में ‘अज्ञात सैनिक’ के स्मारक पर जलती अमर ज्योति पर फूल मालाएं अर्पित करने आईं और दो दिन बाद ओबामा के निर्देश पर अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन कैरी अपने रूसी समकक्ष सेर्गेई लवरोव और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ वार्ता के लिए काला सागर तट पर स्थित रूसी सेहतगाह सोची पहुंचे और सोमवार 18 मई को अमेरिकी उपविदेश मंत्री विक्टोरिया नूलंड उप-विदेश मंत्री स्तर पर वार्ता के लिए मास्को पधारीं। उल्लेखनीय है कि यह वही नूलंड हैं जिन्होंने यूक्रेन के भूतपूर्व राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच के खिलाफ राजधानी कीयेव के ‘स्वतंत्रता मैदान’ में डेरा डाले प्रदर्शनकारियों को पैटीका बांटी थीं और जिन्हें लोकतांत्रिक रूप से चुने गए यूक्रेनी राष्ट्रपति के विरुद्ध ‘दक्षिण पंथी फासिस्ट क्रांति’ की ‘मिडवाइफ’ यानी दाई के रूप में जाना जाता है।
तो आखिर हुआ क्या? इसका जवाब राष्ट्रपति रीगन की सरकार में भूतपूर्व उप-वित्त सचिव और ‘रीगानोमिक्स’ के एक रचयिता पॉल क्रेग रॉबर्ट्स ने अपने लेख में दिया है। उनका मानना है कि लाल चौक में विजय दिवस की शानदार परेड में भारत और चीन के नेताओं की उपस्थिति के कारण वही कैरी जो 9 मई को रूस की खिल्ली उड़ा रहे थे, दो दिन बाद 11 मई को रूस रवाना हो रहे थे और 12 मई को पुतिन उनसे मिलने को रवाना हो गए। शायद वाशिंगटन को थोड़ी अकल आ रही है। विजय दिवस के समारोहों ने दर्शाया कि रूस को अलगाव में डालने की वाशिंगटन की कोशिशें बुरी तरह नाकाम रहीं। उसके यूरोपीय ‘सामंत’ भी अब समझने लगे कि अमेरिका का एकछत्र राज अब अस्ताचलगामी है। जाहिर है कि पुतिन के खिलाफ पश्चिम की धमकी की नीति फेल हो गई और अब चापलूसी की बारी लगती है। यूरोपीय संघ की राजधानी बु्रसेल्स से संकेत मिल रहे हैं कि यूक्रेन को लेकर लगाए रूस विरोधी प्रतिबंध इस साल के अंत तक उठा लिए जायेंगे।

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