रूस की नए सिरे से खोज की आवश्यकता

विनय शुक्ला
आगामी दिसंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मास्को यात्रा की बड़ी जोर-शोर से तैयारियां जारी हैं। क्रेमलिन में रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी की सालाना शिखर वार्ता का पोलिटिकल और डिफेन्स एजेंडा तैयार करने के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर मास्को की यात्रा कर चुके हैं।

यही नहीं रूस में कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने के लिए मोदी सरकार के कई अन्य मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी भी मास्को के चक्कर लगा चुके हैं और आशा है कि यहां की सडक़ों पर चल कर कम से कम उन्हें इतना तो आभास हो गया होगा कि रूस वैसा देश नहीं है जैसा दैनंदिन उन्हें अखबारों में पढऩे को मिलता है।
मास्को में सेवारत एक वरिष्ठ भारतीय राजनयिक ने निजी बातचीत में शिकायत की कि भारत में आम लोगों को तो छोडिय़े, सरकारी अधिकारी तक रूस की असलियत से अनभिज्ञ हैं क्योंकि इस देश के बारे में सारी जानकारी पश्चिमी मीडिया की छलनी से छन कर ही भारत के मेनस्ट्रीम प्रेस में पहुंचती है। इसीलिए राजनीतिक स्तर पर लिए गए फैसलों तक को अमली जामा पहनाना बड़ा मुश्किल हो जाता है।
वैसे तो असलियत में रूसी नौकरशाह भी फरिश्ते नहीं हैं, फिर भी वे भारतीय नौकरशाही से इसलिए भिन्न हैं कि उन्हें कम-से-कम एक हजार साल से अपने, रूसी साम्राज्य के निर्माण, पुनर्निर्माण और संचालन का अनुभव है जबकि भारत की नौकरशाही और उससे जुड़े वर्ग आजादी से पहले, कम-से-कम दो सौ साल तक सिर्फ पराये, औपनिवेशिक शासकों के हितों और आदेशों का आदर और पालन करते थे।
आज के रूस को समझने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि इसके बिना हमारी ‘विशिष्ट सामरिक साझेदारी’ को आगे बढ़ाना कठिन होगा। सबसे पहले यह कि यहां के लोग उसी मिट्टी के बने हैं जिन्होंने ग्रेट ब्रिटेन की तरह दुनिया में सबसे बड़ा, दो महाद्वीपों-यूरोप और एशिया में फैला रूसी साम्राज्य बनाया था। इसीलिए रूस के साथ शक्ति की भाषा में बोलना या धमकियों से पेश आना व्यर्थ है।
अगर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत और अन्य उपनिवेशों की स्वतंत्रता के फलस्वरूप ब्रिटिश साम्राज्य का अस्तित्व समाप्त हो गया, तो 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद बचे रूसी संघ में आज भी सूरज नहीं डूबता। सबसे बड़ी बात यह है कि भूतपूर्व सोवियत संघ की अधिकांश औद्योगिक, टेक्नालॉजिकल क्षमता और प्राकृतिक संपदा आज भी रूस में है।
इसलिए आश्चर्य की कोई बात नहीं कि 25 साल से भी कम समय में रूस फिर से एक महाशक्ति के रूप में विश्व के मंच पर लौटा है। सीरिया में अपने तेवर दिखाकर रूस ने अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों को आश्चर्य में डाल दिया क्योंकि उनका मीडिया और विश्लेषक तो रोज रूस की दयनीय अर्थव्यवस्था, उसकी सेना की दुर्दशा के राग अलाप रहे थे।
भारत के पब्लिक ओपिनियन पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों और अधिकारियों के बयानों पर भी रूस-विरोधी पश्चिमी कुप्रचार की छाप नजर आती है।
एक ताजा उदाहरण लें 23 नवम्बर को भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी व्यावसायिक पत्र ने रूस को भारत से दुग्ध पदार्थों के निर्यात को शुरू करने में आ रही समस्याओं पर एक लेख छापा था। रूस की मांग है कि भारत से दुग्ध पदार्थों का आयात सिर्फ उन्हीं उत्पादकों से किया जायेगा जिनके पास कम से कम 1 हजार ढोर हैं, क्योंकि उनके स्वास्थ्य का सुचारू प्रबंध संभव है। रूस की इस मांग पर टिप्पणी करते हुए खाद्य पदार्थ निर्यात फेडरेशन के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा कि रूस पर पश्चिमी प्रतिबन्ध लगे हैं और इसका फायदा उठा कर हमें उनसे रियायतें मांगनी चाहिए।
हैरानी होती है कि ऐसे अधिकारी क्या खाक व्यापार करेंगे, जब उन्हें यही पता नहीं कि यूरोप से खाद्य पदार्थों के आयात पर रूस ने खुद जवाबी प्रतिबंध लगाये हैं। हम यहां मोलभाव कर रहे हैं, पर यूक्रन के संबंध में मास्को पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों की अवहेलना करने वाले देश अपने खाद्य पदार्थों से रूसी मंडी को पाट रहे हैं।
अस्त्रों का बाजार एक और क्षेत्र है जब पश्चिम के प्रचार से प्रभावित भारतीय प्रेस और विश्लेषक तोते की तरह रटते हैं कि रूस की ‘जेब खाली’ है इसलिए वह भारत को हथियार बेचने को आतुर है।
शायद उन्हें मालूम नहीं कि रूस में सालाना तीन लाख करोड़ रूबल (आजकल की विनिमय दर के अनुसार लगभग इतने ही रुपये) के अस्त्रों का उत्पादन होता है, जिसमें से दो लाख करोड़ के हथियार अपने लिए और एक लाख करोड़ के अस्त्रों का विदेशों को निर्यात होता है। यहां एक बात ध्यान देने योग्य है, रूस इससे दस गुना अधिक मूल्य की प्राकृतिक गैस का निर्यात करता है।
हमें इस गलतफहमी से उबरना चाहिए कि रूस से हथियार खरीद कर भारत मास्को पर अहसान कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका हालांकि कुल लागत के अनुसार भारत का प्रमुख अस्त्र सप्लायर बन गया है, परन्तु परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण में मदद, उनको किराये पर लेने जैसे संवेदनशील प्रश्नों में भारत को रूस का ही रुख करना पड़ता है।
आशा है कि दिसम्बर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मास्को यात्रा, रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी वार्ता रूस के साथ भारत के परंपरागत संबंधों में नई जान फूंकेगी।

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