रिफ्यूजियों के मुद्दे ने फिर जान फूंकी अलगाववादियों में

पश्चिमी पाकिस्तान से 1947, 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान होने वाले विस्थापितों के मुद्दे ने एक बार फिर अलगाववादी नेताओं में जान फूंक दी है। वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी के नाम से जाने जाने वाले इन विस्थापितों को राज्य का नागरिक बनाए जाने की राज्य सरकार की पहल का विरोध लगभग सभी राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने से हुर्रियती नेता सातवें आसमान पर पहुंच गए हैं। सबसे बड़ी चिंता अब यह है कि पिछले 6 महीनों से हिंसा की आग में झुलसे रहे कश्मीर को फिर से आग में झोंकने को अलगाववादियों को नया मुद्दा मिल गया है।
यह भी सच है कि सत्तर सालों से जम्मू कश्मीर में बिना नागरिकता के रह रहे लाखों वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी अब अपने आपको ठगा हुआ भी महसूस कर रहे हैं। कारण पूरी तरह से स्पष्ट है कि जिस राजनीतिक दल भाजपा ने उन्हें नागरिकता दिलवाने के नाम पर हमेशा वोट बटोरे थे वह यू टर्न ले चुकी है। दरअसल, भाजपा ने पीडीपी के समक्ष घुटने टेकते हुए इन रिफ्यूजियों को स्थायी नागरिकता देने के बजाय एक प्रमाणपत्र देने की सहमति पर अपनी मुहर लगाई हुई है।
8 जुलाई को बुरहान वानी की मौत के बाद जो हड़ताली कैलेंडर कश्मीर में ताल ठोंक रहा था अब उससे लोग उकताने लगे थे। दुखी कश्मीरियों के दबाव के आगे हुर्रियती नेताओं ने इस कैलेंडर में ढील देना आरंभ किया ही था कि राज्य सरकार के फैसले ने उनके आंदोलन में फिर से नई जान फूंक दी।
दरअसल अब हुर्रियत नेता पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजियों को मिलने वाले डोमिसाइल सर्टिफिकेट के फैसले को लेकर आंदोलन आरंभ कर चुके हैं। इन रिफ्यूजियों को 70 साल के बाद राज्य की नागरिकता देने का फैसला हुआ था पर यह किसी को गवारा नहीं हुआ। यही कारण था कि पीडीपी और भाजपा को छोड़ कर सभी राजनीतिक दल इस फैसले के विरोध में उठ खड़े हुए तो अलगाववादियों को भी लगने लगा कि वे अब इस मुद्दे पर कश्मीर को भडक़ा सकते हैं।
उन्होंने अपनी कारस्तानी शुरू भी कर दी है। सोमवार को कामयाब हड़ताल इस मुद्दे पर हो चुकी है। आगे की रणनीति बनाने की तैयारियां चल रही हैं। इस मुद्दे पर कम से कम 6 माह और कश्मीर को आग में झोंकने की जो रणनीति बन रही है और तैयारियां हो रही हैं उसमें पाकिस्तान भी अपना तडक़ा यह कह कर लगा रहा है कि भारत सरकार कश्मीर की डेमोग्राफी को बदलने की कोशिश में है। ऐसा ही आरोप अन्य राजनीतिक दल भी लगा रहे हैं।
रिफ्यूजियों के मुद्दे को लेकर हालांकि प्रत्यक्ष रूप से पीडीपी और भाजपा एक साथ खड़ी है पर अंदरूनी हालात यह हैं कि पीडीपी के कई नेता इसका विरोध कर रहे हैं। जब पीडीपी सत्ता से बाहर थी तो वह इसका विरोध करती रही और सत्ता में होते हुए नेशनल कांफ्रेंस ने इस मुहिम का कभी विरोध नहीं किया था।
इस मुद्दे पर राज्य के हालात यह हैं कि जहां कश्मीर में रिफ्यूजियों को लेकर विरोध प्रदर्शन और आंदोलन आरंभ हो चुके हैं वहीं जम्मू में इन रिफ्यूजियों द्वारा भी अपने हक की मांग को लेकर प्रदर्शन किए जा रहे हैं। विशेषकर वे राजनीतिक दलों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जम्मू कश्मीर की नागरिकता पाना अमेरीका की नागरिकता हासिल करने से भी मुश्किल है। दूसरे शब्दों में कहें तो अमेरीका में एक निर्धारित अवधि में रहने के बाद आपको नागरिकता मिल जाती है पर जम्मू कश्मीर में पिछले 70 सालों से रह रहे इन लाखों रिफ्यूजियों को आज भी नागरिकता नहीं मिली है।
प्रत्येक चुनाव में भाजपा ने इन रिफ्यूजियों के मुद्दे को भुनाया जरूर था। यह भी एक कड़वा सच है कि 70 सालों से जम्मू कश्मीर में रह रहे वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी सिर्फ संसदीय चुनावों में ही मतदान कर सकते हैं और नगरपालिका तथा विधानसभा सीटों के लिए होने वाले मतदान करने से वे वंचित हैं। राज्य सरकार की नौकरियों में भी उन्हें कोई अधिकार नहीं है। स्पष्ट शब्दों में कहें तो राज्य के नागरिकों को मिलने वाली सुविधाएं उनसे दूर रखी गई हैं।
और अब जब भाजपा राज्य में सत्ता में आई तो दो सालों की कोशिशों के बाद भी इन रिफ्यूजियों का कोई मसला हल होता नजर नहीं आया क्योंकि उन्हें पक्के तौर पर राज्य का नागरिक बनाए जाने का मुद्दा पीडीपी के दबाव के चलते ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और उसके स्थान पर उन्हें डोमिसाइल सर्टिफिकेट देने की घोषणा कर दी गई। यह सर्टिफिकेट पाकर भी खुश होने वाले इन रिफ्यूजियों को उस समय झटका लगा जब कांग्रेस और नेकां समेत अन्य राजनीतिक दलों ने हुर्रियत के विरोध का समर्थन कर डाला।
वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी फ्रंट के प्रधान लब्बा राम गांधी समेत इन रिफ्यूजियों के अन्य नेता भी अब अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्हें जो प्रमाणपत्र दिए जा रहे हैं वे केंद्र सरकार के मामलों में ही काम आने वाले हैं जबकि राज्य के नागरिकों को मिलने वाले अधिकारों से वे तब भी वंचित ही रह जाएंगे।
यही नहीं भाजपा ने 70 सालों से विस्थापितों के तौर पर रहने वाले इन रिफ्यूजियों के प्रत्येक परिवार को 35 लाख रूपया बतौर मुआवजा दिलवाने की उनकी मांग का समर्थन भी किया पर जब केंद्र तथा राज्य में वह सत्ता पर बैठी तो यह मुआवजा कम होकर 5 लाख पर आ गया। जबकि यह कड़वी सच्चाई है कि यह पांच लाख 1947, 1965 या 1971 में आए रिफ्यूजियों के परिवारों को दिया जाना है न कि आज के समय में 20 हजार परिवारों से 2 लाख बन चुके परिवारों को।

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