राष्ट्रीयता के बिना अंबेडकर की समरसता अधूरी

तरुण विजय
एक अजीब सा चलन चल पड़ा है जिसमें डॉ. भीमराव अंबेडकर की जीवन निष्ठाओं के विरोध में हर बात अंबेडकर समर्थन के नाम पर बढ़ाई जा रही है। अंबेडकर संविधान के निर्माता और विषमता के विरोधी थे। लेकिन जो संविधान के विरुद्ध जिहादी तत्वों का समर्थन करते हैं और खुले आम न्यायपालिका तथा न्यायाधीशों पर अपमानजनक शब्द प्रहार करते हैं, वे अंबेडकर का बोर्ड लगा कर जिहादी दलित वामपंथी गठजोड़ का वह जहर फैला रहे हैं। जिनसे सबसे ज्यादा आहत यदि कोई हो रहा है तो वह संविधान में बसी बाबा साहेब की आत्मा है।

बाबा साहेब अंबेडकर जीवन भर जातिभेद के विरुद्ध लड़ते रहे, सामाजिक समरसता के लिए काम करते रहे, उनके जीवन का ध्येय समाज को तोडऩा और विखंडित करना नहीं बल्कि विषमता की मानसिकता बदल कर देश और समाज में परिवर्तन लाना था। वह परिवर्तन सबको साथ लेकर ही संभव था। उन्होंने हिंदुओं के पाखंड और दोहरेपन पर कस कर प्रहार किया लेकिन हिन्दू समाज की आत्मीयता के साथ देश के सभी वर्गों को साथ जोड़े भी रखा। उनके लिए तो यह कल्पना ही नहीं हो सकती थी कि उनके नाम पर कुछ लोग देश तोडऩे वाले आतंकवादी जिहादी तत्वों के साथ देंगे तथा अंबेडकर जिन्दाबाद के खोखले नारों की हवा में भारत को बर्बाद करेंगे, ऐसे शब्द भी बोलेंगे। वास्तविकता यह है कि अगर अंबेडकर होते तो अब तक कश्मीर से धारा 370 समाप्त करने का सर्वस्वीकृत वातावरण भी बना दिया होता।
बाबा साहेब अंबेडकर की समरसता में राष्ट्रीयता सर्वप्रमुख थी। उन्होंने बौद्ध मत अंगीकार करने से पहले देश के सभी मतों-मतांतरों का गहन अध्ययन और विश्लेषण किया था। उनके पास ईसाई और मुस्लिम समाज के प्रमुख नेता अपने-अपने मतों की श्रेष्ठता सिद्ध करते हुए पहुंचे थे और हरसंभव प्रयास कर उन्हें इस बात के लिए राजी करना चाहा था कि वे ईसाई या इस्लाम मत को स्वीकार कर लें।
अंतत: अंबेडकर ने जिस भावना से बौद्ध मत अंगीकार किया वह भारत भारती के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा का ही परिचायक था। अपने लाखों अनुयायियों के साथ उन्होंने बौद्ध मत स्वीकार करने के बाद भी जब हिंदू कोड़ बिल का निर्माण किया गया, जिसे हिंदू समाज के लिए सुधारवादी एवं क्रांतिकारी विधेयक माना गया था, तो उसमें उन्होंने नवबौद्धों को शामिल किया था।
वे नहीं चाहते थे कि जो आस्थाएं भारत में जन्मी हैं और परस्पर एक-दूसरे से मिली हुई हैं, उनमें कभी भी किसी भी स्तर पर मतभेद एवं वैमनस्यता पैदा हो। वे यह भी नहीं चाहते थे कि भारत में शताब्दियों से चले आ रहे जीवन, मृत्यु एवं विवाह के परम्परागत संबंध टूट जायें।
उनके लिए भारत सर्वोपरि था, डॉ. अंबेडकर की पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ यानी ‘पाकिस्तान’ के बारे में मेरे विचार पुस्तक में उन्होंने बहुत ही स्पष्टता और प्रज्ज्वलता के साथ पाकिस्तान के पीछे छिपे जहरीले सांप्रदायिक, इस्लामी हिंसावादी और अतिवादियों के अभियान तथा राष्ट्रीयता की जमीन से जुड़ी मीमांसा की है।
यह बातें कम-से-कम जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में तो जरूर बतायी जानी चाहिए। यही बात है कि अंबेडकर अपने समसामयिक सभी नेताओं से अलग विशिष्ट एवं बड़े दिखते हैं, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें कभी महान नहीं माना।
अंबेडकर को चुनाव मे हरवाने तक के कांग्रेस ने निर्देश दिये थे। ऐतिहासिक पूना पैक्ट के बाद, जो हिंदू समाज की एकता और समरसता की दिशा में बहुत बड़ा कदम माना गया। डॉ. अंबेडकर की उदार ह्दय वाली राष्ट्रीय भावना को पत्थर पर उकेरते हुए सिद्ध करता है। अंबेडकर ने इतना ही तो मांगा था कि सफाई कर्मचारियों को मंदिर प्रवेश के लिए अन्य सभी जातियों की तरह ही समान अधिकार मिले। लेकिन, उन्होंने मद्रास के मंदिर प्रवेश के लिए दलितों को अनुमति न देने वाले विधेयक के पक्ष में वोट देने का निर्देश दिया और पूना पैक्ट को तोड़ा। कांग्रेस कभी नहीं चाहती थी कि उनका कद गांधीजी के समकक्ष हो जाये, जबकि कई संदर्भों में डॉ. अंबेडकर का कद गांधीजी से भी बड़ा था।
जब ब्रिटेन से बैरिस्टरी पास कर अंबेडकर बड़ौदा के सयाजीराव गायकवाड़ विवि में नियुक्ति पाकर हॉस्टल में रहने लगे, तो छह महीने तक छा़त्रावास अधीक्षक अंबेडकर नाम से यह मानता रहा कि वे ब्राह्मण हैं, छह महीने बाद जब अधीक्षक को यह पता चला कि अंबेडकर महार हैं, तो रात में ही बाबा साहब का सामान कमरे से बाहर फेंक कर उन्हें बाहर निकाल दिया।
अंबेडकर फूट-फूट कर रोये कि मेरा कुसूर क्या है, केवल यही कि मैं हिंदू हूं, उन्होंने हिंदू मत में व्याप्त पाखंड व दोहरे आचरण पर तीखे आघात किये और अपने अनुयायियों की बौद्ध मत में आस्था प्रबल करने के लिए ‘रिडल्स इन हिंदूइज्म’ अर्थात हिंदू धर्म की पहेलियां पुस्तक लिख कर देवी-देवताओं के पुराण प्रसंगों का खूब मखौल उड़ाया, पर उनकी नीयत साफ थी और ह्दय में भारत था। इसलिए इस पुस्तक पर कभी प्रतिबंध की मांग नहीं उठी।
विडंबना यह है कि आज भी देश के विभिन्न अंचलों में अनुसूचित जातियों पर वही अमानुषिक अत्याचार होते दिखते हैं, जिनसे डॉ. अंबेडकर जीवनभर लड़ते रहे थे। हर साल बाइस हजार से ज्यादा सफाई कर्मचारी सीवर की सफाई करते हुए मारे जाते हैं, जिन्हें मैंने राज्यसभा में स्वच्छता शहीद कहा, लेकिन इस पर सदन में न कोई शोर होता है और न विश्वविद्यालयों में हंगामा। यह परिस्थिति बदलनी चाहिए।

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