राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने की राह में बाधा दूर हो

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगडय़िा ने कहा है कि इस समय अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए किसी आंदोलन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं और उनसे यह अपेक्षा है कि वे संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाकर इस हेतु कानून को मंजूरी दिलाएं। आजकल रामजन्मभूमि पर मंदिर बनवाने के आंदोलन के लिए बौद्धिक समर्थन जुटाने में लगे सुब्रह्मण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री से अपेक्षा की है कि सर्वोच्च न्यायालय में मंदिर सम्बन्धी जो विवाद लंबित है उसकी प्रतिदिन सुनवाई कराकर फैसला कराएं। प्रतिदिन सुनवाई का आग्रह बाबरी मस्जिद के पक्षधारों ने भी किया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जिन तीन न्यायाधीशों के निर्णय पर पुनर्विचार याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं उन सभी ने माना है कि जहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी वहां मंदिर था, लेकिन तत्सम्बन्धी वाद का निर्णय देने में भूमि के तीन भागों में विभाजन का बहुमत से दिया गया निर्णय विवादों में घिर गया है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय को निर्णय लेना है।
रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद विषाद का कारण बनता रहा है। इस विवाद को हल करने के लिए अब तक बहुविधि प्रयास किए गए लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली। नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्वकाल में ढांचा ढहाए जाने के पूर्व एक प्रस्ताव पर प्राय: सहमति बन गई थी लेकिन यह लागू नहीं हो पाया। राजीव गांधी के कार्यकाल में मंदिर परिसर का ताला खुला और नव निर्माण के लिए शिलान्यास भी हुआ लेकिन विवाद का समाधान नहीं हुआ। 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी ढांचा ढहा दिया गया तब से रामलला की मूर्ति एक अस्थायी छाया में स्थापित है और उनकी सुरक्षा के ऐसे चाक-चौबंद प्रबंध किए गए हैं कि परिंदा भी पर न मार सके। दर्शन की अत्यधिक सुरक्षात्मक व्यवस्था भी जारी है। जिन लोगों के इस कथन पर कि यदि विवादित स्थल पर पहले से मंदिर होने का सबूत मिले तो वह मस्जिद का दावा छोड़ देंगे, न्यायालय के आदेश और दोनों पक्षों की निगरानी में पुरातत्व विभाग ने वहां उत्खनन किया जिनसे मिली सामग्री इस बात का प्रमाण है कि जहां ढांचा खड़ा किया गया वहां पहले मंदिर था यही नहीं बाबरी ढांचे के स्तम्भ आदि भी किसी मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। चंद्रशेखर ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में मक्का से जो फतवा प्राप्त किया था, वह भी मुसलमानों को मस्जिद का दावा ना करने की सलाह देता है। लेकिन विवाद जहां का तहां है क्योंकि मस्जिद के पक्षधर अब ढांचे नहीं भूमि पर हमारा दावा है- जो वक्फ बोर्ड की है, पर उतर आये हैं।
एक बात बहुत स्पष्ट है। अब विवादित स्थल पर मंदिर ही है और उसे कोई भी हटा नहीं सकता क्योंकि जब मूर्ति स्थापित हुई उस समय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत। कांग्रेस का ही बोलबाला था उस समय भी, मूर्ति हटाने के लिए वक्तव्य जरूर दिए गए लेकिन कोई आगे नहीं आया। प्रश्न केवल इतना है कि रामलला टाट की छाया में रहें या फिर हिन्दुओं की आकांक्षा के अनुरूप वहां भव्य मंदिर खड़ा किया जाये। यह अभियान बहुत पुराना है कि हिन्दू कोई मजहब या पंथ नहीं है और इस देश में रहने वाले सभी फिर उनकी उपासना पद्धति चाहे जैसी हो, हिन्दू हैं। राम सभी के पूर्वजो में हैं। आर्य समाज की तरह जो उन्हें ईश्वर का अवतार नहीं मानते, महापुरूष के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। पूजा पद्धति बदल जाने से न तो पुरखे बदलते हैं और न संस्कृति।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक भारत में रहने वाले सभी के पूर्वज समाज ही थे-के आधार पर सभी को हिन्दू मानते हैं। हिन्दू न तो कोई पंथ है और न कोई उपासना पद्धति। सर्वोच्च न्यायालय ने भी हिन्दुत्व को एक जीवन शैली कहा है जो सर्वे भवन्तु सुखिन: की अवधारणा पर है। लखनऊ के एक मुस्लिम विद्वान ने भारत की मस्जिदों को लिपिबद्ध किया है जिसमें लगभग 30 हजार मस्जिदों को मंदिर तोडक़र बनाया जाना माना गया है। राम जन्मभूमि के आंदोलन के साथ काशी का शिव मंदिर और मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि को भी मान्यता के अनुरूप स्वरूप देने का अभियान के दौरान संसद ने एक कानून बनाया कि जो पूजा स्थल 15 अगस्त 1947 के पूर्व जिस स्थिति में थे, उसी स्थिति में रहेंगे, उनमें कोई बदलाव नहीं होगा-रामजन्मभूमि को छोडक़र, क्योंकि उसका विवाद न्यायालय में लंबित है। मुसलमानों में यह आशंका रही है कि मामला केवल रामजन्मभूमि तक ही सीमित नहीं रहेगा। बाबरी मस्जिद पक्ष के एक वकील स्व. अब्दुल मन्ना का मैंने वर्षों पहले एक साक्षात्कार प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद हमारे लिए कोई मक्का मदीना नहीं है। हम उस पर इसलिए अड़े हैं कि कहीं उस पर से दावा छोडऩे के बाद हमें अन्य उन मस्जिदों को छोडऩे के लिए परेशान किया जाये, जिनके बारे में मंदिर तोडक़र बनाए जाने का दावा किया जा रहा है। यद्यपि इस आशंका का समाधान किया जा चुका है कि अब ऐसा सम्भव भी नहीं है, लेकिन बीच-बीच में कुछ लोगों द्वारा तीनों स्थल की मुक्ति की अभिव्यक्ति मस्जिद के लिए जिद करने वाले कट्टरपंथियों को मुखरित कर देती है और समझौते की दिशा में बढ़ रही गाड़ी को ब्रेक लग जाता है।

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