राम को भूल रही है मोदी सरकार!

अनिल उपाध्याय

poo1लखनऊ। हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की अलंबरदार बनी केन्द्र की मोदी सरकार को विरासत पर सियासत करने से भी परहेज नहीं है। जब मामला यूपी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जुड़ा हो तो मोदी सरकार सांस्कृतिक विरासत के विकास जैसे मुद्दे को भी सियासी चश्मे से देखना शुरु कर देती है। ये सब बेवजह नहीं हो रहा है दरअसल उसे यूपी में अपनी सियासी जमीन खिसकने का डर सता रहा है। ऐसे में मोदी सरकार के नुमाइंदो ने अयोध्या के विकास जैसे मुद्दे को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है। दरअसल एक साल पूरी होने का जश्न मना रही मोदी सरकार को यही डर सता रहा है कि कहीं यूपी के मुख्यमंत्री की ये तेजी भाजपा के हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद का लबादा ना उतार दे वो भी उस वक्त जब यूपी में एक साल बाद चुनाव होने हैं।
सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर्यटन के नजरिए से यूपी को दुनिया के नक्शे में स्थापित करना चाहते हैं। सरकार की सोच है कि ऐतिहासिक और धार्मिक नजरिए से महत्वपूर्ण स्थलों को विकसित करने से देश-दुनिया के पर्यटकों का रुझान यहां के लिए बढ़ेगा और इससे प्रदेश का पर्यटन उद्योग भी मजबूत होगा। इसके मद्देनजर मुख्यमंत्री ने विश्वप्रसिद्ध धार्मिक नगरी अयोध्या, कानपुर का ऐतिहासिक नाना राव पार्क और 1857 के गदर की गवाह लखनऊ की रेजीडेंसी को विकसित कर इन ऐतिहासिक जगहों पर लाइट एंड साउंड शो कराने का फैसला लिया था। इनके सौन्दर्यीकरण के लिए केन्द्र सरकार को पैसा देना था। केन्द्र से मिलने वाला ये पैसा राज्य सरकार के पास आता और फिर इन जगहों को पर्यटन के हिसाब से विकसित किया जाता। राज्य सरकार ने इसका पूरा मसौदा बनाकर केन्द्र के पास भेजा पर केन्द्र सरकार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ये पहल पसंद नहीं आयी नतीजतन इनके लिए पैसा नहीं दिया गया।
केन्द्र के इस रुख के बाद राज्य सरकार हैरानी में है
सबसे ज्यादा हैरानी तो इसलिए हुई कि जिस अयोध्या और रामलला के नाम पर भाजपा दिल्ली और यूपी की सत्ता पर काबिज हुई आखिर उसी अयोध्या में राम की पैड़ी का सौन्दर्यीकरण उसे क्यों खटकने लगा। 

ज्यादा पुरानी बात नहीं है। विवादित स्थल पर मंदिर बने या नहीं इसको लेकर विवाद हो सकता है पर अयोध्या को संवारने से किसी को भी ऐतराज नहीं था। हिन्दू और मुसलमान दोनों की फिरके के लोगों को भी इस पर आपत्ति नहीं थी पर मोदी सरकार को इसमें अपने वोट बैंक दरकने का डर सताने लगा। दिलचस्प बात तो यह है कि भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में भी अयोध्या को लेकर तमाम वादे थे। उस वक्त पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा था कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत के विकास के लिए जरूरी है। हालत ये है कि हिन्दुत्व का दंभ भरने वाली मोदी सरकार ने एक साल में हालात सुधारने के लिए कोई कोशिश नहीं की। जब सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ये पहल की तो उसमें भी अडंग़ा लगा दिया गया। यह उस अयोध्या का हाल है जहां एक मंदिर बनवाने के लिए होने वाली राजनीति में देश की सत्ता उलट-पलट होती रही है। आश्चर्यजनक है कि राम के नाम पर सियासत करने वाले राजनीतिक दलों और संगठनों में यहां के हालात सुधारने को लेकर कोई ललक नजर नहीं आती। राम की पैड़ी की बदहाल हालत इसका जीता जागता उदाहरण है।
कुछ ऐसा ही खेल कानपुर के ऐतिहासिक नाना जी राव पार्क और लखनऊ की रेजीडेन्सी के साथ भी हुआ। राम की पैड़ी के साथ इन जगहों पर भी प्रस्तावित लाइट एंड साउंड शो के लिए केन्द्र से एक भी ढेला नहीं मिला। सवाल ये उठता है कि आखिर भाजपा और मोदी सरकार ने यूपी सरकार के इस प्रस्ताव पर अडंग़ा क्यों लगाया। सियासी पंडितों की बात बाने तो ये पूरा मामला वोट बैंक से जुड़ा है। भाजपा मोदी के नेतृत्व के बाद हिन्दुत्व के एजेंडे पर और भी मुखर हुयी थी और उसके नेता अपने आपको इकलौता राष्टï्रवादी साबित करने में लगे हैं। यूपी में 2017 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है और भाजपा इस बार यहां अपनी खोयी जमीन पाने के लिए परेशान है।विकास को लेकर अखिलेश सरकार जिस तेजी से काम कर रही है उससे सबसे ज्यादा परेशान भारतीय जनता पार्टी ही है। समाजवादी श्रवण यात्रा ने मुख्यमंत्री की छवि को हिन्दू वर्ग में भी लोकप्रिय कर दिया और उसे लगने लगा कि राम की पैड़ी,नानाजी राव पार्क और रेजीडेंसी का विकास कर राज्य सरकार भाजपा के परम्परागत वोट पर सेंधमारी कर सकती है। वोट की इसी सियासत ने इस ऐतिहासिक स्थलों को वीरान का वीरान ही रहने दिया और राम नाम जप कर सत्ता तक पहुंची भाजपा को अब इसी नाम से डर सताने लगा है।

नौकरशाह भी हैं जिम्मेदार
मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट वाली इन तमाम योजनाओ को यूपी के अफसरों ने पर्यटन मंत्रालय के अधिकारियों के सामने बेहतर होमवर्क के साथ पेश नहीं किया गया नतीजतन प्रदेश के पर्यटन से जुड़ी इन योजनाओं को मंजूरी नहीं मिल सकी। मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले पयर्टन महानिदेशक अमृत अभिजात इन योजनाओं को मंजूर नहीं करा सके। सूत्रों ने बताया कि इसके साथ ही यूपी के पर्यटन से जुड़ी कई अन्य महत्वपूर्ण योजनाएं भी इसी के चलते लटक गयी जो मुख्यमंत्री की प्राथमिकता में थी।

भाजपा ने मुख्यमंत्री से कई बार अनुरोध किया कि यूपी के विकास के मुद्दे पर सभी दलों की बैठक बुला लें। चूंकि हमारी सरकार दिल्ली में है इसलिए विकास के मुद्दे पर हम केन्द्र की सरकार से बात कर सकते हैं पर प्रदेश सरकार की तरफ से इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई। मोदी राज में राम के नाम और काम पर अडंग़े की बात का वो माकूल जवाब नहीं दे सके।
-लक्ष्मीकांत वाजपेयी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष

ऐेतिहासिक नाना राव पार्क
नाना राव पार्क को कंपनी बाग भी कहा जाता है। ब्रिटिश शासन काल में इसे मेमोरियल वेल कहा जाता था क्योंकि 1857 के स्वतंत्रता युद्ध के समय नाना साहिब के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता सैनानियों ने लगभग 200 ब्रिटिश महिलाओं और बच्चों को इस कुएं में डाल दिया था। वह इमारत जिसमें नरसंहार हुआ उसे बीबीघर कहा जाता था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में इस पार्क का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है।

गदर की गवाह है रेजीडेंसी
रेजीडेंसी लखनऊ के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। रेजीडेंसी में कई इमारतें शामिल हैं। इसका निर्माण नवाब आसिफ.उददौला ने 1775 में शुरू किया करवाया था और 1800 ई.में इसे नवाब सादत अली खान के द्वारा पूरा करवाया गया। इस पूरे परिसर ने भारत की आजादी की पहली लड़ाई में लखनऊ के प्रसिद्ध घेराबंदी में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रेजीडेंसी का एक प्रमुख हिस्सा अंग्रेजी बलों और भारतीय विद्रोहियों के बीच की लड़ाई में नष्ट हो गया था। युद्ध के बाद इसे जस का तस छोड़ दिया गया। रेजीडेंसी की टूटी-फूटी दीवारों में आज भी तोप के गोलों के निशान बने हुए हैं।

 

दंगा: आखिर कौन है लापरवाह अफसर…

दो समुदायों में हुये दंगे के मामले में कर दी गई लीपापोती

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। बाजारखाला क्षेत्र में विगत तीन दिन पूर्व हुए दो समुदायों के बीच दंगा भले ही शांत हो गया हो या फिर पुलिस के आगे दंगाई बेबस हो गये हों यह साफ तौर पर तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इस दंगे में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। जबकि शासन का आदेश है कि यदि कहीं भी दंगा होगा तो जनपद के जिलाधिकारी और एसएसपी जिम्मेदार होंगे। लेकिन इसके बाद भी दंगे में लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।
बाजारखाला क्षेत्र में 29 मई की देर रात अफवाहों को लेकर दो समुदायों में दंगा हो गया। घंटो पथराव और फायरिंग भी हुई। दंगे में कई दर्जन लोग जहां चेाटिल हो गये वहीं दुकानदारों का भी काफी नुकसान हुआ। हालात को काबू करने के लिए पीएसी के साथ ही कई थानों की फोर्स लगाई गई। दो दिन तक बाजारखाला क्षेत्र पुलिस छावनी में तब्दील रहा। पुलिस की सख्ती के आगे दंगाई शांत हुए। दंगा शांत होने पर मुस्लिम धर्मगुरु के साथ ही डीजीपी एके जैन ने भी दो दिन बाद मौके का निरीक्षण किया। दंगा होने पर बाजारखाला पुलिस ने स्वयं वादी बनकर दोनों समुदायों के लगभग सैकड़ों लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। लेकिन तीन दिन बाद भी न ही दंगाई पकड़े गये और न ही लापरवाह अधिकारियों के ऊपर कोई कार्रवाई की गई। दंगा होने के बाद सिर्फ जैसे-तैसे खानापूर्ति कर देंगे को शांत करा दिया गया। दंगा शांत है या अन्दर ही अन्दर धंधक रहा है इसे साफ तौर पर तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि शासन के आदेशों का पालन राजधानी में ही नहीं हो रहा है।

महिलाओं ने किया आंदोलन, वसीम की हो बर्खास्तगी

लखनऊ। शिया वक्फ प्रापर्टी को बचाने और चेयरमैन वसीम रिजवी को पद से बर्खास्त करने की मांग को लेकर शिया ख्वातीन का धरना निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। सोमवार की सुबह मौलाना कल्बे जव्वाद की पत्नी और उनकी फुफी धरने पर बैठी महिलाओं से मिलने पहुंची और उनका मनोबल बड़ाया। धरने पर बैठी महिआओंं ने एलान किया है कि कौम के जो मौलाना उनका समर्थन नहीं कर रहे हैं उनके लिए चूडिय़ा और दुपट्ïटे भेजे जाएंगे। धरने पर बैठी महिलाओं का आज पांचवां दिन है। रविवार को भी कई बार महिलाओं ने छोटा इमामबाड़ा गेट पर उग्र प्रदर्शन कर वसीम रिजवी और प्रदेश सरकार का पुतला फूंका। महिलाओं का साफ कहना है कि जबतक वसीम रिजवी को बर्खास्त नहीं किया जाएगा तबतक आंदोलन जारी रहेगा। महिलाओं ने बुक्कल नवाब को भी लपेट लिया है। उनका आरोप है कि वसीम रिजवी को दोबारा चेयरमैन बनवाने में बुक्कल नवाब का भी योगदान है इसलिए उनका भी विरोध किया
जाएगा। गौरतलब है कि मौलाना कल्बे जव्वाद का वक्फ की सम्पत्ति को बचाने के लिए काफी लम्बे समय से आन्दोलन चल रहा है।

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