राजनीति में हो पारदर्शिता

यह कहें कि राजनीति में शरीफों का ठिकाना नहीं है तो गलत नहीं होगा। राजनीतिक दलों को बाहुबलियों को टिकट देने में कोई परहेज नहीं है लेकिन अगर कोई शरीफ और पढ़ा-लिखा व्यक्ति पार्टी से टिकट की मांग करे तो उसे नहीं दिया जाता। यह कहें कि राजनीति की शुचिता पर सवाल उठ रहे हैं तो गलत नहीं होगा।

sanjay sharma editor5राजनीति के स्तर में आयी गिरावट की वजह से ही अधिकांश युवा राजनीति में नहीं जाना चाहते। राजनीति और नेता के नाम पर युवा बिदकने लगते हैं। इसमें युवाओं का दोष नहीं है। वर्तमान में राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि युवाओं का बिदकना लाजिमी है। एक दौर था कि लोग राजनीति में सेवाभाव की वजह से आते थे लेकिन आज हालात इसके विपरीत हैं। अब राजनीति में लोग सत्ता के प्रभाव की वजह से आ रहे हैंं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वर्तमान राजनीति सेवा भाव की नहीं बल्कि बाहुबल और धन बल की है। यह कहें कि राजनीति में शरीफों का ठिकाना नहीं है तो गलत नहीं होगा। राजनीतिक दलों को बाहुबलियों को टिकट देने में कोई परहेज नहीं है लेकिन अगर कोई शरीफ और पढ़ा-लिखा व्यक्ति पार्टी से टिकट की मांग करे तो उसे नहीं दिया जाता। यह कहें कि राजनीति की शुचिता पर सवाल उठ रहे हैं तो गलत नहीं होगा।
कल उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत सदस्यों के परिणाम घोषित हुए तो अनेक जिलों में चुनाव में हेराफेरी के आरोप लगाए गए। भाजपा और बसपा के दो वरिष्ठ नेता तो परिणाम के विरोध में धरने पर बैठ गए। उन लोगों का आरोप है कि चुनाव में धांधली की गई है। ऐसा नजारा हर चुनाव में देखने को मिलता है। ग्राम पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा के चुनावों तक में धांधली का आरोप लगता रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि राजनीति में पारदर्शिता नहीं है। सभी राजनीतिक पार्टियों का चुनावों में विजय प्राप्त करना ही उद्देश्य होता है। चुनाव में जीत के लिए प्रत्याशी किसी भी हद तक गुजर जाते हैं। साम-दाम, दंड-भेद सभी अस्त्रों का इस्तेमाल हो रहा है। चुनावी रैलियों में कार्यकर्ताओं से लेकर वरिष्ठï नेता तक मर्यादा पार कर जाते हैं। उदाहरण के लिए अक्टूबर 2015 में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में जिस तरह भाषा की मर्यादा तार-तार हुई वह किसी से छिपी नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक ने चुनावी रैली में गलत भाषा का प्रयोग किया था। इतना ही नहीं चुनावी रैलियों में नरेन्द्र मोदी के लिए गलत भाषा का प्रयोग हुआ। यह बहुत ही दुखद है कि हमारे नेता देश के प्रधानमंत्री के लिए गलत भाषा का प्रयोग करने से नहीं हिचकते। निश्चित रूप से यह सही नहीं है। कुछ दिनों पहले जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान गए थे तो उस वक्त भारत में विपक्षी दल प्रधानमंत्री का पुतला फूंक रहे थे। उस वक्त पूरे विश्व की मीडिया के कैमरे इस घटना पर लगे थे। इस तरह के कृत्य से दूसरे देश के लोग क्या सोचेंगे इससे नेताओं को कोई सरोकार नहीं है।

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