राजनीति ने संसद को बनाया बंधक

नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक के बाद सोनिया गांधी विदेश गईं और वह वहां से लौट भी आईं। उनके विदेश प्रवास के दौरान राहुल गांधी के साथ कांग्रेस के अन्य नेताओं की बैठकें हुईं। कहा जाता है कि कांग्रेस के लगभग सभी जूनियर नेताओं ने और कुछ सीनियर नेताओं ने भी अपनी राय यही दी कि सरकार को वस्तु सेवा कर संविधान संशोधन विधेयक पारित करने नहीं देना चाहिए। इस तरह से भारतीय जनता पार्टी को सबक सिखाया जाना चाहिए। कांग्रेस के अंदर इस तरह के विचार तो थे ही, उसके साथ ही दिल्ली हाईकोर्ट का एक आदेश आ गया, जिसमें सोनिया और राहुल सहित कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं को नेशनल हेराल्ड मुकदमे में सेसन कोर्ट के सामने पेश होने का कहा गया।

 कल्याणी शंकर
जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ एक अच्छे माहौल पर अपने निवास पर बैठक की, तो यह लग रहा था कि संसद का शीतकालीन सत्र अब अच्छी तरह चलेगा और आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के विधेयक पारित हो जाएंगे। प्रधानमंत्री ने संसद में अपने भाषण में टकराव की जगह मेल का भाव अपनाया था और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भूरि भूरि प्रशंसा की थी। उस मुलाकात में सोनिया गांधी के साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी थे। बैठक के बाद कांग्रेस भी नरम रुख दिखा रही थी और वह वस्तु सेवा कर विधेयक को पारित कराने का संकेत दे रही थी।
लेकिन उस बैठक के एक सप्ताह बाद कांग्रेस एक बार फिर अपना आक्रामक रुख दिखा रही है। हालांकि सरकार कांग्रेस की मांग पर नरम रवैया अपना रही है, लेकिन कांग्रेस मानने का नाम ही नहीं ले रही है और वह संसद के सत्र का तबाह करने पर लगी हुई है। आखिर एक सप्ताह में हो क्या गया?
सबसे पहली बात तो यह हुई कि नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक के बाद सोनिया गांधी विदेश गईं और वह वहां से लौट भी आईं। उनके विदेश प्रवास के दौरान राहुल गांधी के साथ कांग्रेस के अन्य नेताओं की बैठकें हुईं। कहा जाता है कि कांग्रेस के लगभग सभी जूनियर नेताओं ने और कुछ सीनियर नेताओं ने भी अपनी राय यही दी कि सरकार को वस्तु सेवा कर संविधान संशोधन विधेयक पारित करने नहीं देना चाहिए। इस तरह से भारतीय जनता पार्टी को सबक सिखाई जानी चाहिए।
कांग्रेस के अंदर इस तरह के विचार तो थे ही, उसके साथ ही सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट का एक आदेश आ गया, जिसमें सोनिया और राहुल सहित कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं को नेशनल हेराल्ड मुकदमे में सेसन कोर्ट के सामने पेश होने का कहा गया। सोनिया और राहुल ने हाई कोर्ट से मांग की कि उन्हें कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने से निजात दी जाय। कोर्ट ने उनकी उस मांग को भी खारिज कर दिया। इसके बाद तो संसद सत्र को तबाह करने का उनका इरादा और पक्का हो गया।
हरियाणा में हुए जमीन घोटाले की जांच कर रहे एक आयोग ने सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा को समन देने का फैसला किया है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह बघेला के खिलाफ भी जांच तेज हो गई है और पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के बेटे कार्ती के खिलाफ भी जांच का काम तेज हो गया है। इन घटनाओं ने कांग्रेस के इरादों को और भी कड़ा बना दिया है।
यही कारण है कि कांग्रेस पॉलिटिकल वेंडेटा की बात कर रही है। कांग्रेस नेता जो कह रहे हैं उसका मतलब तो यही है कि उन्हें लगता है कि जीएसटी मसले पर उसे दबाने के लिए जांच और न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जा रहा है तो क्या इसका मतलब यह लगाया जाए कि अब सरकार ने यह उम्मीद छोड़ दी है कि कांग्रेस जीएसटी के मसले पर उसका साथ देगी।
भारतीय जनता पार्टी भी दो समानान्तर रेखाओं पर चल रही है। सबसे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अपना रुख नरम किया। हालांकि भाजपा के सांसदों को कहा गया था कि कांग्रेसी सदस्यों द्वारा भडक़ाए जाने के बावजूद वे शांति बनाए रखें, लेकिन इसके बावजूद जब तब झड़प होती रही। जब पूर्व मंत्री कुमारी शैलजा ने कहा कि द्वारिका के एक मंदिर में उनसे जाति पूछी गई थी, तो सत्तापक्ष ने भी उस पर हंगामा मचाया।
वीके सिंह के मामले पर भी कांग्रेस के नेतृत्व ने बहुत हंगामा मचाया। उनकी बर्खास्तगी की बार- बार मांग की गई। उसका एक कारण तो कांग्रेस का यह डर था कि भारतीय जनता पार्टी अंबेडकर का गुणगान कर उनके दलित आधार को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है।
यदि यह सब जारी रहा तो शीत सत्र में काम होना भी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को अपना अपना रुख नरम करके रखना चाहिए।

Pin It