राजनीतिक उथल-पुथल

“बहुजन समाज पार्टी में स्वामी प्रसाद मौर्या के पार्टी छोडऩे के बाद पार्टी मे काफी कुछ बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। मायावती ने गयाचरण दिनकर को नेता विपक्ष बना दिया। पार्टी का वोट बैंक बचाने के लिए मौर्या, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज के लोगों को आश्वासन भी दिया है।”

sanjay sharma editor5इतना ही नहीं मायावती ने ब्रजेश मिश्रा और रोमी साहनी को दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया है।
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर चल रहा है। प्रदेश में भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस चारों राजनीतिक पार्टियां खुद को मजबूत बनाने में जुटी हुई हैं। इन सबके बावजूद कोई न कोई नेता ऐसी हरकत कर बैठता है, जिसकी वजह से पार्टी का वोट बैंक खिसकने लगता है। तब पार्टी हाईकमान वोट बैंक बचाने के चक्कर में ऐसे फैसले लेती है, जो उसकी छवि को काफी हद तक प्रभावित करते हैं लेकिन पार्टी नेताओं को लगता है कि उनका वोट बैंक सलामत है। जबकि चुनाव होने में अभी काफी वक्त है, इसलिए चुनाव से कई महीने पहले बिना सोचे-समझे निर्णय लेने की आदत नुकसान पहुंचा सकती है।
बहुजन समाज पार्टी में स्वामी प्रसाद मौर्या के पार्टी छोडऩे के बाद पार्टी मे काफी कुछ बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। मायावती ने गयाचरण दिनकर को नेता विपक्ष बना दिया। पार्टी का वोट बैंक बचाने के लिए मौर्या, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज के लोगों को आश्वासन भी दिया है। इतना ही नहीं मायावती ने ब्रजेश मिश्रा और रोमी साहनी को दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया है। इसी तरह समाजवादी पार्टी में कौमी एकता दल का विलय कराने की कोशिश में जुटे बलराम यादव को अखिलेश यादव ने बर्खास्त कर दिया। उन्होंने किसी भी हाल में मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल नहीं करने का फरमान जारी कर दिया। सीएम हर हाल में पार्टी की छवि बेहतर बनाने में जुटे हैं। लेकिन पार्टी का परम्परागत वोट बैंक और पार्टी को टूट से बचाना भी उनकी जिम्मेदारी है। शायद इसी वजह से सपा में बलराम यादव को दोबारा शामिल करने का निर्णय लिया गया।
इसी प्रकार बीजेपी की तरफ से राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार खड़ा होने के बावजूद पार्टी के कुछ नेताओं ने प्रीति महापात्रा का समर्थन किया। उसने पार्टी हाईकमान के इशारे पर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा चुनाव लड़ा था लेकिन चुनाव में बुरी तरह हार गईं। इस चुनाव में भाजपा की तरफ से अपने प्रत्याशियों को जिताने की हर संभव कोशिश की गई लेकिन तब भी दयाशंकर सिंह जीत नहीं पाये। चुनाव में भाजपा नेताओं के बीच खेमेबंदी का माहौल नजर आने लगा। इस मामले में कांग्रेस भी पीछे नहीं है। यहां पार्टी की तरफ से यूपी का चुनाव प्रभारी बनाये जाने को लेकर भी काफी उथल-पुथल मची रही। आखिरकार गुलाब नबी आजाद को यूपी का प्रभारी बना दिया गया। अब प्रदेश अध्यक्ष को लेकर तमाम तरह की आशंकाओं का बाजार गर्म है। मतलब साफ है कि आने वाले विधानसभा चुनाव की वजह से सारी राजनीतिक पार्टियां फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। ऐसे समय में जो भी पार्टी गलत निर्णय लेगी, उसको आने वाले चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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