राजधानी में दुर्घटना को दावत देती सडक़ें

रात में तो सडक़ों पर चलना और भी जोखिम वाला काम हो जाता है। राजधानी में जो पॉश कॉलानियां हैं वहां की सडक़ों की भी हालत ठीक नहीं है तो प्राइवेट सोसाइटी द्वारा बसाए गये मोहल्लों की बात करना बेमानी है।

sanjay sharma editor5राजधानी लखनऊ की सडक़ों की हालत ठीक नहीं है। कुछ ही क्षेत्रों में अच्छी सडक़ें हैं, बाकी जगह की हालत दयनीय है। बारिश के मौसम में तो हालत और भी खराब हो जाती है। सडक़ों पर जगह-जगह बने गड्ढï़ों में पानी भर जाता है, जो दुर्घटना को दावत देते हैं और विभाग मूक दर्शक बना रहता है। ऐसा नहीं है कि यहां सडक़ों का निर्माण नहीं होता। निर्माण तो होता है पर गुणवत्ता की कमी की वजह से सडक़ चार महीने में ही टूट जाती है।
एक बारिश में ही सडक़ों की असलियत सामने आ जाती है या ये कहें कि विभाग की असलियत सामने आ जाती है। आधे घंटे की बारिश में सडक़ों पर घुटने भर पानी जमा हो जाता है और आते-जाते लोग घायल हो जाते हैं। बारिश के दिनों में अधिकांश सडक़ दुर्घटनाएं खराब सडक़ों की वजह से ही होती हैं। रात में तो सडक़ों पर चलना और भी जोखिम वाला काम हो जाता है। राजधानी में जो पॉश कॉलोनियां हैं वहां की सडक़ों की भी हालत ठीक नहीं है तो प्राइवेट सोसाइटी द्वारा बसाए गये मोहल्लों की बात करना बेमानी है। जब विभाग मुख्य सडक़ों को ठीक कराने की जरूरत नहीं समझता तो मोहल्लों की बात करना बेमानी है।
प्राइवेट सोसाइटी द्वारा बसाये गए मोहल्लों में सडक़ों की स्थिति तो बहुत ही दयनीय है। सैकड़ों की संख्या में ऐसे मोहल्ले हैं जहां अभी तक सडक़ बनी ही नहीं है। मिट्टïी की सडक़ है और बारिश के दिनों में क्या हालत होती होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। लखनऊ के कई मुख्य मार्ग हैं जिनकी हालत ठीक नहीं है। कई जगह तो सडक़ें इतनी बुरी तरह धंस गई हैं कि कोई भी बड़ा हादसा हो सकता। लोगों द्वारा शिकायत करने के बाद भी विभाग जल्द ठीक कराने की जरूरत नहीं समझता। शायद विभाग बड़े हादसे का इंतजार करता है, जबकि इन सडक़ों पर लाखों लोग रोज गुजरते हैं।
वर्तमान में भ्रष्टïाचार की जड़े इतनी मजबूत हो गई हैं कि कोई भी काम ढंग से नहीं हो रहा है। कमीशनखोरी के खेल में सडक़ों की गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। यदि सरकार इस दिशा में सख्त हो जाए तो इस खेल पर कुछ हद तक लगाम लगायी जा सकती है। सडक़ बनाने का जिम्मा जिन कंपनियों को दिया जाता है उनके पिछले काम को देख परख लें। इसके अलावा जिन कंपनियों की काम की गुणवत्ता सही नहीं मिली हो उन पर जुर्माना लगाने का प्रावधान भी किया जाए और भविष्य में उन्हें काली सूची में डाल दिया जाए। जब तक इन कंपिनयों को सजा नहीं मिलेगी ये ठीक से काम नहीं करेंगे। जब तक शासन-प्रशासन सख्त नहीं होगा कमीशनबाजी का खेल खत्म नहीं होगा ।

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