यूपी सरकार की लचर कार्यशैली…

लोकायुक्त एक स्वतंत्र संस्था है जो लोक सेवकों द्वारा की गई किसी भी प्रकार की अनियमितता की निष्पक्ष जांच के लिये बनाई गई। अगर इतनी महत्वपूर्ण संस्था का पद महीनों तक रिक्त रहे तो कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि सरकार ऐसी लोकहित की संस्था को लेकर गंभीर नहीं है।

sanjay sharma editor5जिस तरह से कल लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की फजीहत की उससे प्रदेश सरकार की लचर कार्यशैली पर उंगली उठना लाजिमी है। कोर्ट के आदेश देेने के बाद भी प्रदेश सरकार एक लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं कर पायी और अंतत: सुप्रीम कोर्ट को ही लोकायुक्त की नियुक्ति करनी पड़ी। प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्ति का मामला लंबे समय से अटका था। 24 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने 6 माह का वक्त भी दिया था कि लोकायुक्त की नियुक्ति कर लें, लेकिन अपने खास को महत्वपूर्ण पद पर बिठाने की चाह ने सरकार की किरकिरी करा दी। ऐसा नहीं है कि सरकार ने कोशिश नहीं की। सरकार ने कई बार कोशिश की लेकिन कभी राजभवन से तो कभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की इस पर सहमत नहीं हुई। कुल मिलाकर पर्याप्त समय के बाद भी प्रदेश सरकार लोकायुक्त के नाम का निर्णय नहीं ले पाई। कई बैठकों और सिफारिशों के बावजूद लोकायुक्त नियुक्ति समिति किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। प्रदेश सरकार की किरकिरी सबसे ज्यादा उस समय हुई जब सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया कि लोकायुक्त को नियुक्त करो। खैर इतिहास के पन्नों में यह भी दर्ज हो गया कि देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने किसी प्रदेश का लोकायुक्त नियुक्त किया।
लोकायुक्त एक स्वतंत्र संस्था है जो लोक सेवकों द्वारा की गई किसी भी प्रकार की अनियमितता की निष्पक्ष जांच के लिये बनाई गई। अगर इतनी महत्वपूर्ण संस्था का पद महीनों तक रिक्त रहे तो कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि सरकार ऐसी लोकहित की संस्था को लेकर गंभीर नहीं है। लंबे समय से प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्ति की मांग की जा रही थी लेकिन प्रदेश सरकार के ढुलमुल रवैये की वजह से यह नहीं हो पा रहा था। इसकी विपक्षी दल भी आलोचना कर रहे थे। लोकायुक्त राज्य के इतने महत्वपूर्ण लोगों द्वारा सृजित इस समिति के द्वारा लोकपाल की नियुक्ति न हो पाने से लोगों के बीच इसका गलत संदेश जा रहा था। यह अजीब विडंबना है कि महत्वपूर्ण पदों पर अपने खास लोगों को बैठाने की चाह ने माहौल खराब कर दिया है। ऐसा अधिकांश मामलों में देखने को मिला है। इस तरह की घटनाओं से सरकार की छवि तो धूमिल होती ही है जनता का सरकार के प्रति विश्वास भी खत्म होने लगता है। यदि सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया तो इसका नतीजा कितना घातक होगा बताने की जरूरत नहीं है। सरकार को यह बखूबी समझना चाहिए कि सत्ता में बने रहने के लिए जनता-जनार्दन का साथ और विश्वास बहुत जरूरी है।

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