यूपी में ब्राह्मणों पर मुश्किल दांव

आकार पटेल 

कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में क्या रणनीति होगी? जनसंख्या के हिसाब से यह भारत का सबसे बड़ा राज्य है। यदि यह राज्य एक अलग देश होता तो, 21 करोड़ की आबादी के साथ दुनिया का पांचवां बड़ा देश माना जाता। यहां अगले वर्ष चुनाव विधानसभा चुनाव होंगे। उत्तर प्रदेश की रणनीति पर काम करने के लिए राहुल गांधी ने भारत के सबसे कुशाग्र राजनीतिक दिमागवाले व्यक्ति हो अनुबंधित किया है। नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर की सेवाएं ली थीं। माना जाता कि चाय पे चर्चा उनका ही विचार था। वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर पर भरोसा जताया था। अब कांग्रेस ने उन्हें जिम्मेवारी सौंपी है।
रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने दो रणनीति सुझायी है। पहली यह कि पार्टी को ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाना होगा और दूसरी रणनीति यह कि इस प्रदेश में किसी गांधी यानी राहुल या प्रियंका में से किसी एक को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करना होगा। दूसरी सलाह के मंजूर होने की संभावना तो कम ही है। गांधी परिवार का कोई भी व्यक्ति प्रांत स्तर पर किसी भूमिका को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस तो राहुल की मोदी से तुलना करने को भी तैयार नहीं थी। कांग्रेसी चाटुकार मोदी को ‘क्षेत्रीय नेता’ बता रहे थे और राहुल गांधी को ‘राष्टï्रीय’ नेता का दर्जा दे रहे थे। इसका मोदी ने राहुल के इटली से रिश्ते का जिक्र करते हुए कहा था कि राहुल केवल राष्टï्रीय नेता ही नहीं हैं, बल्कि वे तो एक अंतरराष्टï्रीय नेता हैं। प्रशांत किशोर का ब्राह्मणों को लेकर पहला सुझाव भी बेहद दिलचस्प है। उत्तर प्रदेश में फिलहाल, कांग्रेस से किसी खास जाति का जुड़ाव नहीं है, जैसे यादव समुदाय मुलायम सिंह से जुड़ा है, जबकि दलित मायावती से जुड़े हैं और सवर्ण भाजपा से जुड़े हैं। इस दशा में किसी जाति विशेष से पार्टी का जुड़ाव होना बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां से शुरुआत होगी। दूसरे समुदाय, यानी मुसलमान, तभी आपके राजनीतिक गंठबंधन की तरफ रुख कर सकते हैं, जब उन्हें लगेगा कि आपकी पार्टी की जीतने की कोई उम्मीद है। किशोर का तर्क है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों ( प्रदेश की आबादी का 10 प्रतिशत हिस्सा) को कांग्रेस से जोडऩा आसान है, क्योंकि ब्राह्मण समुदाय पार्टी को पहले भी समर्थन देता रहा है। यह सच है कि उत्तर प्रदेश के कई कांग्रेसी मुख्यमंत्री ब्राह्मण ही रहे हैं, जिनमें नारायण दत्त तिवारी, कमलापति त्रिपाठी, गोविंद वल्लभ पंत और श्रीपति मिश्रा शामिल हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को आखिरी बार चुनाव में तीन दशक पहले जीत मिली थी। मुझे वह दिन याद है, लेकिन ज्यादा लोगों को यह याद नहीं होगा। भारत की आबादी का 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम आयु वर्ग का है। मेरा अनुमान है कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा मतदाताओं में पांच प्रतिशत से कम ने ही 1985 में वोट दिया होगा। इससे जाहिर है कि प्रदेश में बहुत कम लोग होंगे, जिन्हें याद होगा कि उन्होंने कांग्रेस को कभी वोट दिया था। यह पहली मुश्किल है। दूसरी मुश्किल कुछ ज्यादा ही है। किसी पार्टी के लिए केवल चुनावी वजहों से किसी जाति को आकर्षित करना आसान भी नहीं है। उन्हें कुछ न कुछ ऑफर करना होगा। कांग्रेस क्या ऑफर कर सकती है? वह ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दे सकती है, इसके अलावा क्या?
क्या पार्टी की राजनीति ब्राह्मणों को आकर्षित करनेवाली है? मुझे तो नहीं लगता। नीतिगत आधारों पर गौर करें, तो पिछली कांग्रेस सरकार ने गरीबों यानी विशेषकर निचली जातियों का ध्यान रखा था। मसलन- नरेगा, शिक्षा का अधिकार, राइट-टू-फूड और दूसरे तमाम कानूनों से यह पता चलता है। जनकल्याणकारी योजनाएं मध्यम वर्गीय मतदाता को पसंद नहीं आयी थीं। मुझे नहीं लगता कि इससे ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस की तरफ आकर्षित होंगे।
प्रशांत किशोर के तर्क का समर्थन एक आंकड़ा जरूर कर रहा है। दरअसल, विधानसभा चुनावों में भाजपा का ब्राह्मण वोट सिकुड़ता गया है। वर्ष 2002 में यह करीब 50 प्रतिशत था। 2007 में यह 44 प्रतिशत पर आ गया और 2012 में यह मात्र 38 प्रतिशत पर रह गया था। ब्राह्मण भाजपा को समर्थन क्यों देते हैं?
क्योंकि हिंदुत्व सामाजिक तौर पर बेहद संकीर्ण है और ज्यादातर ब्राह्मणों का मानना है कि पार्टी का ध्यान गो-हत्या पर पाबंदी और मंदिर बनाने जैसे मुद्दों पर है। भाजपा और राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ अपना आरक्षण विरोधी रवैया कई बार जाहिर कर चुके है। हाल ही में पार्टी ने दलित छात्रों के प्रति जो रुख अपनाया, संभव है कि कई ब्राह्मणों को ये पसंद आया होगा। लेकिन, ऐसा कांग्रेस कभी नहीं कर सकती। उत्तर प्रदेश में बाकी के ब्राह्मण मतदाता दो बड़ी पार्टियों में बंट जाते हैं। मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी को 20-20 प्रतिशत वोट मिलता है। यह बंटवारा जारी रहेगा, क्योंकि सभी जातियों की तरह ब्राह्मण भी एकजुट होकर मतदान नहीं करता। कई जीतनेवाली पार्टी के पक्ष में होते हैं क्योंकि वे जीतनेवाले के साथ रहना चाहते हैं। कांग्रेस को पहले अपने नीतिगत मुद्दों पर ध्यान देना होगा कि वह किन मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है। प्रशांत किशोर सुझाव दे रहे हैं कि पहले संभावित मतदाताओं की पहचान करें और फिर उसके मुताबिक नीति बनाएं, यह संभव नहीं दिखता। एक ब्रांड के तौर पर कांग्रेस की छवि बहुत ही खराब हो चुकी है। पार्टी भ्रष्टाचार, अक्षमता और वंशवाद में उलझी नजर आ रही है। आज गांधी परिवार के नेतृत्व में कांग्रेस की स्थिति आपातकाल के दौर से बिल्कुल अलग है। उस समय तो पार्टी विपक्ष में कहीं दिखती थी, आज तो पार्टी खत्म होने के कगार पर है। ना तो कोई जाति, ना तबका और ना ही कोई समूह कांग्रेस की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में ब्राह्मणों के आधार पर बनायी जानेवाली रणनीति के कामयाब होने की भी कोई संभावना नहीं है।

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