यूपी में फिर असर दिखाएंगे धार्मिक समीकरण?

राजभवन और राज्य सरकार की लड़ाई में कभी राज्यपाल पर उंगली उठती है तो कभी सरकार की नीयत पर सवाल उठाया जाता है। दोनों में से किसी को भी पाक-साफ नहीं कहा जा सकता है। मर्यादाएं दोनों ही तरफ से तोड़ी जा रही हैं। राज्य सरकार का शायद ही कोई ऐसा फैसला होता होगा जिस पर राजभवन आंखें न तरेरता हो। बात यहीं तक सीमित नहीं है। राज्यपाल राम नाईक की अति सक्रियता अखिलेश सरकार के तो समझ में नहीं आ रही है इसके साथ-साथ संविधान विशेषज्ञ भी राज्यपाल की तेजी से चिंतित हैं।

Captureउत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार कई मोर्चों पर एक साथ घिरती जा रही है। एक तरफ न्यायपालिका अलिखेश सरकार के कई फैसलों पर उंगली उठा रही है तो दूसरी तरफ राज्यपाल राम नाईक की बेबाकी अखिलेश सरकार पर भारी पड़ रही है। इसके अलावा प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था और बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा ने भी अखिलेश सरकार की नींद हराम कर रखी है। बात न्यायपालिका की कि जाये तो आये दिन हाईकोर्ट किसी न किसी बात पर प्रदेश सरकार और नौकरशाही को फटकार लगाता रहता है। लोकायुक्त की नियुक्ति के मसले पर तो अखिलेश सरकार और हाईकोर्ट के बीच साफ-साफ टकराव देखा गया। बीती जुलाई में हाईकोर्ट ने प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था पर यहां तक कह दिया कि गहरी नींद से जागे यूपी सरकार।
सोशल मीडिया के पत्रकार जगेन्द्र सिंह हत्याकांड के समय भी अदालत ने अखिलेश सरकार के ऊपर डंडा चलाया था। इसी तरह वीआईपी के बच्चे भी सरकारी स्कूल में पढ़ें, इस बात पर भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया था। नोयडा अथॉरिटी के भ्रष्टाचार और वहां के मुख्य अभियंता यादव सिंह को लेकर भी न्यायपालिका अखिलेश सरकार के पेंच कस चुकी है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल कुमार यादव पर गंभीर भ्रष्टाचार और अनियमितता का आरोप लगाते हुए कोर्ट ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था जबकि अखिलेश सरकार अनिल यादव का पूरा समर्थन कर रही थी। आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के शिकायत पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के खिलाफ मुकदमा लिखा जाना भी न्यायपालिका की वजह से मुमकिन हो पाया था। ऐसे ही तमाम मामलों की लम्बी-चौड़ी लिस्ट मौजूद है जिसमें कोर्ट ने राज्य सरकार को आईना दिखाने का काम किया।
बात राज्यपाल की कि जाये तो वह लगातार अखिलेश सरकार के खिलाफ विरोधियों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। राजभवन और राज्य सरकार की लड़ाई में कभी राज्यपाल पर उंगली उठती है तो कभी सरकार की नीयत पर सवाल उठाया जाता है। दोनों में से किसी को भी पाक-साफ नहीं कहा जा सकता है। मर्यादाएं दोनों ही तरफ से तोड़ी जा रही हैं। राज्य सरकार का शायद ही कोई ऐसा फैसला होता होगा जिस पर राजभवन आंखें न तरेरता हो। बात यहीं तक सीमित नहीं है। राज्यपाल राम नाईक की अति सक्रियता अखिलेश सरकार के तो समझ में नहीं आ रही है इसके साथ-साथ संविधान विशेषज्ञ भी राज्यपाल की तेजी से चिंतित हैं। एक चुनी हुई सरकार के साथ जिस तरह का व्यवहार राजभवन से होना चाहिए, वह दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ता है।
राज्यपाल, अखिलेश सरकार के कामकाज पर बार-बार उंगली उठा रहे हैं तो सपा नेता भी राज्यपाल पर हमला करने का कोई मौका छोड़ते नहीं हैं। समाजवादी पार्टी के महासचिव और राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव तो इसमें अव्वल हैं ही अन्य कई सपा नेता भी पीछे नहीं हैं। रामगोपाल यादव कभी राज्यपाल को आरएसएस का एजेंट बताते हैं तो कभी मांग करते हैं कि राम नाईक को बीजेपी उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दे। यूपी में पिछले कई महीनों से सपा सरकार और राज्यपाल राम नाईक के बीच खींचातानी चल रही है। गत दिनों एक बार फिर सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने प्रेस कांफ्रेंस करके राज्यपाल राम नाईक की जमकर निंदा की। रामगोपाल यादव कहते हैं कि यूपी के राज्यपाल लगातार सरकार के खिलाफ बयानबाजी करके अपने पद की गरिमा को खो रहे हैं। वह गृहमंत्री की तरह प्रदेश की कानून व्यवस्था पर बयान देते हैं। दादरी की घटना पर राज्यपाल कुछ भी नहीं बोलते हैं, जबकि सब जानते हैं ये किसका षडयंत्र है। हर चीज की सीमा होती है। राज्यपाल राम नाईक ऐसे कार्यक्रम में जाकर बयान देते हैं जैसे वो आरएसएस के कार्यकर्ता हों। देश में दूसरे किसी भी राज्य के राज्यपाल इस तरह से सरकार के खिलाफ बयान नहीं देते। रामगोपाल कहते हैं कि राज्यपाल जहर घोलने वाले संगठनों के साथ रहते हैं।
गौरतलब हो कि राज्यपाल राम नाईक ने एक दिन पहले ही उरई में हो रहे राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव में सपा सरकार के खिलाफ बड़ा बयान दिया था। राज्यपाल ने कहा था कि यूपी में हो रहे सांप्रदायिक संघर्ष इस बात का सबूत हैं कि प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह से धवस्त हो चुकी है। उन्होंने ये भी कहा था कि जल्द ही वे केंद्र को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे। पूर्व में भी रामगोपाल कह चुके हैं कि राज्यपाल राम नाईक को महामहिम कहना लज्जाजनक लगने लगा है। यह बात रामगोपाल ने राज्यपाल के उस बयान के बाद कही थी जिमसें राम नाईक ने कहा था कि यूपी में एक जाति विशेष (यादव) के वर्चस्व से वह चिंतित हैं। राम गोपाल से पहले प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने भी राज्यपाल राम नाईक पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि राज्यपाल राम नाईक खाते प्रदेश सरकार की हैं और गाते केंद्र की हैं। 23 अक्टूबर को कानपुर सर्किट हाउस में पत्रकारों ने उनसे सवाल किया कि राज्यपाल और प्रदेश सरकार के बीच अक्सर कई मुद्दों को लेकर मतभेद रहता है आखिर ऐसा क्यों है। इस पर मंत्री ने कहा कि राज्यपाल का पद काफी प्रतिष्ठित है, उन्हें पद की मर्यादा में रहकर बातें कहनी चाहिए। इसी तरह से सपा नेता और मंत्री आजम खान भी कई बार राज्यपाल के खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर चुके हैं।
बात साम्प्रदायिक सौहार्द की कि जाये तो हाल के दिनों में जिस तरह से कई शहरों में जातीय तनाव और साम्प्रदायिक लड़ाई-झगड़ों की खबरें आ रही हैं, वह दिल को ठेस पहुंचाने वाली हैं। बार-बार प्रदेश में तनाव और झगड़े का माहौल क्यों बन रहा है? यह सुनियोजित तो नहीं है? इससे किसको फायदा हो सकता है? कहीं 2017 के विधानसभा चुनाव से तो इनका कोई संबंध नहीं हैं? इसी तरह के तमाम अनसुलझे सवालों का जवाब जनता जानना चाहती है लेकिन समस्या यह है कि इसका जवाब न तो प्रदेश सरकार दे पा रही है न ही केन्द्र की तरफ से कोई ऐसा संकेत मिल रहा है जिससे यह पता चल सके कि दंगों की साजिश के पीछे कौन सी शक्तियां काम कर रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की बजाय आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में लगे हुए हैं। दादरी कांड, कानपुर, उरई, बांदा सहित कई जिलों में बार-बार तनाव की स्थिति का बनना तो यही दर्शाता है कि यह सब 2017 के विधानसभा चुनाव तक चलता ही रहेगा क्योंकि प्रदेश में वर्षों से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे नेता वोट बटोरते रहे हैं।
बहरहाल, तमाम किन्तु-परंतुओं के बीच सच्चाई यह भी है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लगातार कोशिश कर रहे थे कि सरकार का किसी भी संवैधानिक संस्था से टकराव न हो। न्यायपालिका के आदेशों का सम्मान हो और राजभवन के साथ सरकार के संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहें, इस प्रयास से अखिलेश कभी पीछे नहीं हटे हैं। इसी वजह से कई बार राज्यपाल की सख्त टिप्पणी और सरकार के फैसलों पर उंगली उठाने के बाद भी सीएम ने राज्यपाल राम नाईक के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई गलत बयानबाजी नहीं की। अखिलेश ही नहीं सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने भी कभी ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे यह संदेश जाये कि सरकार और राजभवन के बीच सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो कई बार राजभवन जाकर भी राज्यपाल की नाराजगी दूर करने की कोशिश करते दिखे। राज्य सरकार द्वारा विधान परिषद के सदस्यों के मनोनयन की सूची पर जब राम नाईक ने प्रश्न चिह्न लगाया तो मुलायम सिंह यादव तक ने राज्यपाल से मिलकर अपना पक्ष रखने में देरी नहीं की।

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