यूपी में तेजी से फैल रहा पित्त की थैली का कैंसर

  • प्रदेश में सबसे ज्यादा मरीज राजधानी में भी बीमारी ने पसारे पांव
  • अन्तिम चरण में चलता है पता, नहीं दिखाई देते लक्षण, जागरूकता की कमी से बढ़ा खतरा

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
captureलखनऊ। उत्तर भारत में पित्त की थैली के कैंसर रोगियों की तादात तेजी से बढ़ रही है। अधिकतर मरीजों में इस बीमारी का पता तब चलता है, जब वह पित्त की थैली के साथ अन्य अंगों को भी प्रभावित कर देते है। जिसके बाद मर्ज लाइलाज हो जाता है। विश्व के किसी भी देश की अपेक्षा उत्तर भारत में इस रोग से ग्रसित लोगों की संख्या सर्वाधिक है। यह कहना है डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.आकाश अग्रवाल का।
उन्होंने बताया कि बहुत सारे ऐसे कैंसर जो पित्त की थैली में होने वाली पथरी होने के दौरान पाये जाते हैं । यदि इसकी पहचान समय पर नहीं हो पाती है। उसके बाद मरीज की जान बचा पाना बहुत मुश्किल होता है।
बीमारी पर नहीं हो रहा शोध
डॉ. आकाश अग्रवाल के मुताबिक पित्त की थैली का कैंसर सबसे ज्यादा उत्तर भारत में पाया जाता है। इसके अलावा चिली नामक देश में इस बीमारी के कुछ मरीज पाये जाते हैं। किसी विकसित देश में इस बीमारी के मरीजों की संख्या न के बराबर होने से इस पर कोई देश शोध भी नहीं करता है। इसलिए यह रोग और पांव पसारता जा रहा है। हालात यह है कि प्रदेश की पूरी आबादी में से तीन प्रतिशत लोग इस बीमारी से ग्रसित है। उन्होंने बताया कि इन तीन फीसदी लोगों में से आधे प्रतिशत लोग ही चिकित्सकों के पास समय रहते इलाज के लिए पहुंच पाते है। उन्होंने बताया कि प्रदेश की कुल आबादी का तीन प्रतिशत भी इतना ज्यादा की भयावह स्थिति पैदा कर रहा है, क्योंकि एक बाद पित्त की थैली में कैंसर फैल जाये तो उसका इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है,जिससे मरीज की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है।

ऑपरेशन से पहले रखें विशेष ध्यान

डॉ. आकाश अ्रग्रवाल का कहना है कि पित्त की थैली में पथरी होने के बाद चिकित्सक आपरेशन की सलाह देते हैं। इस दौरान मरीज से लेकर चिकित्सक सभी को ध्यान में रखना चाहिए की आपरेशन से पहले कैंसर की जांच अवश्य करा लें। उन्होंने बताया कि यदि कैंसर हुआ तो आपरेशन के दौरान और फैल सकते हैं। इसके बाद मरीज की आयु सिर्फ छ: महीने रह जाती है। डॉ. अग्रवाल के अनुसार यदि सर्जन मरीज के लक्षणों पर ध्यान दे तो इस प्रकार के कैंसर का पता आपरेशन के पहले चल सकता है और मरीज की जान बचायी जा सकती है।
साइलेंटर किलर है पित्त के थैली का कैंसर
डॉ. अग्रवाल के मुताबिक पित्त की थैली का कैंसर साइलेंट किलर की तरह लोगों की जिंदगी में दाखिल हो रहा है। पीडि़त इस बीमारी से अन्त समय तक अन्जान रहता है। उसकों अन्तिम चरण मे इस बीमारी का पता चलता है। इसका सबसे बड़ा कारण इस बीमारी में किसी प्रकार के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। इसी के चलते सही समय पर जांच नहीं हो पाती है,और यह बीमारी विकराल रूप ले लेती है।

जांच की नहीं बनी कोई गाइड लाइन

डॉ. आकाश अग्रवाल ने बताया कि इस बीमारी को लेकर जागरूकता की कमी तथा उदासीनता ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है। 2010 में पहली बार प्रदेश में इस बीमारी पर शोध की शुरूवात हुई। लेकिन कब और कैसे इसकी जांच करानी चाहिए इसके लिए अभी तक कोई गाइड लाइन नहीं बनायी गयी।

कब करायें जांच

1. पेट के दाहिनी तरफ लगातार दर्द होना।
2. पेट में गैस बदहजमी के साथ भारी पन होना दवा लेने के बाद भी सही न होना।

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