यूपी भाजपा में शुरू हुई गुटबाजी, नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद माहौल गर्म

संघ के दबाव के चलते बने केशव मौर्य प्रदेश अध्यक्ष
जाति विभाजन को रोकना भाजपा की प्राथमिकता

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। प्रदेश भाजपा की कमान केशव मौर्य के हाथों में जाने के बात प्रदेश भाजपा में सियासत नये रूप में दिखने लगी है। नये अध्यक्ष की परिक्रमा शुरू होने के बाद पार्टी में खेमेबंदी अब साफ दिखाई देने लगी है। एक खास वर्ग का अब पार्टी से अब मोहभंग होता दिख रहा है। ऐसे में नए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की राह आसान नहीं होगी।
नए प्रदेश अध्यक्ष की तैनाती में आरएसएस और विहिप का गहरा दबाव था। सूत्रों की माने तो संघ की मंशा पूरी तौर पर आरएसएस के किसी कार्यकर्ता को पार्टी अध्यक्ष पद पर बैठानी की थी। केशव मौर्य के रूप में उसने नए पार्टी अध्यक्ष का चुनाव भी कर लिया। लेकिन पार्टी के अंदर ही अब खेमेबाजी शुरू हो गई है। सूत्र बताते हैं कि पार्टी के कई नेता इस तैनाती से खुश नहीं है। प्रदेश भाजपा के एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जानबूझ कर ऐसे व्यक्ति को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है जिसको संघ अपने काबू में आसानी से रख सके। ऐसे में केशव मौर्य संघ के खांके में एकदम फिट बैठते हैं। वे 12 वर्षों तक राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि खुद केशव मौर्य को अंतिम समय तक पता नहीं था कि उनका नाम अध्यक्ष के तौर पर आगे किया जा रहा है।
केशव मौर्य के प्रदेश अध्यक्ष पर नियुक्ति के बाद पार्टी को अगड़े खासतौर से ब्राह्मण कैडर में नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। इस बात पर कई नेता सहमत भी दिखे। सूत्र यह भी बताते है कि पार्टी इसकी काट किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं घोषित करके करेगी। इसके अलावा पार्टी फायरब्रांड नेताओं का चुनाव प्रचार में इस्तेमाल करने की रणनीति बना रही है। लेकिन यूपी के महासमर में भाजपा का नेतृत्व पीएम मोदी ही करेंगे।
सूत्र बताते हैं कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने उनका नाम खुद बढ़ाया था एवं उनके नाम के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी व्यक्तिगत सहमति थी। हांलाकि भाजपा में कई वरिष्ठ नेता नेताओं की लाबी इसके खिलाफ थी। ये नेता यूपी में पार्टी अध्यक्ष के तौर पर पुन: किसी अगड़े की नियुक्ति चाहते थे, और किसी पिछड़े को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहते थे । लेकिन संघ के हस्तक्षेप के बाद उनकी बात नहीं रखी जा सकी। विश्व हिन्दू परिषद के राममंदिर आन्दोलन से जुड़े केशव मौर्य भाजपा की अब तक हाशिये पर खड़े उस गुट के बेहद नजदीक है जिनका चेहरा एक वक्त यूपी में भाजपा को सत्ता दिलाने में कामयाब रहा है इसमें विनय कटियार और कल्याण सिंह के नाम भी शामिल हैं।
भाजपा का केशव मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के पीछे उनका पिछड़े वर्ग से आना भी है पार्टी को लगता है कि पिछड़े वर्ग के और वो भी पूर्वी यूपी के किसी नेता को अध्यक्ष बनाकर वह अपने वोट बैंक को और मजबूत करेगी। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि इससे वोट बैंक में कोई बहुत ज्यादा फायदा नहीं होने वाला असली फायदा विधानसभा चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के चयन पर निर्भर करेगा। साफ है प्रदेश में करीब 55 फीसदी आबादी पिछड़े वर्ग की है। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह खुद नहीं चाहते थे कि अगड़े वर्ग से अध्यक्ष पद पर किसी की तैनाती की जाए। पार्टी किसी भी कीमत पर यूपी चुनावों में अपनी रणनीति में ढील नहीं चाहती जातीय धु्रवीयकरण रोकना पार्टी की रणनीति
भाजपा चुनावों में जातीय धु्रवीयकरण रोकना चाहती है। इस वजह से वह कोई सीएम उम्मीदवर चुनावों में नहीं उतारने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी अगर किसी दलित को सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करती है तो अगड़े नाराज हो जायेंगे और अगर किसी अगड़े का सीएम के तौर पर नाम आगे बढ़ााया जाता है तो दलित के नाराज होने की संभावना है। ऐसे में पार्टी जातीय विभाजन से चुनाव पूर्व बचने की पूरी कोशिश में है। भाजपा के पास बिहार के कड़वे अनुभव हैं ,लेकिन यूपी में संभावित बहुकोणीय मुकाबले के मद्देनजर पार्टी का हर कदम पूरी तरह से चुनावी रणनीति को ध्यान में रखकर ही बनाया जा रहा है।

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