यूपीटीयू ने दोषियों को पकडऩे के लिए दर्ज कराई एफआईआर

-4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। लगातार गड़बडिय़ों के कारण सुर्खियों में रहने वाले यूपीटीयू में एक बार फिर भारी गड़बड़ी सामने आयी है। यूपीटीयू में एक हफ्ते में दो बार पेपर लीक हुए हैं। पहले तो कुलपति ने इस बात से इंकार किया लेकिन साक्ष्य मिलने पर इस बात को स्वीकार किया। इस पूरे प्रकरण की जांच यूपीटीयू प्रशासन अपने स्तर पर करने की बात कर रहा था लेकिन पेपर लीक होने में विवि के कई शिक्षकों का हाथ था ऐसी जानकारी मिलने के बाद स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए विवि प्रशासन ने इस मामले में एफआईआर दर्ज करायी है।
यूपीटीयू में कभी डेटा बिकता है तो कभी छात्रों को समय से रिजल्ट नहीं मिला। अपनी इस प्रकार के कारनामों से यूपीटीयू हमेशा चर्चा का विषय बना रहता है लेकिन इस बार मामला और भी गम्भीर है क्योकि एैन पेपर के दो घण्टे पहले ही होने वाली परीक्षा का पेपर लीक हो चुका था। इस बात की जानकारी जब कुलपति ओंकार सिंह को दी गई तो उन्होंने इस बात से इंकार कर दिया लेकिन तभी दूसरे दिन लीक हुआ पेपर खुद कुलपति के ईमेल पर पड़ा मिला। इस बात की जानकारी मिलते ही ओंकार सिंह ने सभी सेंटरों पर पेपर को रोक दूसरा सेट र्र्ईमेल के जरिये भेजा। इस पूरे प्रकरण मे कुलपति ने खुद ही जांच करने की बात कही लेकिन पेपर लीक होने में विवि के कई शिक्षकों का हाथ पाया गया। मामले की गम्भीरता को देखते हुए इसमें एफआईआर करने का फैसला किया है। वहीं पेपर लीक होने की शिकायत करने वाले छात्र को शिक्षकों ने कॉलेज से निकालने की धमकी दी। इस पर छात्र ने विवि प्रशासन से इसकी शिकायत की यूपीटीयू के रजिस्ट्रार ने इस मामले पर जानकीपुरम मे एफआईआर दर्ज करायी है और कहा कि गुनहगारों को किसी भी प्रकार की छूट नहीं दिय जायेगी।
अधर में लटकी रेफरल नीति, मरीजों की जान को खतरा
मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल लगाना पड़ता है चक्कर
केस-1
लखनऊ। फतेहपुर के बकौली गांव निवासी दिनेश और छोटेलाल एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गये। उन्हें हैलट से केजीएमयू ट्रॉमा के लिए रेफर किया गया। ट्रॉमा के ऑर्थाेपेडिक विभाग में बेड न खाली होने के कारण डॉक्टरों ने भर्ती करने से मना कर दिया। ऐसे में मरीज घंटों स्ट्रेचर पर तड़पता रहा। उसके बाद मरीज को बलरामपुर अस्पताल ले जाया गया।
केस-2
गोसाईगंज निवासी धर्मेद्र छत से गिर गया था। जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया था। जिसके बाद उसे सिविल अस्पताल की इमरजेंसी में ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने मरीज को ट्रॉमा के लिए रेफर कर दिया। ट्रॉमा में बेड न खाली हो पाने के कारण मरीज को भर्ती नहीं किया जा सका। आखिर में मरीज के परिजन मरीज को निजी हॉस्पिटल ले गए।
ये मात्र दो केस नहीं है बल्कि राजधानी सहित आस-पास के जिलों से इलाज कराने आये मरीजों को जानकारी के अभाव में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। राजधानी के अस्पतालों से ट्रॉमा सेंटर के लिए भेजे गये मरीजों को रोजाना बेड के अभाव में लौटाया जाता है। ऐसे मेंं रेफरल नीति का लागू होना बहुत जरूरी है। इससे ट्रॉमा सहित अस्पतालों के सभी विभागों में खाली या भरे बेडों की जानकारी रहेगी। जिससे मरीज को लौटना न पड़े। इन असुविधाओं से छुटकारा पाने के लिए महानिदेशक हेल्थ की केजीएमयू और अस्पतालों के प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत चल रही है। इसमें राजधानी के बड़े अस्पतालों सहित छोटे-छोटे अस्पतालों को भी जोड़ा जायेगा। खासकर ये दिक्कतें ट्रॉमा में सबसे अधिक होती हैं। ऐसे में केजीएमयू प्रशासन की ओर से रेफरल सिस्टम को लागू करवाने का पूरा प्रयास किया जा सके।

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