मौत का पर्याय बना इंसेफ्लाइटिस

पूर्वांचल में इसेफ्लाइटिस से मौतों का सिलसिला जारी है। इस बीमारी से 24 घंटे में 10 बच्चों की मौत हो चुकी है। बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के नेहरू चिकित्सालय में अभी भी 23 नए मरीज भर्ती हैं। इनमें कई मरीजों की हालत गंभीर है। जिन लोगों के बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं, उनकी आंखों में मौत का डर आसानी से देखा जा सकता है। इस अस्पताल में रोजाना किसी न किसी बच्चे की मौत होती रहती है।

sanjay sharma editor5उत्तर प्रदेश और बिहार के तराई इलाकों में इंसेफ्लाइटिस नामक बीमारी मौत बनकर तांडव मचा रही है। अस्पतालों में बच्चों का शव लेकर चीखते-बिलखते लोगों की आवाजों से कलेजा मुंह को आ जाता है। यह बीमारी पिछले 25 वर्षों से तराई क्षेत्रों में मौत का पर्याय बन चुकी है। इस समय उत्तर प्रदेश और बिहार के अस्पतालों में इंसेफ्लाइटिस के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अस्पतालों में बच्चों को भर्ती करने के लिए पर्याप्त संख्या में बेड भी नहीं है। ऐेसे में मजबूरन एक बेड पर दो से तीन बच्चों को लिटाकर इलाज किया जा रहा है। जो स्वास्थ्य महकमे की संवेदनशीलता और संसाधनों की पोल खोलने के लिए काफी है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों पर रोक न लग पाना है।
पूर्वांचल में इसेफ्लाइटिस से मौतों का सिलसिला जारी है। इस बीमारी से 24 घंटे में 10 बच्चों की मौत हो चुकी है। बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के नेहरू चिकित्सालय में अभी भी 23 नए मरीज भर्ती हैं। इनमें कई मरीजों की हालत गंभीर है। जिन लोगों के बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं, उनकी आंखों में मौत का डर आसानी से देखा जा सकता है। इस अस्पताल में रोजाना किसी न किसी बच्चे की मौत होती रहती है। यह सिलसिला सितंबर महीने के आखिर तक चलता रहता है। पूर्वांचल के तराई इलाकों में रहने वाले लोगों को इंसेफ्लाइटिस के इलाज के लिए अक्सर बाबा राघव दास मेडिकल कालेज आना पड़ता है। हालांकि केन्द्र सरकार ने गोरखपुर में एम्स का शिलान्यास कर दिया है लेकिन एम्स बनकर तैयार होने तक जाने कितनी माताओं की गोद सूनी हो जायेगी। इस खतरनाक बीमारी से हजारों की संख्या में लोग अपंग हो जाते हैं। ऐसे लोगों को संभालना भी मुश्किल हो जाता है। इसी प्रकार की स्थिति बिहार के तराई इलाकों में भी है। वहां भी इंसेफ्लाइटिस से मरने वालों की संख्या अब तक 2000 का आंकड़ा पार कर चुकी है।
इंसेफ्लाइटिस की बीमारी जिस बच्चे को हो जाती है, उसके परिवार के लोग बच्चे के बचने की उम्मीद छोड़ देते हैं। इसलिए मौत और अपंगता का कारण बनने वाली इंसेफ्लाइटिस का ठोस इलाज ढूंढने की जरूरत है। इस बीमारी से बचाव और इलाज के नाम पर सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है लेकिन जमीनी स्तर पर लोगों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में सरकार को इंसेफ्लाइटिस को राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाने के साथ ही बीमारी के कारणों का समूल नाश करने की दिशा में काम करना होगा। यदि ऐसा नहीं हो सका तो मौतों का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।

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