मोदी सरकार का पहला साल पौधे रोपने जैसा

एक वर्ष पूर्व तक पूंजीपतियों या उनके एजेंट विभिन्न मंत्रालयों और मंत्रियों के कार्यालयों में ऐसे घुस जाते थे जैसे वह उनका निजी कार्यालय हो। अब सचिवालय के गलियारे सूने हैं और कोयला खदानों की नीलामी कर सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके लिए कौन से रास्ता खुला है।
राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

पिछले 720 महीनों (साठ साल) में देश को जिस गति से विकास करना चाहिए वैसा न होने का संज्ञान न भी लिया जाए तो भी कम से कम 120 महीनों (दस साल) में जो बदहाली आई है, उसको नजरंदाज नहीं किया जा सकता न ही उस पर पर्दा डाला जा सकता है। यह बात कोयल घोटाला कांड के एक आरोपी तत्कालीन कोयला राज्य मंत्री दासारि नारायण राव द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपने बचाव के लिए दाखिल किए गए उस शपथ पत्र से स्पष्ट होती है जिसमें उन्होंने सारी जिम्मेदारी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर डाली है। इस स्थिति के बावजूद जिसने लोकसभा में कांग्रेस को 44 सीटों पर समेट दिया, जब 12 महीने की नरेंद्र मोदी सरकार पर लोक हितों की उपेक्षा और निहित स्वार्थों के पोषक होने का आरोप लगाती है तो गांवों में प्रचलित एक कहावत याद आ जाती है नंगा नाचे फाटे क्या। कांग्रेस का जो बिगडऩा था, वह तो बिगड़ चुका है और इस और आगामी वर्ष जो चुनाव होने जा रहे हैं उसमें कोई भी सबल क्षेत्रीय दल उसे स्पर्श करने के लिए तैयार नहीं है, वह देश के सत्रह राज्यों में लगभग विलुप्त हो चुकी है।
ऐसे में जिस विकास की आशा से अवाम ने लोकसभा में भाजपा को अपूर्व बहुमत दिया है, जिससे राजनीतिक संघर्ष के मुद्दे में बदलाव आया है, को समझ कर विरोध की रणनीति बनाने के बजाय, हंगामे और निराधार आरोपों के तीर चलाकर विकास की गति रोकने के काम को वह अंजाम देती जा रही है। कांग्रेस यह भी नहीं सोच रही है कि वह जो आरोप लगा रही है वही उसको आइना दिखा रहे हैं। मोदी सरकार के 12 महीने के कार्यकाल में उस पर किसी निहित स्वार्थी के पोषण का आरोप नहीं लगाया जा सकता, वहीं चाहे वह प्रत्येक घर में शौचालय बनवाने की योजना हो, जनधन योजना के अंतर्गत सभी को बिना एक पैसा जमा किए बैंक खाता खुलवाना हो, या अटल पेंशन योजना अथवा दुर्घटना बीमा योजना, इन सभी का लाभ उन्हें ही मिलने वाला है जिन्हें गरीब कहा जाता है। एक वर्ष पूर्व तक पूंजीपतियों या उनके एजेंट विभिन्न मंत्रालयों और मंत्रियों के कार्यालयों में ऐसे घुस जाते थे जैसे वह उनका निजी कार्यालय हो। अब सचिवालय के गलियारे सूने हैं और कोयला खदानों की नीलामी कर सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके लिए कौन से रास्ता खुला है।
यद्यपि कल ही रोपे गए पौधे से आज ही फल नहीं मिलता यह सब जानते हैं, फिर भी इतने वर्षों की त्रासदी झेल रहे अवाम में विकास का रास्ता अपनाए जाने पर तत्काल परिणाम की जो अपेक्षा है उसको समझना भी जरूरी है। मोदी सरकार को इस संदर्भ विपक्षी ही नहीं सहयोगी दलों जैसे शिवसेना से भी सहयोग की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। ये सभी अपेक्षा की भूख बढ़ाने के लिए जिस उद्यम में लगे हैं उसके लिए भारतीय जनता पार्टी को अवाम में यह समझ बढ़ानी होगी कि पौधा रोपते ही फल नहीं मिलता। यदि वह पौधा मीठे फल का हो तो यथा समय उससे मीठा फल ही मिलेगा। गरीबों के लिए जिन योजनाओं को लागू किया गया है उसका फल तो समय आने पर ही मिलेगा। प्रकृति की मार ने कृषि क्षेत्र को बेहाल कर दिया है। कृषि अपने ही बोझ से दबी हुई है। देश की 75 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है और प्रत्येक अर्थशास्त्री यह मानता है कि उस पर से यह बोझ कम होना चाहिए, विशेषकर इसलिए भी क्योंकि इनमें अस्सी प्रतिशत ऐसे किसान हैं जिनके पास एक एकड़ से कम भूमि है। उन्हें अपने परिवार के भरण पोषण के लिए मजदूरी करनी पड़ती है। इसके लिए वे अपने घरों से दूर जाते हैं। शहरों के गंदगी भरे इलाके में रहते हैं और बीमार पड़ते हैं।
भूमि अधिग्रहण विधेयक में इनकी समस्या का समाधान करने के लिए संशोधन प्रस्तावित है। जिसको किसान हित विरोधी के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। संकुचित भावना से आलोचना कर लोगों को भरमाया जा रहा है, उसका एकमात्र उद्देश्य है सरकार का जनता को दिए गए आश्वासनों पर भरोसा तोडऩा।

 

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