मोदी सरकार का एक साल उम्मीदों पर हावी नाकामी

थोक और खुदरा मूल्य सूचकांकों के आंकड़े जारी करते हुए सरकार महंगाई के मोर्चे पर भी अपनी पीठ थपथपाती रहती है। लेकिन बाजार का सच किसी से छुपा नहीं है। आटा, दाल, चावल से ले कर दूध, फल, सब्जी तक हर आम उपभोक्ता वस्तु की बेलगाम कीमतें आसमान छूने पर आमादा हैं। कुछ जरूरी वस्तुओं के दाम पिछले साल के मुकाबले दोगुने हो गए है। यानी आम आदमी को महंगाई के मोर्चे पर राहत की अब भी दरकार है।
संजीव कुमार दुबे

वक्त का पता भी नहीं चला। देखते-देखते एक साल गुजर गया और मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल का एक साल पूरा कर लिया। जब पीएम मोदी ने देश की बागडोर संभाली तो हर तबके की अपनी-अपनी उम्मीदें थी। युवाओं के दिलों में ये उम्मीद जगी कि रोजगार बढ़ेगा और बेरोजगारी दूर होगी।
किसानों की आस इस बात को लेकर थी कि मोदी सरकार के दौरान खेती करना सहज और पहले के मुकाबले ज्यादा धन उपार्जन वाला माध्यम साबित होगा। सबसे ज्यादा उम्मीद उस मध्यम तबके को थी जो रोजाना अपने बजट की रस्साकशी और आपाधापी के चक्रव्यूह से जूझता है। आम वर्ग को उम्मीद थी कि देश में महंगाई कम होगी और सुख-चैन के दिन दोबारा लौटेंगे। लगभग सबने उम्मीदें पाली थी। सवाल उठता है कि क्या मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल के दौरान सभी तबकों की उम्मीदें पूरी हुई? क्या मोदी सरकार उनकी उम्मीदों की कसौटी पर खरे उतरे?
जमीनी हकीकत में बदलाव ना के बराबर दिखता है। मीडिया के विभिन्न माध्यमों के जरिए आंकड़ों की बाजीगरी से मृग मरीचिका की तरह देश में बहुत विकास और बदलाव होने की झूठी तस्वीर दिखती है। मोदी सरकार के एक साल पूरे होने पर आम लोगों के हालात में सुधार नहीं हुआ है। इस बात से मोदी सरकार भी इंकार नहीं कर सकती है। रोजगार में बढ़ोत्तरी नहीं हुई । आम आदमी को उम्मीद थी कि महंगाई कम होगी। लेकिन शायद वो भूल गए थे कि महंगाई बढ़ती है, कम नहीं होती है। यह सब्जबाग तो दिल बहलाने के लिए और वोट लेने के लिए दिखाया जाता है कि महंगाई स्थिर कर देंगे। सच्चाई यह है कि महंगाई दर तो घटी है लेकिन घटी महंगाई दर महंगाई को बढऩे से नहीं रोक सकी। महंगाई दर आम जनता नहीं समझती। उसे चीजों के दाम में जब कमी आती है तो उसके लिए मुफीद और खुशनुमा ऐहसास होता है। लेकिन अफसोस मोदी सरकार में महंगाई बढ़ती जा रही है। इसपर लगाम लगाने के लिए मोदी सरकार को नए सिरे से कोई ठोस रणनीति बनानी होगी।
थोक और खुदरा मूल्य सूचकांकों के आंकड़े जारी करते हुए सरकार महंगाई के मोर्चे पर भी अपनी पीठ थपथपाती रहती है। लेकिन बाजार का सच किसी से छुपा नहीं है। आटा, दाल, चावल से ले कर दूध, फल, सब्जी तक हर आम उपभोक्ता वस्तु की बेलगाम कीमतें आसमान छूने पर आमादा हैं। कुछ जरूरी वस्तुओं के दाम पिछले साल के मुकाबले दोगुने हो गए है। यानी आम आदमी को महंगाई के मोर्चे पर राहत की अब भी दरकार है।
महंगाई के मद्देनजर अब दालों पर जरा निगाह डाल ले। पिछले एक साल में यू तो महंगाई दर में काफी गिरावट देखने को मिली है, लेकिन दाल की कीमतें सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। खाद्य मंत्रालय की प्राइस मॉनिटरिंग सेल के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक, 26 मई 2014 से 22 मई 2015 के बीच दिल्ली में उड़द दाल 71 रुपये प्रति किलो से बढ़ कर 109 प्रति किलो यानी 54त्न महंगी हो गई। अरहर दाल पिछले साल 26 मई 2014 को 75 प्रति किलो थी, जो 22 मई 2015 को बढ़ कर 108 रूपये प्रति किलो हो गई, यानी 44त्न की बढ़ोत्तरी। चना दाल पिछले एक साल में 50 रुपये प्रति किलो से बढक़र 68 प्रति किलो यानी 36त्न महंगी हुई और मसूर दाल इस दौरान 70 प्रति किलो से 94 प्रति किलो यानी 35त्न महंगी हुई। बाजार में सब्जियों के भाव भी बढ़ते गए। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो सब्जियों और फलों की कीमतों में 20 से 50 फीसदी का इजाफा हुआ है और ठंड के मौसम में पसंद की जाने वाली सब्जियों जैसे मटर और हरी सब्जियों की कीमतों में तो करीब 100 फीसदी तक का इजाफा हुआ।

अब कुछ जानकार और अर्थशास्त्री अब भी मोदी सरकार के साथ है। उनका कहना है कि सरकार के फैसलों का असर दिखने में कुछ वक्त लगेगा। लेकिन जनता ने जिस बहुमत और उम्मीद के साथ मोदी सरकार को बिठाया है। उसकी उम्मीदों का क्या? विदेश नीति सरकार की असरदार जरूर है। लेकिन आम आदमी का इन चीजों से कोई सरोकार नहीं होता। चीन या अमेरिका से होनवाले किसी समझौते का आम आदमी पर कोई प्रभाव ना के बराबर ही होता है। कालेधन के मुद्दे पर मोदी सरकार की पहल सराहनीय तो है लेकिन ठोस नहीं। परिणाम उसके भी आने बाकी है। अब एक साल यानी 365 दिन के बाद दूसरा साल भी आएगा 26 मई 2017 को। तब देखना है कि सरकार देश के हालातों में कितना साकारात्मक बदलाव कर पाती है? देश की समस्याओं का समाधान कर क्या सबकी उम्मीदों पर खरी उतर पाएगी या नहीं। यह एक यक्ष प्रश्न है। लेकिन एक बात साफ है कि मोदी सरकार की इस गति में खुशियों और राहत की बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती है।

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