मोदी सरकार : अब तक की उपलब्धियां ‘शून्य’

मोदी सुशासन, विकास, कालाधन वापस लाने, महंगाई, आतंकवाद समाप्त करने और चुस्त- दुरुस्त शासन देने का वायदा करके सत्ता में आए थे। उन्होंने सबका साथ-सबका विकास जैसा नारा देकर समूह भारतवासियों को अपने साथ जोड़ा था। परन्तु इनमें से किसी भी कसौटी पर अब तक वह खरे नहीं उतर पाए हैं। खाद्य वस्तुओं की महंगाई को देखा जाए तो वह पिछले वर्ष की अपेक्षा बढ़ी हैं।
डा. राजकुमार वेरका

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। पिछले 30 वर्षों के दौरान यह ऐसी पहली सरकार है, जो अपने दम पर पूर्ण बहुमत प्राप्त करके सत्ता में आई है। इससे पहले देश में गठबंधन सरकारें ही सत्ता में आती रही हैं, जो सहयोगी पार्टियों के दबाव के कारण अपनी नीतियों अनुसार खुलकर कार्य नहीं कर पाती थीं। उन्हें एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के अन्तर्गत काम करना पड़ता था। बेशक वर्तमान सरकार में भी एनडीए के अन्य घटक शामिल हैं परन्तु इस सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा के पास अकेले दम पर पूर्ण बहुमत है, जिसके कारण उसे वह दबाव झेलना नहीं पड़ रहा है।
पांच वर्ष की कार्यावधि प्राप्त सरकार के कामकाज के आकलन के लिए एक वर्ष की अवधि कोई कम नहीं होती है। मोदी राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर चमत्कार बनकर उभरे थे। उन्होंने अपने चुनाव पूर्व भाषणों से देशवासियों को सुनहरी स्वप्न दिखाए और बड़े-बड़े वायदे किए थे। उन्होंने जनता के समक्ष स्वयं को विकास पुरुष, लौह पुरुष के तौर पर पेश किया। परन्तु इस एक वर्ष के दौरान उनकी सरकार की कोई ऐसी बड़ी योजना या उपलब्धि सामने नहीं आई जिसे देखकर भविष्य के प्रति कोई आशा उत्पन्न होती हो। आज जनसाधारण स्वयं को ठगा-सा महसूस कर रहा है।
मोदी सुशासन, विकास, कालाधन वापस लाने, महंगाई, आतंकवाद समाप्त करने और चुस्त- दुरुस्त शासन देने का वायदा करके सत्ता में आए थे। उन्होंने सबका साथ-सबका विकास जैसा नारा देकर समूह भारतवासियों को अपने साथ जोड़ा था। परन्तु इनमें से किसी भी कसौटी पर अब तक वह खरे नहीं उतर पाए हैं। खाद्य वस्तुओं की महंगाई को देखा जाए तो वह पिछले वर्ष की अपेक्षा बढ़ी हैं। अगर यह कहा जाए कि महंगाई ने बाजार की लूट का रूप धारण कर लिया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बाजार में मनमाने मूल्य वसूल कर व्यापारी वर्ग जनसाधारण को लूट रहा है। उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है। दालों के भावों ने तो आम आदमी की आंखों से आंसू निकाल दिए हैं। आश्चर्य की बात है कि दालों के भाव एक महीने में 4 प्रतिशत से भी अधिक बढ़े हैं। मोदी ने अपने चुनाव पूर्व भाषणों में काले धन के मुद्दे को खूब उछाला था। वह इस पर कार्रवाई न करने के लिए यूपीए सरकार को पानी पी-पी कर कोसते नहीं थकते थे परन्तु एक वर्ष गुजर जाने के बाद भी इस मुद्दे पर एसआईटी बनाने के अलावा कोई प्रगति नहीं हुई है। अभी तक एसआईटी ने अपना कार्य तक आरम्भ नहीं किया है। दूसरी ओर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मोदी के इस वायदे को चुनावी जुमला कहकर इसकी प्रासंगिकता को हल्का करने में व्यस्त हैं। मोदी ने अपने चुनावी भाषणों में जनसधारण को यह विश्वास दिलाया था कि वह 100 दिनों में ही देश का कायाकल्प कर देंगे परन्तु एक वर्ष गुजर जाने के बाद भी मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार देश के विकास का कोई माडल देशवासियों के सामने पेश नहीं कर सकी है।
विकास के नाम पर अमित शाह के चुनावी जुमले की तरह कुछ और जुमले हवा में तैर रहे हैं मगर धरातल पर कुछ नजर नहीं आ रहा है। सरकार ने अभी हाल ही में बड़े धूम-धड़ाके के साथ तीन सामाजिक योजनाओं की घोषणा की है। ये तीन योजनाएं, जिनमें दुर्घटना बीमा, जीवन बीमा और पैंशन योजना शामिल हैं, का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इनसे आम आदमी को कोई लाभ नहीं हुआ है। ये योजनाएं तो केवल उन लोगों के लिए है जिन के पास बैंक खाते हैं और उन खातों में पैसे हैं। सवा अरब की आबादी वाले देश में केवल 15 करोड़ लोगों के पास ही खाते हैं। इन 15 करोड़ में से भी एक-तिहाई ऐसे खाते हैं जिनकी जमा राशि शून्य है। इन योजनाओं में सरकार की ओर से कोई अंशदान नहीं डाला जा रहा है और न ही इसके लिए किसी प्रकार से बजटीय समर्थन का प्रावधान रखा गया है। प्रधानमंत्री सुरक्षा योजना में 12 रुपये के प्रीमियम पर बीमा कम्पनी 2 लाख रुपये का कवर उपलब्ध करवाएगी, इसमें सरकार कहां है?

यह पैसा कमाने का कारोबार है। सरकार को बड़े बीमा कारोबार से लाभ होता है क्योंकि बीमा कोष सरकार की ढांचागत योजनाओं के लिए बेहद उपयोगी रहते हैं। इसमें सरकार अपनी तरफ से क्या लगा रही है बल्कि योजनाओं के लिए लोगों से पैसा ले रही है। वे सभी योजनाएं नई बोतल में पुरानी शराब जैसी हैं। परन्तु मोदी दावा कर रहे हैं कि यह उनके दिमाग की उपज है। इस सरकार ने अभी तक बुलेट ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन, सब का साथ-सब का विकास जैसे जुमले हवा में उछालने के अलावा कुछ ठोस नहीं किया है। विकास पुरुष के सत्ता में आते ही विकास ठहर-सा गया है।

मोदी ने अपने भाषणों में लोगों से सुशासन, चुस्त-दुरुस्त सरकार और मिनिमम गवर्नमैंट मैक्सीमम गवर्नैंस देने का वादा भी किया था। वह यू.पी.ए. सरकार पर अकर्मण्यता और कुशासन के आरोप लगाते थे। वह स्वयं को विकल्प के तौर पर पेश करते थे परन्तु पिछले एक वर्ष के दौरान वह उस तथाकथित ढीली व्यवस्था का विकल्प नहीं बन पाए। अभी तक यू.पी.ए. सरकार की ही पुरानी योजनाएं चल रही हैं। हां, कुछ योजनाओं के नाम बदलने की तत्परता इस सरकार ने अवश्य दिखाई है।

स्वयं को किसानों, गरीबों और आम आदमी के मसीहा के तौर पर पेश करने वाले मोदी सत्ता में आते ही कार्पोरेट घरानों के नजदीकी बन गए हैं जिससे आमजन में उनकी छवि एंटी फार्मर-एंटी पुअर की बन गई है। वैसे भी पहले से ही यह आम धारणा रही है कि भाजपा शहरी कारोबारियों और व्यापारियों की खैरख्वाह पार्टी है। अब ये सभी बातें सच प्रमाणित हो रही हैं। भूमि अधिग्रहण जैसे किसान विरोधी बिल से यह बात और पुख्ता हो गई है कि यह सरकार कार्पोरेट हितैषी है। इस बिल को लगभग सभी पाॢटयां किसानों की आत्महत्याओं में बढ़ौतरी करने वाले के तौर पर देख रही हैं, परन्तु मोदी सरकार इसे पारित करवाने पर बाजिद है।

इस सरकार की कार्यप्रणाली से ऐसा आभास होने लगा है कि देश को केवल 2-3 लोग ही चला रहे हैं। क्योंकि सत्ता की सभी शक्तियां पी.एम.ओ. तक ही सीमित होकर रह गई हैं। यहां तक कि मंत्रियों को अपना निजी स्टाफ तक रखने की आज्ञा नहीं है।

वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण शौरी का कहना है कि मोदी सरकार का ध्यान सुर्खियां बटोरने की ओर है। सरकार जेतली, शाह और मोदी की तिकड़ी चला रही है। ईसाई संस्थानों पर हमले, घर वापसी और लव जेहाद जैसे अभियानों के कारण अल्पसंख्यकों में बेचैनी पैदा हो रही है। वे स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, जिसके कारण समाज के विभाजन का खतरा उत्पन्न हो गया है।
मोदी बेशक इसी बहुमत के कारण प्रधानमंत्री बने हैं परन्तु उनका स्वभाव बहुमत को स्वीकार करने वाला कतई नहीं है। वह नारे तो ‘सबका साथ-सबका विकास’ जैसे देते हैं, परन्तु वह अपने साथ लेकर किसी को नहीं चलते हैं।

पहले उन्होंने पार्टी के बहुत से पुराने बुजुर्ग नेताओं को हाशिए पर डाला और अब अपने सहयोगी मंत्रियों तक को आपातकाल जैसी स्थिति में रहने को मजबूर कर दिया है। वह अपनी आलोचना सहन नहीं कर सकते हैं। अपने चुनाव पूर्व भाषणों में मोदी ने देशवासियों को आन्तरिक ही नहीं, बल्कि बाहरी सुरक्षा भी उपलब्ध करवाने का वायदा किया था परन्तु उनका यह वायदा भी चुनावी जुमला ही प्रमाणित हो रहा है। पिछले एक वर्ष के दौरान सैंकड़ों बार पाकिस्तान अन्तर्राष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन करके हमारे जवानों को शहीद कर चुका है, परन्तु सरकार उससे बात तो क्या, सख्त शब्दों में चेतावनी तक देने का साहस नहीं कर पाई है।

पाकिस्तान के साथ रिश्ते साड़ी और शाल भेंट करने से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। चीन मामले में अभी तक मोदी कुछ विशेष नहीं कर पाए हैं। उन्होंने पहले चीन को विदेश नीति के मामले में सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही थी परन्तु बाद में जापान जाकर उसके विस्तारवाद पर सवाल खड़े कर दिए थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी अब तक एक वर्ष में ही लगभग 30 विदेश यात्राएं कर चुके हैं।

वह अपने वर्तमान चीन दौरे के दौरान क्या उपलब्धियां हासिल करके भारत लौटे हैं! देश की आन्तरिक सुरक्षा में भी कोई विशेष सुधार नहीं है। कश्मीर की स्थिति पहले से भी खराब हो चुकी है। यूं तो राष्ट्रवाद का ढोल पीटते हुए भाजपा कभी थकती नहीं है परन्तु जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों और अलगाववादियों की समर्थक पी.डी.पी. के साथ हाथ मिलाकर उन्होंने सरकार का गठन कर लिया है। इस सरकार के गठन के बाद घाटी के हालात और भी खराब होते जा रहे हैं।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इस एक वर्ष के दौरान मोदी सरकार की उपलब्धियां शून्य रही हैं। मोदी प्रचारक तो अच्छे हो सकते हैं परन्तु शायद उनमें शासकों जैसी प्रतिभा नहीं है।

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