मोदी शासन राष्ट्रीय नजरिये से करें, पार्टी नजरिये से नहीं

 कुलदीप नैयर
लोगों की याददाश्त कितनी कम है? पचास साल पहले भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत 10-11 तारीख की मध्यरात्रि को ताशकंद में हुई थी। मैं युनाइटेड न्यूज आफ इंडिया का संपादक और जनरल मैनेजर के रूप में काम करना शुरू कर चुका था। लेकिन शास्त्री जी का प्रेस आफिसर बना हुआ था। यह सवाल अभी भी पूछा जाता है कि क्या शास्त्री जी की प्राकृतिक मौत हुई थी या दिल के दौरे के कारण। किसी ने उनकी मौत के समय कोई सवाल नहीं उठाया था, हालांकि उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने यह शक जाहिर किया था कि उन्हें जहर दिया गया था। जब मैं अपना शोक प्रकट करने गया था तो उन्होंने ऐसा कहा था। बरसों बाद जहर देने वाली बात को लेकर एक निर्दलीय सांसद धर्मदेव शास्त्री ने लोकसभा में बयान दिया तो सदन में हंगामा हो गया था और सांसदों ने और भी जानकारी की मांग की थी। इसके बाद शास्त्री जी की मौत को लेकर सदन और देश में एक बड़ी बहस हुई थी। यह बहस आज भी खत्म नहीं हुई है।
मुझे याद है कि मैं ताशकंद होटल के कमरे में सो रहा था तो एक रूसी महिला ने मेरा दरवाजा पीटा और कहा तुम्हारा प्रधानमंत्री मर रहा है। ताशकंद होटल वह जगह थी जहां भारतीय और पाकिस्तानी पत्रकारों को ठहराया गया था। दरवाजे पर दस्तक ने मुझे सपने से जगाया जहां मैंने सुना था कि शास्त्री जी की मौत हो गई है। यह करीब मध्य रात्रि थी। मैं उनके कमरे तक शुरू में पहुंचने वालों में कुछ लोगों में था जहां उनका पार्थिव शरीर पड़ा था। यह एक विशाल कमरा था जिसकी एक बड़ी शय्या पर मुरझाया हुआ शास्त्री जी का शरीर किसी बहुत बड़े पन्ने पर अंग्रेजी में लिखे जाने वाले पूर्ण विराम (बिंदु) की तरह था। मेरे साथ प्रेस इन्फारमेशन ब्यूरो का फोटोग्राफर था। हम दोनों ने उनके शरीर को सीधा किया और इसे उस तिरंगे झंडे से ढंका जो कमरे के एक कोने में एक बैनर के ऊपर रखा था। मैं सचेत था कि जल्द ही सोवियत यूनियन और पाकिस्तान के नेता श्रद्धांजलि अर्पित करने दरवाजे पर दस्तक देंगे। सोवियत प्रधानमंत्री एएन कोसिगिन शास्त्री जी के कमरे में ही थे जब पाकिस्तान के मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर जनरल अयूब श्रद्धांजलि देने आए तो उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा- यहां वह आदमी पड़ा है जो भारत और पाकिस्तान को नजदीक ला सकता था।
पूरा ताशकंद उस समय सडक़ों पर था जब शास्त्री जी का पार्थिव शरीर हवाई अड्डे की ओर ले जाया जा रहा था। अपना समर्थन और सहानुभूति जाहिर करने के लिए ढेर सारे लोगों ने हमारे साथ हाथ मिलाने की कोशिश की। तत्कालीन मंत्री स्वर्ण सिंह ने लोकसभा में गलत बयान दिया कि शास्त्री जी के कमरे में एक कालबेल (घंटी) थी, वास्तव में ऐसी कोई घंटी नहीं थी।
क्या ताशकंद समझौता उनके मन को परेशान कर रहा था? इस बारे में कोई शक नहीं है। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस की तो अपने साथ गए भारतीय पत्रकारों को भारी विरोध करते पाया। पत्रकार इसे लेकर नाराज थे कि हमारे हिस्से के कश्मीर की दो चौकियां, हाजीपीर ओर टिथवाल को वापस कर दिया गया। शास्त्री जी ने मुझे बताया था कि वह इसमें कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि सोवियत यूनियन वालों ने धमकी दी थी कि सुरक्षा परिषद में लंबित कश्मीर के मुद्दे पर वे अपने वीटो का इस्तेमाल हमारे खिलाफ करेंगे।
मुझे लगता है कि इस टिप्पणी से शास्त्री जी को सबसे ज्यादा धक्का लगा और वह कमरे में परेशान होकर घूम रहे थे। जब उनके निजी सहायक ने कहा कि वह उनके कमरे में जमीन पर सोएगा तो वह राजी नहीं हुए। राजनीतिज्ञ सदैव राजनीतिज्ञ ही रहते हैं। मुझे याद है कि स्वर्ण सिंह ने मुझसे ताशकंद में ही पूछा था कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। मैं दुख में इतना डूबा था कि कोई जवाब नहीं दे पाया। लेकिन वह और वाईबी चौहान उत्तराधिकारी के बारे में चर्चा करते रहे। उन्हें इसका जरा भी पता नहीं था कि कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज, जो चार्टर्ड हवाई जहाज में चेन्नई से दिल्ली आ रहे थे, तय कर चुके थे कि श्रीमती इंदिरा गांधी उत्तराधिकारी होंगी? कामराज नहीं चाहते थे कि मोरारजी उत्तराधिकारी बनें क्योंकि वह उन्हें बहुत सख्त और जिद रखने वाला आदमी मानते थे। कांग्रेस पार्टी सर्वसम्मति वाले उम्मीदवार के पक्ष में थी। कामराज ने पाया कि बहुमत श्रीमती इंदिरा गांधी के पक्ष में था। मोरारजी देसाई ने उसे स्वीकार नहीं किया और उस चुनाव को हार गए जो उन्होंने पार्टी पर थोपी था।
श्रीमती इंदिरा गांधी अपने नामजद होने का इंतजार कर रही थीं। यूएनआई को दिए गए इंटरव्यू में वह कह चुकी थीं कि यह पार्टी पर नहीं, जनता पर निर्भर करता है कि वह उसे चुने जिसे वह पसंद करती है। यह मोरारजी देसाई को चुनौती थी जिन्हें ज्यादातर मुख्यमंत्रियों का समर्थन मिला हुआ था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कामराज का इंदिरा गांधी को समर्थन ने मामला तय कर दिया था। लेकिन मोरारजी के अडिय़लपन के कारण उन्हें प्रधानमंत्री का पद गंवाना पड़ा। बहुत साल बाद वह प्रधानमंत्री बने भी तो समझौता नहीं करने वाले अपने रवैए के कारण उन्होंने पार्टी तोड़ दी और सरकार गंवा दी। पचास साल बाद, शास्त्री जी का उदाहरण देश के लिए एक सबक है क्योंकि उन्होंने ऐसी चाभी दी है जो किसी भी ताले को खोल सकती है। मोदी को उनके कदम पर चलना चाहिए कि देश का शासन राष्ट्रीय नजरिए से करना चाहिए, पार्टियों के नजरिए से नहीं।

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