मोदी, मीडिया और जनाक्रोश

 एनके सिंह

जब ड्राइंग रूम में चिप्स खाते हुए पूरा देश गुस्से में हो, जब मीडिया के ‘राष्टï्रवादी एंकर’ जंग की जुबान ऐसे बोल रहा हो जैसे आज हीं स्टूडियो के एसी कमरे से निकल माइनस 20 डिग्री वाले युद्ध ‘क्षेत्र में जा कर पाक सेना को नेस्तनाबूद कर देगा, ऐसे में देश के सत्ताधारियों के लिए संकट काफी बड़ा हो जाता है। खासकर अगर 56-इंच छाती कह कर चुनाव से पहले पाकिस्तान को ललकारा हो और उसी पाकिस्तान से भेजे गए महज तीन लोगों वाले आत्मघाती दस्ते ने 18 जवान मार दिए हों तो देश उस 56-इंच छाती का सामरिक विस्तार देखना चाहता है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए एक बड़ी समस्या थी कि कदम कैसे उठायें। क्या जन-भावना को तथ्यों की बेदी पर चढाते हुए पारम्परिक युद्ध शुरू करें या फिर भाव- और स्थिति ‘शून्य हो कर निरपेक्ष विवेचना करें कि (अ) युद्ध या युद्ध नहीं; (ब) युद्ध लेकिन अपनी शर्तों पर और समय पर या (स) युद्ध जो भारत की जनता चाहती है उससे हट कर ‘गुप्त युद्ध- जो दुश्मन की सामाजिक-सामरिक-राजनीतिक कमजोरियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा युद्ध जो नजर तो न आये लेकिन दुश्मन भीतर से हीं खत्म होता रहे।
मोदी ने केरल के अपने भाषण में अन्तिम विकल्प चुना। जो पाकिस्तान, भारत की सामरिक क्षमता , विश्वसनीय भू-रणनीतिक परिस्थिति जानते हैं वे मोदी के बयान में एक बेहद सही समाधान की दिशा देख रहे हैं। एक आर्थिक, सामाजिक, संस्थागत तौर पर अवसान की ओर जा रहा देश हमें लडऩे को मजबूर करदे तो हमारी वही हार है। यही कारण है कि मोदी ने पाकिस्तान की जनता से सीधा संवाद किया। भारत में एक वर्ग काफी नाराज भी है। मीडिया एक एक वर्ग भी राष्टï्रवादी गुस्से में है। मोदी -तोड़ तो , फोड़ तो, फाड़ दो, बर्बाद कर दो नहीं कहा जो वे चाहते थे।
कुछ साल पहले तक भारतीय मीडिया दर्शकों के गुस्से का पात्र बना करती थी। पर अब वह मजाक का पात्र बन गयी है। इसके स्टूडियो में बैठा एंकर जब अपने में भारत का और भारत में अपना अक्स देखते हुए किसी नीम समझ वाले पार्टी -प्रवक्ता से पूछता है कि ‘देश जानना चाहता है’ तो लगता है मानो कह रहा हो ‘दे-दे देश के नाम, टी आर पी दे दे’। इसमें दो वर्ग हैं एक जो वर्तमान सत्ता-पक्ष और उसके नेता में ‘ईश्वरीय गुण’ देखने लगता है उस आशिक की तरह जो गाता है ‘तुझमें रब दिखता है यारा मैं क्या करू’ और दूसरा वह है जो मोदी और उनकी पार्टी में इतने दुर्गुण देखता है कि स्वच्छता के सन्देश में भी उसे साम्प्रदायिकता की बू आने लगती है। जे एन यू के कन्हैया में उसे धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक दिखता है और कश्मीर के पत्थरबाज युवाओं में क्रांतिकारी। क्या मजाल कि कोई इन युवाओं की स्वतन्त्रता और जीने के अधिकार का मुकाबला अर्ध-सैनिक बल के जवानों की इसी अधिकार से करे। जीने का अधिकार तो इनके हिसाब से मात्र गैर-हिन्दू , राज्य के खिलाफ गोली चलने वाले आतंकियों और नक्सालियों का ही है। इनकी माने तो अर्ध-सैनिक बल और सेना जे जवानों ने तो उसी दिन ‘जीने का अधिकार’ या ‘उपद्रव में मरने से बचने का अधिकार’ खो दिया जिस दिन देश के लिए लडऩे की कसम खाई और सेवा में शामिल हुए। स्वस्थ प्रजातंत्र में मीडिया की भूमिका पाक्षिक नहीं होती। उसे निरपेक्ष भाव से स्थितियों का विश्लेषण करना चाहिए। लेकिन आज देश के तमाम चैनलों में एक शाश्वत भाव देखने को मिल रहा ह। वह या तो लगातार इस धारा को संभाले हुए है या ‘उस’ धारा को। या तो वह सीधे पाकिस्तान में घुस कर ‘हमेशा के लिए यह झंझट खत्म करो’ के भाव में ‘देश ऐसा चाहता है’ बता रहा है या फिर पाकिस्तान के साथ कश्मीर को नत्थी करके के कश्मीरी उग्रवादियों से वार्ता को सबसे सही रास्ता बता रहा। किसी देश से युद्ध की चर्चा स्टूडियो के जरिए नहीं हो सकती क्योंकि 90 प्रतिशत ऐसे कारक होते हैं जो उस स्टूडियो में बैठे एंकर को दूर-दूर तक मालूम नहीं होते ना हीं डिस्कशन में भाग ले रहे ‘लाल बुझक्कडो को’ कोई जानकारी होती है। पर ये 45-50 लोग जिनमें दस एंकर एडिटर हैं देश की सोच को प्रतिबिंबित करने का दावा करते हैं । लगता है भडैती हो रही है। किसान की दशा, रोजगार की स्थिति, घट रहे आई एम् आर(बाल मृत्यु दर) और एम् एम् आर (मातृ मृत्यु दर) पर क्या आपने कभी कोई चर्चा सुनी है? इन एंकरों एडिटरों के हिसाब से भारत अपनी असली समस्या नहीं जानना चाहता है बल्कि वह यही जानना चाहता है जो ये टी वी स्टूडियो में चिल्ला-चिल्ला कर बोलने वाले इन्हें बताते हैं। लेकिन सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। जब देश का मीडिया घंटों और पेज दर -पेज यह दिखाता है कि किस तरह 2०03 ट्रिलियन डॉलर जी डी पी से संपन्न दुनिया की दशवें नंबर की अर्थव्यवस्था वाले देश में एक आदिवासी पति दाना मांझी अपनी पत्नी अमंग देई का शव कंधे पर लेकर 60 किलोमीटर दूर गाँव जा रहा है और साथ में उसकी बिलखती 12 साल की बेटी घिसट घिसट कर चल रही है तो वह कोई कॉर्पोरेट हित नहीं साधता। यह खबर देश की सामूहिक चेतना को झकझोरती है। जब चैनल और अखबार मानव सभ्यता का विद्रूप चेहरा दिखाते हुए वह तस्वीर और विजुअल समाज में लाते हैं जिसमें एक अन्य गरीब महिला के शव की हड्डियाँ अस्पतालकर्मी तोड़ते हैं — ताकि वह एक गठरी के आकृति में आ जाये और अगली ट्रेन में लाद कर पोस्टमॉर्टम के लिए जिला मुख्यालय ले जाया जाये—तो उससे किसी अम्बानी या अडानी का हित नहीं साधता। देश के चेतना अगर हिलती है तो परिवर्तन के दरवाजे पर दस्तक पड़ता है। और भारत में यह हो रहा है। औपचारिक मीडिया की नजरों से अगर यह बच भी जाये तो सोशल मीडिया इस घटना पर आपको सोने नहीं देगा और औपचारिक मीडिया को उसे उठाना अपरिहार्य हो जाता है। आज किसी मंत्री या अफसर की बीवी की हिम्मत नहीं है कि चपरासी से बदतमीजी या मारपीट करवा कर बच जाय। जन-संवाद में तो यह मुद्दा आयेगा हीं। और प्रजातंत्र में अभी हालत इतने खराब नहीं हुए हैं कि मंत्री और अफसर सहज रह पायें।

Pin It