मोदी के भारत में उपजे अंतर्विरोध

अब जबकि वर्ष 2017 दस्तक दे चुका है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बीते साल की अपनी रीति-नीतियों पर नजर डालते होंगे तो कुछ संतोष-सा महसूस करते होंगे। यह बात अलग है कि उनके द्वारा की गई नोटबंदी की वजह से बैंकों के बाहर जो लंबी-लंबी कतारें लगी हैं, उससे छोटे व्यापारियों और दिहाड़ी मजदूरों को बहुत कुछ सहना पड़ा है।

सवाल यह है कि जिस तरह का बदलाव मोदी भारत में लाना चाहते हैं, वह दरअसल है क्या? दरअसल उनकी यह परिकल्पना एक ऐसी रूढि़वादी सोच पर टिकी है, जिसकी जड़ें आगे हिंदू धर्म के दीगर विश्वासों में धंसी हुई हैं और वह खुद इस तरह के नेता बने हुए हैं मानो ऑर्केस्ट्रा समूह में बैंड का निर्देशन करने वाले कोई संगीतकार हों। उनका ऐसा व्यवहार यह भी दर्शाता है किस तरह वे एक सोची-समझी कार्यपद्धति के तहत अपने काम को अंजाम देने में लगे हैं। यदि सरकारें चलाने के आधुनिक तरीके में गपोड़-गल्पों को गढऩे का सहारा लेना पड़ता है तो मोदी इस काम में जुटे हुए हैं। नई सरकार को जरूरत पड़ी थी गुजरे जमाने के उन प्रतीक पुरुषों को अपनाने की, जिनका सम्मान आज भी लोग करते हैं। इस सिलसिले में सबसे पहले महात्मा गांधी को चुना गया। हालांकि ये वही थे जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू को देश का भावी नेता घोषित किया था। धर्म-निरपेक्षता और आधुनिक सोच वाले नेहरू को आरएसएस की विचारधारा एक अभिशाप मानती रही है। इसलिए जाहिर है उनकी अगली पसंद कांग्रेस सरकार में नंबर दो के पद पर रहे सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे ग्रामीण अंचल से आए नेता थे और जिन्हें लौह-पुरुष भी कहा जाता था। उन्हें दूसरे प्रतीक पुरुष के रूप में अपनाया गया। इसके अलावा इतिहास के मशहूर चरित्रों को भी जननायकों की तरह अपनाया गया, जैसे कि हाल ही में चुनावी कारणों से महाराष्ट्र में शिवाजी को। एक अति वैभवशाली चिन्ह स्वरूप मुंबई बंदरगाह पर उनकी गगनचुंबी प्रतिमा बनाने का ऐलान किया गया है। यह बात अलग है कि इसकी स्थापना से मछुआरों और मछली-प्रजनन के काम पर विपरीत असर पड़ेगा। मोदी की कोशिश यूं तो खुद को एक सादगी पसंद नेता दर्शाने की रहती है लेकिन मौका जब प्रतीक पुरुषों का महिमामंडन करके लाभ उठाने का आता है तो वे किसी भी सीमा तक पैसा खर्च करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाते। मोदी-सेना की कार्ययोजना का तीसरा पहलू यह है कि धुआंधार प्रचार करते हुए अपने नेता के शब्दों और चित्रण से रेडियो, टेलीविजन, सोशल साइट्स और प्रिंट मीडिया को संतृप्ता की हद तक पाट दिया जाए क्योंकि मोदी यह भली भांति जानते हैं कि युवा पीढ़ी परंपरागत मीडिया से शायद कम जुड़ती है और रोजमर्रा की जानकारी के लिए इंटरनेट पर निर्भर है।
यह मौसम उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार का है, इसलिए कतिपय टेलीविजन चैनल भी चारण की भांति उनका पूरे-का-पूरा भाषण प्रसारित कर रहे हैं। मोदी जो भी संदेश देते हैं, उसे बारंबार मीडिया पर दोहराया जाता है। भले ही उसका असर हो या ना हो। मसलन ‘नोटबंदी अमीरों के खिलाफ और गरीबों के हित में है’ और ‘किसने अमीरों से रसोई गैस की सब्सिडी वापस लेकर उसे गरीबों में बांटा है?’, यह भी ‘चूंकि मोदी अन्य अमीरजादे नेताओं की अपेक्षा गरीबों और वंचितों की समस्याओं से ज्यादा अच्छी तरह वाकिफ हैं, इसलिए वे इन बहुसंख्यकों के दर्द को मिटाने के लिए ज्यादा संवेदनशीलता से काम करने का उद्देश्य रखते हैं’, इत्यादि-इत्यादि। मोदी के महिमामंडन के इस धुआंधार प्रचार अभियान को विपक्ष की आपसी फूट और विरोधी नेताओं के तुनकमिजाज स्वभाव से और भी ज्यादा बल मिल जाता है। उधर, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी यह जान लेना चाहिए कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति की जरूरतें उनके राज्य में खेले जाने वाले ‘चौपड़ की सडक़’ खेल में इस्तेमाल होने वाली रणनीति से काफी अलहदा होती हैं। यह विपक्ष की नितांत गलती थी जब उसने संसद के शीतकालीन अधिवेशन को केवल इस जिद पर अड़े रहने की वजह से नहीं चलने नहीं दिया कि पहले यह बताया जाए कि चर्चा कौन-से नियमों की तहत करवाई जाएगी। अगर भाजपा खुद को पाक-साफ दर्शा रही है तो यहां यह भी याद रखना चाहिए कि विपक्ष में उसने यही भूमिका निभाई थी। उत्तर प्रदेश विधानसभा का जो भी नतीजा होगा, मोदी के लिए स्थितियां फिलहाल आसान बनी हुई हैं। चुनावी रैलियों में भाषणबाजी करने के अलावा वे रेडियो पर मासिक संवाद करने का अपना क्रम जारी रखे हुए हैं और इस पर विपक्ष का यह सवाल उठाना प्रासंगिक है कि क्योंकि यह जनता को संबोधित किए जाने वाला एक राजनीतिक प्रकृति का भाषण है, इसलिए विपक्ष के प्रवक्ता को भी इसका जवाब देने का उतना ही हक बनता है। कांग्रेस अभी भी अपनी दीर्घकालीन नीति नहीं बना पायी है। समाजवादी पार्टी जो कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की युवा छवि का फायदा उठाकर अत्यधिक सुदृढ़ प्रतिभागी बनने की कूवत रखती थी वह अब फिलहाल पारिवारिक झगड़े में उलझी है। जहां तक मायावती का सवाल है वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अन्य शक्तिशाली विपक्षी नेता हैं। फिलहाल उनसे 8 नवंबर के बाद बैंकों में पार्टी के प्रतिबंधित नोट जमा करवाने की वैधता को लेकर जवाब देते नहीं बन रहा। मोदी और उनके सहयोगी ऊपर से जो आत्मविश्वास दिखा रहे हैं, उसके नीचे दरअसल मनोवैज्ञानिक दुविधा यह है कि वे अपने विचारों का उस आधुनिक डिजिटल युग के साथ तालमेल बिठा नहीं पा रहे, जिसका प्रतिपादन खुद मोदी बड़े जोशो-खरोश के साथ किया करते हैं। मोदी की सोच का भारत बनाने का विचार अभी निर्माणाधीन है। वह छुटपन से ही आरएसएस के आंगन में पले-बढ़े होने की वजह से इसके विचारों से काफी ओतप्रोत हैं लेकिन पहले गुजरात का मुख्यमंत्री और अब देश के सर्वोच्च पद पर रहते हुए वे अपने में काफी बदलाव लाये हैं।

Pin It