मोदी की कठिनाइयां आखिर दूर कैसे हों?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक नये अवतार के रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिससे उनकी पुरानी लोक छवि जो वर्तमान युग के परिप्रेक्ष्य में राजनैतिक रूप से सार्थक और उपयोगी नहीं हो रही है, उससे मुक्ति का एक रास्ता यह भी है कि विवादित प्रश्नों पर बिना बोले या राय व्यक्त किये छुट्टी पा ली जाये। इसी क्रम में भाजपा अध्यक्ष व प्रधानमंत्री के निकटस्थ और विश्वसनीय अमित शाह ने दादरी काण्ड में उन मंत्रियों को बुलाया, फोन किया, समझाया और डांटा कि वे अपने पूर्वकालिक बयानों को दोहरायें नहीं बल्कि उससे परहेज करें।

शीतला सिंह
प्रश्न उठता है कि आज की राजनीतिक आवश्यकताओं के विभाजन की निस्सारता और स्वीकार्यता को जनता तो उस समय भी अपनाने को तैयार नहीं हुई जब यह रक्तपात, हिंसा और उससे जन्मी त्रासदी से ग्रस्त था इसलिए अब इन परिवर्तनों को हमें स्वीकार करके आगे बढना होगा। इसीलिए तो हम जिन्हें मानते थे कि यह दूसरी विचारधारा हमारे साथ नहीं रह सकती, अब उसमें नये संशोधन और परिवर्धन करने के साथ विश्वास के लिए अब अपनी पार्टी की सदस्यता में भी उस वर्ग को अस्वीकार्य बताने से बचें, इसलिए नया नारा ‘सबका साथ, सबका विकास’ गढ़ा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक नये अवतार के रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिससे उनकी पुरानी लोक छवि जो वर्तमान युग परिप्रेक्ष्य में राजनैतिक रूप से सार्थक और उपयोगी नहीं हो रही हैं, उससे मुक्ति का एक रास्ता यह भी है कि विवादित प्रश्नों पर बिना बोले या राय व्यक्त किये छुट्टी पा ली जाय। इसी क्रम में भाजपा अध्यक्ष व प्रधानमंत्री के निकटस्थ और विश्वसनीय अमित शाह ने दादरी काण्ड में उन मंत्रियों को बुलाया, फोन किया, समझाया और डांटा कि वे अपने पूर्वकालिक बयानों को दोहरायें नहीं बल्कि उससे परहेज करें। मोदी की घोषणाओं की रक्षा के लिए उससे परहेज करें। इस रूप में सोम, बलियान, महेश शर्मा और साक्षी महराज को झिडक़ी के साथ दी गई राजनीतिक सीख कितना स्थायी और स्वीकार्य होगी, अब इसका परीक्षण किया जा रहा है।
प्रश्न इस बात का है कि आखिर भाजपा नाम का संगठन जो 1952 के भारतीय जनसंघ की गतियों, इतिहासों एवं पुराना चोला त्यागने और नया ओढने की कसरत करने वाला है, आर.एस.एस. उसका आनुषांगिक संगठन है, जिसका पुराना स्वरूप तो ‘अखण्ड भारत’ बनाने की घोषणा के साथ पाकिस्तान का अस्तित्व स्वीकार करने से भी परहेज करने वाला था। अब तो प्रधानमंत्री की शपथ लेते समय पड़ोसी प्रधानमंत्रियों की भागीदारी यह दिखाने के लिए आवश्यक मानी जाती है कि हम तो पड़ोसियों के साथ अच्छे सम्बन्धों के लिए उत्सुक हैं, उन्हें गले लगाने के लिए उतावले और विभाजन के फलस्वरूप उपजी विसंगतियों से मुक्ति के लिए प्रयत्नों में साझीदार हैं। इसलिए हमें मिलकर नये विश्व की कल्पना करनी चाहिए। सहअस्तित्व भले ही उन पुराने नेताओं की देन हो जिनको हम देश हित के प्रतिकूल बताते हैं लेकिन उसे युगीन आवश्यकता मानते हैं। इसीलिए तो हम मोहनदास करमचन्द गांधी और सरदार बल्लभ भाई पटेल को भी कन्धे पर बिठाकर अपना बना कर यह बताना चाहते हैं कि यह तो मान्य और स्वीकार्य नेता हैं।
प्रश्न उठता है कि आज की राजनीतिक आवश्यकताओं के विभाजन की निस्सारता और स्वीकार्यता को जनता तो उस समय भी अपनाने को तैयार नहीं हुई जब यह रक्तपात, हिंसा और उससे जन्मी त्रासदी से ग्रस्त था इसलिए अब इन परिवर्तनों को हमें स्वीकार करके आगे बढऩा होगा। इसीलिए तो हम जिन्हें मानते थे कि यह दूसरी विचारधारा हमारे साथ नहीं रह सकती, अब उसमें नये संशोधन और परिवर्धन करने के साथ विश्वास के लिए अब अपनी पार्टी की सदस्यता में भी उस वर्ग को अस्वीकार्य बताने से बचें, इसलिए नया नारा ‘सबका साथ, सबका विकास गढ़ा’।
पुराने विचारों से मुक्ति और नई की स्वीकारोक्ति के मार्ग की बाधाएं दूर होने में समय भी लगता है और कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री मोदी प्रकरण की निन्दा करते हैं, तो वे यह संदेश देना चाहते हैं कि हमारा पुराना नहीं नया स्वरूप और परिधान देखो तथा स्वीकार करो तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसके विभिन्न अंगों के राजनैतिक रूप में उनकी राजनैतिक पार्टी मानी जाती है, उसके मुखपत्र में यह विचार प्रकट किये जाते हैं कि ‘गोहत्यारे की हत्या की जानी चाहिए’। यह केवल उस पत्र में ही नहीं गांव, देहात, सडक़ों, गलियों की दीवारों पर भी नारों के रूप में उल्लिखित मिलता है लेकिन अब इससे बचने और नकारने का क्या रास्ता हो तो भाजपा की ओर से सफाई आती है कि यह समाचारपत्र हमारी पार्टी का नहीं है साथ ही पत्र के सम्पादक की ओर से यह सफाई दी जाती है कि यह हमारा नहीं, बल्कि लेखक के विचार हैं लेकिन लेखक छटक कर अलग खड़ा हो जाता है कि हमने तो उसे लिखा ही नहीं।

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