मोदी का दौरा भी नहीं बदल पाया चीन की हठधर्मिता को

वस्तुत: तडक़-भडक़ से भरा और पर्यटन स्थल की सैर वाला यह दौरा उन मुद्दों को हल करने में सफल नहीं रहा जो दोनों देशों के बीच मतभेद का प्रमुख कारण है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री ली कछियांग के साथ बातचीत में मोदी ने सीमा विवाद को रेखांकित किया। यह दुनिया का सबसे लंबा अनिर्णीत सीमा विवाद है।

ब्रह्मा चेलानी
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अपनी परियोजनाओं, सीमा विवाद और दक्षिण चीन सागर के बारे में चीन की ओर से दिए गए हाल के बयानों से साफ है कि उसके रवैये में कहीं कोई बदलाव नहीं आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन दौरा एक राजनयिक दांव था। उनका लक्ष्य था- चीन भारत समीकरण में बुनियादी बदलाव।
प्रधानमंत्री मोदी ने तर्क दिया है कि 21वीं सदी एशिया की है और यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि विश्व की दो-तिहाई आबादी वाले दो देश- ‘भारत और चीन’ अपने यहां कितनी प्रगति करते हैं। लेकिन अपनी चुनावी जीत की पहली वर्षगांठ के समय मोदी का यह दौरा इस बात की याद दिलाने के लिए था कि शिखर सम्मेलनों में भारत-चीन सौहार्द वास्तविकता से अधिक दिखावटी है, लेकिन चीन का दौरा करने वाले पहले के भारतीय प्रधानमंत्रियों की तरह मोदी भी खाली हाथ लौटे। वस्तुत: तडक़-भडक़ से भरा और पर्यटन स्थल की सैर वाला यह दौरा उन मुद्दों को हल करने में सफल नहीं रहा जो दोनों देशों के बीच मतभेद का प्रमुख कारण है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कछियांग के साथ बातचीत में मोदी ने सीमा विवाद को रेखांकित किया। यह दुनिया का सबसे लंबा अनिर्णीत सीमा विवाद है। सन् 2006 से चीनी सेना की बढ़ती घुसपैठ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ की अस्पष्टता के कारण संवेदनशील हिमालयी इलाकों पर ‘अनिश्चितता की छाया’ मंडरा रही है जो चीन ने मनमर्जी से तब खींच ली थी जब उसने 1962 में भारत को पराजित किया था। उन्होंने घोषणा की कि इसलिए मैंने इसे स्पष्ट करने की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव दिया है। लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। करीब दो दशकों तक सीमा पर बातचीत के बाद 2002 में चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा स्पष्टीकरण प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया। उसने हिमालय के दोनों तरफ स्थित मुख्य विवादित क्षेत्रों के नक्शों की अदला-बदली से इंकार कर दिया।
इनमें एक है अक्साई चिन समेत लद्दाख जो स्विट्जरलैंड के आकार का पठारी इलाका है और दूसरा है आस्ट्रिया के आकार का भारत की म्यांमार सीमा से सटा अरुणाचल प्रदेश जिस पर दावा ठोकने में 2006 से वह अधिक सक्रियता दिखा रहा है। वैसे, चीनी सैन्य घुसपैठ 4057 किलोमीटर लंबी हिमालयी सीमा के अधिकांश हिस्से में हो रही है। मोदी शी के साथ व्यक्तिगत दोस्ती की बात कहते तो हैं, फिर भी वह किसी मुद्दे पर चीनी पक्ष को अपने साथ लाने में सफल नहीं हो पाए।
आदान-प्रदान कूटनीति का पहला सिद्धांत होता है, फिर भी छूट भारतीय पक्ष से दी गई है। उदाहरण के लिए, भारतीय सुरक्षा तंत्र को दरकिनार कर मोदी ने घोषणा की कि चीनी पर्यटक भारत आने पर इलेक्ट्रानिक वीजा पाने के अधिकारी होंगे। यह अरुणाचल प्रदेश के निवासियों को नत्थी वीजा जारी किए जाने की चीनी नीति के बावजूद उसे इनाम दिए जाने जैसा कदम है। नत्थी वीजा दिया जाना अरुणाचल प्रदेश पर भारत की संप्रभुता पर सवालिया निशान है। प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा को चीन के विदेश मंत्री ने ‘उपहार’ कहा, लेकिन अचानक की गई इस घोषणा से अपने सचिव भी भौंचक रह गए। उन्होंने थाड़ी देर पहले ही मीडिया से कहा था कि इस तरह का कोई फैसला नहीं लिया गया है। सितम्बर में शी के दौरे के समय भी मोदी तिब्बत पर दबाव में आ गए थे। पवित्र कैलाश मानसरोवर का दौरा करने वाले भारतीय तीर्थ-यात्रियों के संदर्भ में बीजिंग के संयुक्त बयान में ‘चीन के तिब्बत स्वायत्त’ का जिक्र किया गया। छिन्न-भिन्न तिब्बत के लिए ‘तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र’ चीन का सरकारी नाम है हालांकि क्षेत्र में कुछ भी स्वायत्त नहीं है। वहां सीधे बीजिंग से शासन चलाया जाता है। तिब्बत को चीन का हिस्सा बताया जाना 2010 से जारी भारत की उस पुनरीक्षित नीति को नकारना है जिसमें यह बात तय की गई थी कि किसी संयुक्त बयान में तब तक इस तरह का जिक्र नहीं किया जाएगा जब तक चीन भारत के नक्शे को बदरंग करने का क्रम जारी रखता है। इस तरह दबने की जगह बीजिंग का रवैया भारत को समायोजित करने का था। संयुक्त बयान में प्रोत्साहन के तौर पर कहा गया कि चीन ने परमाणु आपूर्ति संगठन का ‘सदस्य बनने की भारत की इच्छाओं पर ध्यान दिया’ और वह सुरक्षा परिषद समेत संयुक्त राष्टï्र में बेहतर भूमिका निभाने की भारत की इच्छाओं को समझता और समर्थन देता है।

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