मुस्लिम नेताओं ने ठुकरा दी थी आरक्षण की पेशकश

कुलदीप नैयर
जब आजादी मिली तो विभिन्न समुदाय के नेताओं को देश की निष्पक्षता में इतना भरोसा था कि उनमें से कोई भी आरक्षण नहीं चाहता था। मुस्लिम नेताओं ने सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 15 प्रतिशत आरक्षण की तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल की पेशकश को ठुकरा दिया था। उनका कहना था कि आरक्षण एक संकरी सोच को बढ़ावा देता है। अलग-अलग निर्वाचक मंडल के कारण देश को बंटवारे के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।
कानून मंत्री बीआर अम्बेडकर, जो खुद दलित थे, ने कहा कि उनका समुदाय पूरी जिंदगी बैसाखी के सहारे नहीं गुजारना चाहता है। बहुत दबाव के बाद, अम्बेडकर को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए दस साल तक आरक्षण देने की बात पर राजी किया गया। उन्हें पता नहीं था कि आरक्षण एक स्थाई सुविधा बन जाएगा क्योंकि इससे वोट बैंक बनता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सैकड़ों साल के बाद जाति हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है। दलित (अछूत) अभी भी सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर हैं। यह एक खुली सच्चाई है कि ग्रामीण इलाकों में दलितों की अलग बस्तियां हैं। भारत में एक बहस शुरू हो गई है कि आरक्षण पर फिर से विचार की जरूरत है या नहीं?
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की सलाह ने यथास्थिति को ऐसा झकझोर दिया है कि भाजपा ने खुद को इस प्रस्ताव से अलग कर लिया है कि आरक्षण पर अलग से विचार हो। अभी भी उनकी ही बात चलती है जिनके स्वार्थ जुड़े हैं। बहुत से दलितों ने भेदभाव से बचने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन कुछ लोग यह देख डर गए कि भेदभाव का पट्टा जो एक बार उनके पास आ गया वह जाति विहीन इस्लाम में भी कायम रहा।
सच है कि कई घोषणाओं, जिसमें से कुछ अदालतों की थीं, ने इस बात की ओर इशारा किया कि कम से कम मलाईदार तबके को आरक्षण नहीं मिले लेकिन वे सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले और प्रभावशाली हैं। इसी से पता चलता है कि पूरे संघ परिवार में आरएसएस प्रमुख क्यों अकेले दिखाई देते हैं। भाजपा शासित राजस्थान सरकार के ऊंची जाति के गरीबों को आरक्षण देने से उनकी निराशा बढ़ गई होगी। यह मानवीय व्यवहार देखने में अच्छा है लेकिन यह उनके खिलाफ है जो संविधान निर्माताओं के दिमाग में था। उन्होंने सिर्फ दलितों को आरक्षण दिया था क्योंकि हिंदू समाज ने सैकड़ों साल से उन्हें उन चीजों से वंचित रखा था जो उन्हें मिलना चाहिए था। यह एक तरह का पछतावा था जिसने सुविधा का रूप ले लिया।
ऊंची जाति में उस समय भी गरीब लोग थे लेकिन जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल, दोनों ने संविधान सभा को इसके लिए मना लिया कि जो ज्यादतियां हुईं वे उनका प्रायश्चित करें। राज्य सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश का उल्लंघन कर रहे हैं कि आरक्षण को 50 प्रतिशत की सीमा नहीं लांघनी चाहिए। दुर्भाग्य से यह रोग फैल रहा है। आज यह देखकर हंसी आती है कि एक संपन्न व्यापारी तबका, आरक्षण की मांग कर रहा है। पटेल जैसी ऊंची जाति के लिए आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे विद्रोही हार्दिक पटेल के साथ गुजरात की सरकार, जो भाजपा की है, कड़ाई से पेश आ रही है। बाकी राज्य इसे ध्यान में रख रहे हैं कि राजस्थान और गुजरात दोनों कोटा रख पाते हैं या नहीं क्योंकि उनके दिमाग में भी वही चीज है। नरेन्द्र मोदी सरकार को भाजपा शासित राज्यों, खासकर राजस्थान, की खबर लेनी चाहिए थी क्योंकि हमारा संघीय ढांचा ढह जाने के खतरे का सामना कर रहा है। मोदी सरकार को एक अलग किस्म का भरोसा है कि जब बुरे दिन होंगे तो मुख्यत: हिन्दू आबादी वाले राज्य हद तक नहीं जाएंगे।
शायद बिहार के चुनावों के बाद मोदी अनुशासन का चाबुक चलाएंगे। वहां मतदान में कुछ सप्ताह ही बाकी हैं, ऐसे समय में किसी भी कदम का परिणाम उलटा हो सकता है और भाजपा और भाग्य को नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन समय आ गया है जब राजनीतिक पार्टियों को साथ मिलकर जाति और पंथ के आधार पर आरक्षण पर सोचना चाहिए। सिर्फ दस साल के लिए बनी एक संवैधानिक व्यवस्था स्थाई ही पाई है। इसे जारी रखने का संविधान-संशोधन जब संसद के सामने आता है तो सभी पार्टियां इसका समर्थन करती हैं।
एक देश जिसकी प्रस्तावना में सेकुलरिज्म शब्द है उसे जाति की जंजीर तोडऩी चाहिए। समाजवाद के लिए जरूरी है कि जाति का बंधन खत्म हो। सत्ता में बैठी भाजपा को एक कानून लाना चाहिए जो आर्थिक हैसियत के आधार पर कसौटी बनाए। एक गरीब ब्राह्मण एक दलित से कम योग्य नहीं है। मुसलमानों के बारे में क्या? सच्चर कमेटी ने यह बताया है कि उनकी हालत दलितों से भी खराब है। देश पर नरम-हिंदुत्व का असर होने के कारण अल्पसंख्यकों के भविष्य पर ज्यादा से ज्यादा सवाल खड़े हो गए हैं।

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