मुसलमानों की धारणा है वे हर क्षेत्र में लड़ाई हार रहे हैं

बंटवारे के समय भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू खुद ही कनाट सर्कस गए थे और कुछ लुटेरों की पिटाई उस छोटे डंडे से की थी जो उनके पास रहता था। एएमयू के छात्र यह नहीं समझते कि धार्मिक आधार पर पहचान के कारण देश का
विभाजन हुआ।
-कुलदीप नैयर

अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी (एएमयू) से निराश और परेशान लौटा हूं। मैं इसलिए निराश हुआ हूं कि ऐसा नहीं लगता कि छात्र अभी तक मुख्य धारा में शामिल हुए हैं और परेशान इसलिए कि वे अभी तक धार्मिक पहचान की भाषा में ही बात कर रहे हैं।
शायद, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को सरकारी तौर पर मुस्लिम यूनिवर्सिटी घोषित कर देने से उन्हें अपनी मुस्लिम पहचान में जीने का काल्पनिक सुख मिले। उर्दू समेत हर क्षेत्र में लड़ाई हार जाने के कारण मुसलमान दु:खी हैं। यह कहीं से गलत नहीं है कि मुसलमानों को यह महसूस करने दिया जाए कि उनकी अपनी एक पहचान है, लेकिन भारत में रहने वाले की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह भारतीय है। अलीगढ़ ही वह जगह है जहां देश विभाजन के पहले मौलाना अबुल कलाम आजाद की बेइज्जती की गई थी। लडक़ों ने उन्हें अपने ट्रेन के एक डिब्बे में ढूंढ लिया था। वह अपने शहर से दिल्ली होकर कलकत्ता की ओर जा रहे थे। लडक़ों ने कपड़े उतार लिए थे और छी-छी करके उनका जितना भी हो सकता था उतना अपमान किया।
उनका दोष सिर्फ इतना था कि वे मुस्लिम लीग से मतभेद रखते थे और उन्होंने पाकिस्तान की स्थापना का विरोध किया था। उनका कहना था कि बंटवारे की मांग इस गलत धारणा पर टिकी है कि हिंदुओं के भारी बहुमत से बचने का यही उपाय है। लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद भारत में मुसलमानों की स्थिति और भी खराब हो जाएगी। इसके अलावा, हिंदु यह कहेंगे कि तुमने अपना हिस्सा ले लिया, अब पाकिस्तान जाओ। करीब-करीब यही हुआ।
बंटवारे के समय भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू खुद ही कनाट सर्कस गए थे और कुछ लुटेरों की पिटाई उस छोटे डंडे से की थी जो उनके पास रहता था। एएमयू के छात्र यह नहीं समझते कि धार्मिक आधार पर पहचान के कारण देश का विभाजन हुआ। विभाजन के बाद उसी तरह की राजनीतिक दोहराई नहीं जा सकती और अलगाव की बात करने वाले मुसलमानों को नुकसान होगा। अस्सी प्रतिशत की आबादी वाले हिंदु वही पुरानी बात को बर्दाश्त नहीं करेंगे। मुझे लगता है कि कुल मिलाकर मुसलमानों ने अपने जीवन में नया अध्याय शुरू किया है और वे मुख्यधारा का हिस्सा बनना चाहते हैं। वे सांप्रदायिक दरार पैदा करने वाली बातों का खतरा समझते हैं। हिंदु और मुसलमानों के बीच दंगे अंत में मुसलमानों और पुलिस के बीच के दंगे में बदल जाता है। यही बात लगभग सभी मामलों में दिखाई देती है।
लेकिन, यह मुख्यधारा ही है जो उन्हें ज्यादा जगह नहीं दे रही थी। एक नरम हिंदुत्व देश में अपना प्रभाव बना चुका है। यह मुसलमानों को और भी डरा रहा है। दिल्ली के जामिया मिलिया में उनके कुछ लोगों से बातचीत करने पर मैंने यही पाया कि वे हिंदुत्व समर्थकों की संख्या बढऩे से डरे हुए हैं क्योंकि ये हिंदुत्व समर्थक उनके अधिकारों की जरा भी परवाह नहीं करते।
मैं इस संदर्भ में अमेरिकी कांग्रेस की ओर से गठित कमेटी की रिपोर्ट को महत्वपूर्ण समझता हूं। कुछ मामूली बातों को जोड़ देने की वजह से इस रिपोर्ट की उपयोगिता कम हो गई है, नहीं तो अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग ने उचित ही कहा है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों को आरएसएस जैसे समूहों के हिंसक हमलों, धर्मातरण और घर वापसी अभियान झेलना पड़ा है।
यह दुर्भाग्य की बात है कि रिपोर्ट को सरकार की ओर से खारिज कर दिया गया है। देश को इस पर बहस करनी चाहिए थी। इसमें थोड़ी सच्चाई है कि हिंदुओं और मुसलमान के रिश्तों में जो संतुलन कई बरसों में हमने विकसित किया था वह मोदी सरकार के सत्ता में आने से बिगड़ गया। हिंदुओं में ऊंचे होने और मुसलमानों में असुरक्षा की भावना है। सच है, मजबूती की बात यह है कि समीकरण इस तरह विकसित हुए हैं कि संबंध कितना भी कमजोर क्यों न हो यह पूरी तरह टूटा नहीं है।
हो सकता है कि दोनों समुदाय ने इस जमीनी सच्चाई से समझौता कर लिया हो और आपस में एक समझ बना ली है जो कभी-कभार उभर आए संकट से समय एक दूसरे के काम आ जाती है।
आरएसएस, जिसने इसमें हिंसा जोड़ी है या ज्यादा से ज्यादा इसकी धमकी, की वजह से मामला थोड़ा तेज धारवाला हो गया है। यह संगठन जो महात्मा गांधी की हत्या के बाद पीछे की सीट पर चला गया था अपना कुरूप सिर फिर से उठा रहा है और उस गोडसे की याद में मूर्ति स्थापित करना चाहता है जिसने गांधी जी की हत्या की थी। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस पार्टी ने देश को सेकुलर बनाया है लेकिन इसकी विचारधारा सेकुलर है और इसने उस समय भी आवाज उठाई है जब सांप्रदायिक शक्तियों की ताकत बढ़ रही है। मोदी सरकार के बारे में एक और राय यह है कि प्रशासन में सांप्रदायिक तत्वों को ताकत मिली है।
संभव है मुसलमानों में यह समझ विकसित हो गई हो कि उन्हें बहुसंख्यकों के साथ रहना है, चाहे कितना भी असंभव क्यों न हो। शायद दोनों अपनी-अपनी अलग दुनिया में रहते हैं। दोनों के बीच सामाजिक संपर्क बहुत कम रह गया है। लेकिन दोनों के बीच हर समय मौजूद रहने वाला जो तनाव महसूस होता था वह करीब-करीब जा चुका है। यहां तक कि पाकिस्तान के खिलाफ दुश्मनी जो रोज की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी, वह पहले से कम है। आम आदमी ने पाकिस्तान के लोगों के प्रति अपनी मित्रता की भावना कभी नहीं छोड़ी। लेकिन अब सरकारों ने भी समझ लिया है कि उस चीज पर क्यों वक्त बर्बाद किया जाए, जो बिकती नहीं है। इसकी काफी संभावना है कि दोनों ओर के लोग बातचीत के लिए मेज पर आएंगे।

दोनों तरफ के पंजाबी इतने सांप्रदायिक हैं कि वे उस सूफी संस्कृति का महत्व नहीं समझते जो दोनों तरफ की धार्मिक भावनाओं का मिश्रण है। पाकिस्तान सरकार का यह आरोप एकदम गलत है कि भारत जम्मू और कश्मीर में आबादी का स्वरूप बदलना चाहता है।

कश्मीरी पंडितों की कश्मीर में वापसी का स्वागत होना चाहिए। मुसलमानों के साथ उनका मेल दोनों समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली कश्मीरियत का सबूत है। यहां तक कि कट्टरपंथी सैयद अली शाह गिलानी को छोड़ कर अलगाववादी भी अपने बीच पंडितों की उपस्थिति की वकालत इस आधार पर करते हैं कि वे समाज के अभिन्न हिस्सा थे।

वास्तव में कश्मीरियत की ताकत यही है कि वह सेकुलर भावना पर आधारित है। अलीगढ़ के मुसलमानों को कश्मीर के किताब का पन्ना लेना चाहिए और धार्मिक आधार पर पहचान बनाने की भावना को रोकने का तरीका सीखना चाहिए।

 

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