मुलायम सिंह यादव ने कैसे पहचान लिए दादरी के दोषी?

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
ऐसा लगता है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव अपनी पार्टी के लिए 25 वर्ष पुराना वह इतिहास दोहराना चाहते हैं जब सत्ता में रहते हुए भी विधानसभा की 425 सीटों में से कुल 32 पर ही उन्हें सफलता मिली थी। यह कयास इसलिए लगाने का अवसर मिला है क्योंकि दादरी के विसहेड़ा गांव में मोहम्मद अखलाक की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या को ‘सोची समझी साम्प्रदायिक उन्माद’ पैदा करने वालों का आरोप लगाने वालों की जमात में वे भी शामिल हो गए हैं। विसहेड़ा की घटना पर लम्बी चुप्पी तोडऩे पर उन्हें ‘वे ही तीन व्यक्ति’ इसके साजिशकर्ता के रूप में दिखायी पड़े जो मुजफ्फरनगर दंगों के लिए दोषी हैं।

यद्यपि अदालत ने अभी तक किसी को दोषी नहीं ठहराया है और जल्दबाजी में नाकाम रहने के बावजूद किसी गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को प्रत्यक्ष दोषी नहीं माना है तथापि मुलायम सिंह को तीन ‘असली’ साजिशकर्ताओं का इल्हाम हो चुका है। गौतमबुद्धनगर के अधिकारियों पर साजिश का मुकदमा दायर करने का दबाव बढ़ाया जा रहा है जो केवल धारा 144 का उल्लंघन करने का अभियोग दर्ज करना चाहते हैं। अपनी चुप्पी तोड़ते हुए मुलायम सिंह ने ताल ठोक कर कहा है कि वे साम्प्रदायिकता से जूझते रहेंगे भले ही इसके कारण उनकी सरकार ही क्यों न चली जाय। ऐसा कहते समय शायद उन्हें 25 वर्ष पूर्व का संज्ञान रहा हो, लेकिन उनके रूख से यह भी स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता की उनकी समझदारी का परिणाम क्या होता है।
समाजवादी वैसे ही सशंकित हैं जैसा 1990 में हुए थे। कुछ मुस्लिम नेताओं ने पहली बार लोकसभा में उत्तर प्रदेश से एक भी मुसलमान न चुने जाने पर चिंता व्यक्त की है। यदि मुलायम सिंह और उनकी पार्टी की साम्प्रदायिकता की वही समझदारी बनी रही तो इस बात की पूरी संभावना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे कम संख्या में या फिर लोकसभा के समान एक भी मुसलमानों के न चुने जाने का मुद्दा चर्चित हो। विसहेड़ा में अल्पसंख्यक की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या जो अफवाहजनित त्वरित उत्तेजना का परिणाम थी, को गहन तक साजिश की ओर खींचने से सभी राजनीतिक दल भाजपा और संघ के खिलाफ जिस प्रकार मुखरित हैं उसमें उत्तर प्रदेश के एक मंत्री आजम खां ने नागपुर में रचे हुए षडय़ंत्र और भारत सरकार के गृह मंत्रालय की भागीदारी का पुट डाल दिया।
जो लोग मुजफ्फरनगर के दंगे के विसहेड़ा की घटना को जोड़ रहे थे उन्हें मुलायम सिंह यादव की अभिव्यक्ति से प्रोत्साहन जरूर मिला होगा और यह प्रोत्साहन ध्रुवीकरण के लिए प्रयत्नशील लोगों को और अधिक सक्रियता भी प्रदान करेगा। क्योंकि मुलायम सिंह यादव जैसे ‘समझदार’ राजनीतिकर्ता ने विसहेड़ा को मुजफ्फरनगर से जोड़ दिया है, इसलिए इस जुड़ाव की वास्तविकता को समझना भी जरूरी है। मुजफ्फरनगर में दो भाइयों ने अपनी बहन से छेडख़ानी करने वाले एक मुस्लिम युवक को पीट-पीटकर मार डाला। युवक के परिजनों ने उन दोनों भाईयों को मार डाला। इस आरोप में मुस्लिम युवक के कुछ परिजन पर प्रहार हुए। जिस थाने में वे बंद थे उसके इंस्पेक्टर ने कैमरे के सामने स्वीकार किया कि प्रभारी मंत्री (यानि आजम खां) के फोन पर उन्हें छोडऩा पड़ा। यही नहीं तो जो हिन्दू युवक मारे गए उनके परिजनों को घर-घर से पकडक़र बंद कर दिया गया। यदि प्रभारी मंत्री का हस्तक्षेप न हुआ होता तो शायद वैसी अमानवीयता न प्रगट होती जैसी हुई।
अब विसहेड़ा। गौ मांस खाने की एक अफवाह फलस्वरूप इकत्रित भीड़ ने हमला बोलकर मोहम्मद अखलाक को मार डाला। इस घटना के बावजूद उस गांव में तनाव की स्थिति नहीं थी। न अखलाक के परिजनों में और न गिरफ्तार किए गए युवकों के परिवार में। लेकिन जयों-ज्यों वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में राजनीतिक दलों के नेताओं ने वहां जाकर साजिशन हत्या को हवा दी और मीडिया ने टीआरपी बढ़ाने की होड़ में प्रतिक्रियाओं की झड़ी लगा दी माहौल बदलने लगा।
आरोप प्रत्यारोपों के इस दौर में उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया अखिलेश यादव को यह समझ में आया कि ‘साम्प्रदायिक ताकतों’ पर अपनी सरकार को असफल बनाने की साजिश रचने का आरोप लगाकर प्रशासनिक अराजकता और राजनीतिक लूटपाट से पिटी सरकार को बचाने का उपयुक्त हथियार मिल गया। जिस शांति व्यवस्था की सम्पूर्ण जिम्मेदारी राज्य की है उसके बिगडऩे का आरोप उन्होंने केंद्र पर थोपना शुरू कर दिया है। लेकिन वे और समाजवादी परिवार के मुखिया यह भूल गए कि ‘यह पब्लिक है जो सब समझती है’।

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