मुख्यमंत्री का आदेश ताक पर जम कर बांटी जा रही पंजीरी

आंगनबाड़ी केन्द्रों में पंजीरी बांटने पर 2012 में लगाई गई थी रोक
Captureविभाग में आधिपत्य जमाये अधिकारी तीन साल से चहेती फर्म को पहुंचा रहे लाभ
भ्रष्टाचार के खिलाफ महिला कर्मचारियों ने खोला मोर्चा

प्रभात तिवारी
लखनऊ। सूबे के मुखिया अखिलेश यादव का आदेश ताक पर रखकर आंगनबाड़ी केन्द्रों पर पंजीरी का वितरण हो रहा है। बच्चों को पोषाहार देने के नाम पर विभागीय मंत्री और अधिकारी तीन साल से सरकार को हजारों करोड़ रुपये का चूना लगा रहे हैं। ये लोग अपनी चहेती फर्मों को ठेका देकर और उनसे मिलने वाले कमीशन से अपनी जेबें भर रहे हैं। जबकि विभाग से जुड़ी पौने चार लाख आंगनबाड़ी महिलाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है। इस संबंध में प्रमुख सचिव से लेकर मुख्यमंत्री तक से शिकायत की जा चुकी है लेकिन महिला हितों की सुरक्षा को लेकर कोई भी गंभीर नहीं है।
महिला एवं बाल विकास विभाग में महिला कर्मचारियों की संख्या पौने चार लाख है। इस योजना को प्रदेश के 72 जिलों में संचालित किया जाता है। इसमें कुल 821 विकास खण्डों के अंतर्गत आने वाले गांवों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। सरकार एक लाख 53 हजार आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों को बांटे जाने वाले पोषाहार पर प्रतिवर्ष 7000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। इसमें आंगनबाड़ी केन्द्रों पर सप्लाई होने वाली पंजीरी को बच्चे बिल्कुल भी नहीं छूते हैं। इस बात को हम सभी अच्छी तरह जानते हैं। इसलिए विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से सारी पंजीरी बाजार में बेच दी जाती है। इसके बाद पंजीरी से मिलने वाली रकम को अधिकारी आपस में बांट लेते हैं। अमूमन तो विभागीय अधिकारी पोषाहार की कालाबाजारी का आरोप आंगनबाड़ी कर्मचारियों पर लगाते रहे हैं लेकिन मुख्यमंत्री की तरफ से रोक लगाये जाने के बाद भी पंजीरी वितरण जारी रहने से असली गुनहगारों का चेहरा सामने आ चुका है। ऐसा लग रहा है प्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़े इतनी मजबूत हो चुकी हैं कि मुख्यमंत्री का आदेश भी भ्रष्ट अधिकारियों के हौसलों को पस्त नहीं कर पा रहा है। इसी वजह से विभाग में उच्चाधिकारियों की शह पर तीन साल से लगातार चहेती फर्मों को लाभ पहुंचाने की खातिर आंगनबाड़ी केन्द्रों पर पंजीरी का वितरण कराया जा रहा है। इसके साथ ही कुछ खास एनजीओ के माध्यम से स्कूलों में हाटकुक्ड योजना के तहत पोषाहार देने की व्यवस्था भी शुरू की गई है। जिसकी गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है। सरकार मामले की जांच कराने और दोषियों का पता लगाने पर करोड़ो रुपये खर्च कर रही है। ऐसे में विभागीय अधिकारियों की हठधर्मिता और सरकार की इच्छाशक्ति का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। सरकारी खजाने से साला हजारों करोड़ रुपये बच्चों को पोषाहार देने के नाम उड़ाये जा रहे हैं, जबकि किसी भी बच्चे को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

वाहन उपलब्ध कराने के नाम पर कमाई
यूनिसेफ संस्था की तरफ से बाल विकास परियोजना अधिकारियों को निरीक्षण के लिए जीप उपलब्ध कराई जाती थी। इस वाहन का प्रशासनिक अधिकारियों की तरफ से दुरुपयोग करने की शिकायत मिलने लगीं। इस कारण यूनिसेफ ने जीप देना बंद कर दिया। अब प्रदेश सरकार अपनी तरफ से आंगनबाड़ी केन्द्रों का निरीक्षण करने के लिए बाल विकास परियोजना अधिकारियों को वाहन की सुïिवधा उपलब्ध कराती है। इसमें नियमानुसार हर सप्ताह आंगनबाड़ी केन्द्रों का निरीक्षण किया जाना चाहिए लेकिन निरीक्षण कर्ताओं को केवल तीन महीने के लिए वाहन मिलता है, वह भी जनवरी से लेकर मार्च के आखिर तक। जबकि निदेशालय में बैठे अधिकारी 12 महीने वाहन से निरीक्षण करने का कागज बनाकर भुगतान करवाते हैं। इस संबंध में आंगनबाड़ी कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी प्रमुख सचिव से लिखित शिकायत भी कर चुके हैं। इसके बावजूद फर्जी कमाई करने वालों पर रोक नहीं लग पा रही है।

साक्ष्यों को मिटाने की साजिश
बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार निदेशालय में 10 मई 2015 को आग लगी थी। इस हादसे को विभाग में मौजूद आवश्यक फाइलों को मिटाने की साजिश माना जा रहा है। इसी वजह से प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेशानुसार पोषाहार के नाम पर होने वाले घोटाले की जांच की जा रही है। इसमें आग लगने के कारणों का भी पता लगाया जा रहा है। इसके बावजूद आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ आग लगने के कारणों की जांच सीबीसीआईडी से कराने की मांग कर रही है। इसका मकसद विभागीय घोटालों और घटनाओं के पीछे की हकीकत सामने लाना है।

स्थानान्तरण नीति का दुरुपयोग
बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार निदेशालय में बैठे अधिकारियों पर स्थानान्तरण नीति के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया गया है। इसमें भ्रष्टाचार में सहयोग नहीं करने वाले कर्मचारियों का जबरन स्थानान्तरण करने और स्थानान्तरण नीति को ताक पर रखकर मनमानी करने वाले अधिकारियों की शिकायत की गई है। इसके साथ ही 2012 से अब तक विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों के स्थानान्तरण की जांच कराने की मांग शामिल है। इसकी सबसे बड़ी वजह विभाग में निदेशक के पद पर पिछले तीन साल से जमे आनन्द कुमार सिंह पर गंभीर आरोप लगने के बाद भी कार्रवाई नहीं होना है। संघ ने इसी अधिकारी पर कर्मचारियों का स्थानान्तरण करने और कर्मचारियों का शोषण करने का आरोप भी लगा है। इन सबसे बावजूद प्रदेश सरकार की तरफ से गंभीर आरोपों में लिप्त निदेशक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह सरकार की मंशा स्पष्ट करती है।

पंजीरी उपलब्ध कराने वाली फर्में
प्रदेश के एक लाख 53 हजार आंगनबाड़ी केन्द्रों पर पोषाहार उपलब्ध कराने वाली कुछ छह फर्में हैं। इसमें मैसर्स ग्रेट वैल्यू फूड्स प्राइवेट लिमिटेड, त्रिकाल फूड्स प्राइवेट लिमिटेड, कान्टीनेन्टल फूड्स प्राइवेट लिमिटेड और बालाजी फूड्स प्राइवेट लिमिटेड प्रमुख हैं। इसके अलावा दो अन्य फर्म भी हैं। इन सभी फर्मों के ठेकेदार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनका मालिक सूबे में कैबिनेट मंत्री की हैसियत रखने वाला एक बिजनेसमैन है। पोषाहार के नाम पर सरकारी खजाने से 7000 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष लुटाने वाली सरकार की नाक के नीचे कमाई का कालाधंधा खुलेआम चल रहा है। इसमें अपनी चहेती फर्म को ठेका देकर और उनसे कमीशन लेकर राजनेता, शासन और प्रशासन स्तर के अधिकारी अपनी जेबें भर रहे हैं।

शिकायत पर भी नहीं हुई कार्रवाई
महिला आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ ने साक्ष्यों के साथ पोषाहार की कालाबाजारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ शिकायत की थी। इसके बावजूद शासन स्तर से उन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। संघ ने जिला कार्यक्रम अधिकारी उन्नाव, जिला कार्यक्रम अधिकारी फैजाबाद, जिला कार्यक्रम अधिकारी इलाबाद, जिला कार्यक्रम अधिकारी महाराजगंज, जिला कार्यक्रम अधिकारी
कुशीनगर, जिला कार्यक्रम अधिकारी बलरामपुर, जिला कार्यक्रम अधिकारी कौशाम्बी और जिला कार्यक्रम अधिकारी बलिया के खिलाफ लिखित शिकायत की है। इसकी जांच चल रही है।

Pin It