मुख्यमंत्री का आदेश ताक पर, केजीएमयू में नियुक्ति के लिए भटक रहे संविदाकर्मी

  • तो क्या अदालत का आदेश भी नहीं मानता केजीएमयू प्रशासन
  • मुख्यमंत्री और अन्य पिछड़ावर्ग आयोग के आदेशों का उड़ाया जा रहा है माखौल

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक अधिकारी शायद खुद को अदालत और मुख्यमंत्री के आदेशों से भी ऊपर समझते हैं। इसी वजह से मुख्यमंत्री तथा अदालत के आदेशों को अमल में लाना तो दूर उसको सुनना भी नहीं चाहते हैं। इसकी ताजा नजीर यह है कि करीब 10 वर्षों से मेडिकल कालेज में संविदा कर्मी (सुरक्षा गार्ड) के पद पर कार्यरत कर्मचारियों को स्पष्ट नियुक्ति आदेश के बावजूद अभी तक रेगुलर कर्मचारी के रूप में भर्ती नहीं किया गया है। मेडिकल कालेज के इस गैर जिम्मेदाराना रवैये के चलते संविदा कर्मियों ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव से न्याय की गुहार लगाई है।
गौरतलब है कि संस्थान के विभिन्न विभागों में अन्य पिछड़ा वर्ग के संविदा कर्मचारी सिक्योरिटी गार्ड के रूप में पिछले एक दशक से ज्यादा समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इस संबंध में 9 सितंबर 2014 को कर्मचारियों की तरफ से मुख्यमंत्री से अनुरोध किया था, जिसमें मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा न्यायालय के आदेश और राज्य पिछड़ा वर्ग के आदेश पर प्रभावी कार्रवाई के लिए लिए मेडिकल कालेज को निर्देशित किया गया है। लेकिन केजीएमयू प्रशासन के आलाधिकारियों ने आदेश पर कोई अमल नहीं किया। इसके बाद 10 अक्टूबर 2014 को पुन: मुख्यमंत्री कार्यालय ने संबंधित विषय पर बिन्दुवार परीक्षण कराये जाने के साथ ही संबंधित प्रकरण में बिलंब के लिए दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों को दंडित करने का निर्देश दिया। इस आदेश का भी केजीएमयू प्रशासन ने पालन नहीं किया। वह लगातार मुख्यमंत्री और शासन की तरफ से मिले निर्देशों की अवहेलना कर रहा है। इससे करीब 27 संविदा कर्मियों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। उनकी रेगुलर कर्मचारी के पद पर नियुक्ति नहीं की जा रही है। जबकि उन्ही के साथ विभाग में संविदा कर्मचारी के पद पर भर्ती होने वाले करीब 8 कर्मचारियों को रेगुलर कर दिया गया है।
प्रशासनिक अधिकारियों का तानाशाही रवैया
सवाल इस बात का है कि अदालत, पिछड़ा वर्ग आयोग तथा मुख्यमंत्री के आदेशों की अवहेलना कर संस्थान के आलाधिकारी क्या संदेश देना चाहते हंै। क्या केजीएयू प्रशासन खुद को इन सब संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर मानता है ? या फिर केजीएयू प्रशासन मुख्यमंत्री और शासन की तरफ से आने वाले आदेशों का पालन कराने में इसी प्रकार की लापरवाही बरतता है। फिलहाल हकीकत जो भी हो, संविदा कर्मियों की रेगुलर कर्मचारी के रूप में नियुक्ति के मामले में दो स्थितियां उजागर हो गई हैं। इसमें अधिकारियों की तानाशाही और लापरवाही दोनों ही स्थितियां सर्वथा अक्षम्य हैं। वहीं संविदा कर्मी मुख्यमंत्री का आदेश और शासन की तरफ से स्पष्ट निर्देश जारी होने के बाद भी रेगुलर कर्मचारी के पद पर नियुक्ति न मिल पाने की वजह से दोराहे पर खड़े हैं। संस्थान में इनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। संविदा कर्मियों का कहना है कि जब उन्हें अदालत, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग और सूबे के मुखिया मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद न्याय नहीं मिल पा रहा है, तो अब गुहार करने के लिए बचता ही कौन है? नियुक्ति के मामले में हो रहे विलंब से संविदा कर्मियों के मन में तमाम तरह की आशंकाएं घर कर चुकी हैं। उनका आरोप है कि हमें नियुक्ति न देने की वजह अन्य पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक होना है। जबकि संस्थान में अभी भी तमाम पदों के लिए नियुक्तियां की जा रही हंै।

मेरी जानकारी के अनुसार जिन संविदा कर्मचारियों को रेगुलर कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया जाना था। उनको यहां की कार्यपरिषद ने ही नियुक्त करने के लिए कहा था, लेकिन किसी कारणवश उनकी नियुक्ति नहीं हो पाई थी। उसके बाद वो सभी कर्मचारी हाईकोर्ट गये थे। हाईकोर्ट ने यह कहा था कि विभाग में संविदा के पद पर होने वाली नियुक्तियों में इन कर्मचारियों को स्वीकार किया जाये। नियुक्ति करने वाली कमेटी ने इनको स्वीकार भी किया, लेकिन ये कर्मचारी उस पद के लिए योग्य नहीं पाये गये। उसके बाद सात से आठ लोगों को पिछड़ा वर्ग आयोग के आदेश के आधार पर नियुक्ति दे दी गई। बाकी लोग दोबारा कोर्ट चले गये। इस मामले में अभी तक आदेश नहीं आया है, आदेश के अनुसार कार्रवाई की जायेगी।
उमेश मिश्रा,
कुलसचिव,केजीएमयू

Pin It