मुआवजा या मजाक

हर साल विशेष बजट मिलने के बावजूद भी बुंदेलखंड की हालत में कोई सुधार नजर नहीं आ रहा है। इन हालातों से प्रदेश सरकार जब वाकिफ है तो निश्चित ही जिला प्रशासन को इसकी जानकारी बखूबी होगी। फिर भी जिला प्रशासन किसानों के साथ ऐसी हरकत करता है तो यह हास्यास्पद है।

sanjay sharma editor5जिस तरह से बुंदेलखंड में जिला प्रशासन की ओर से किसानों के साथ मुआवजे के नाम पर भद्ïदा मजाक किया गया है वह बेहद ही शर्मनाक है। मुआवजे के नाम पर किसानों को 23 व 28 रुपए का चेक दिया गया। यह बात समझ से परे है कि जिला प्रशासन ने किस हिसाब से किसानों में 23 व 28 रुपए के चेक वितरित किये। बेहिसाब महंगाई से परेशान और प्राकृतिक आपदा की मार से आहत किसानों के घाव पर मरहम लगाने के बजाय उनके साथ जिला प्रशासन ने भद्ïदा मजाक किया। पिछले तीन साल से बुंदेलखंड सूखे से जूझ रहा है। किसानों की स्थिति बहुत ही दयनीय हो गई है।
यह भी बड़ा सच है कि प्रदेश के अन्य जिलों की अपेक्षा बुंदेलखंड पिछड़ा इलाका है। यहां के किसान प्रकृति की मार से ज्यादा परेशान रहते हैं। यहां के किसानों के समक्ष अनेक समस्याए हैं। इसे देखते हुये बुंदेलखंड के लिए केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक विशेष बजट देती है, ताकि वहां के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाया जा सके। लेकिन हर साल विशेष बजट मिलने के बावजूद भी बुंदेलखंड की हालत में कोई सुधार नजर नहीं आ रहा है। इन हालातों से प्रदेश सरकार जब वाकिफ है तो निश्चित ही जिला प्रशासन को इसकी जानकारी बखूबी होगी। फिर भी जिला प्रशासन किसानों के साथ ऐसी हरकत करता है तो यह हास्यास्पद है। कुछ दिनों पहले ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि बुंदेलखंड के किसानों के साथ सरकार खड़ी है। उनकी हर संभव मदद की जाएगी। कोई किसान कर्ज के बोझ से आत्महत्या नहीं करेगा।
यहां सवाल उठता है कि एक तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव किसानों की मदद का आश्वासन दे रहे हैं और वहीं दूसरी ओर जिला प्रशासन किसानों को आर्थिक सहायता के नाम पर 23 से 28 रुपए बांट रहा है। यदि किसान चेक को बैंक में लगाते हैं तो उसके लिए उन्हें 30 रुपए किराए के नाम पर खर्च करना पड़ेगा। इससे साफ जाहिर है कि बेबश किसानों की तकलीफ से प्रशासन बेपरवाह है। इससे प्रशासन की लापरवाही झलकती है कि वह किसानों की समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं है। यह अजीब विडंबना है कि प्रदेश में किसी-किसी के लिये मदद के नाम पर सरकारी खजाना खोल दिया जाता है और जिसे वास्तव में मदद की दरकार है उनके साथ लापरवाही बरती जा रही है। बांदा की यह घटना निश्चित ही प्रदेश सरकार के उन दावों पर सवाल खड़े करती है जिसमें सरकार किसानों के साथ खड़े होने की वकालत करती है।

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