मिशन उत्तर प्रदेश को पूरा करने में जुट गयी भाजपा

वैसे पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने पर एकराय नहीं बना पा रहा है क्योंकि राज्य के चुनावी इतिहास में पार्टी ने जब जब मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़ा है तब तब पार्टी की सीटें पहले से कम हो गयी हैं।

नीरज कुमार दुबे
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा यह जानने की उत्सुकता जनता और अन्य दलों में जितनी ज्यादा होती जा रही है उतनी ही मुश्किल भाजपा की ‘चयन’ करने में बढ़ती जा रही है। 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सभी प्रमुख दल अपनी अपनी तैयारियां शुरू कर चुके हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अपने अधिकतर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है और इन दोनों दलों की ओर से तय है कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा, कशमकश है तो सिर्फ भाजपा को लेकर जहाँ ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली स्थिति है। कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के बारे में खुद पार्टी ही रुचि नहीं दिखा रही है क्योंकि उसे पता है कि राज्य की सत्ता में वापसी उसके लिए अभी दूर की कौड़ी है लेकिन पार्टी प्रयासों में कमी नहीं रखना चाहती इसलिए प्रशांत किशोर की टीम को चुनावी रणनीति बनाने का काम सौंपा गया है।
भाजपा नेताओं ने संकेत दिये थे कि इलाहाबाद में होने वाली पार्टी की राष्टï्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के बारे में निर्णय किया जा सकता है। पार्टी नेता बीच बीच में नामों की अफवाह उड़ाकर उस पर प्रतिक्रिया देख ले रहे हैं ताकि निर्णय करने में आसानी हो। सबसे पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का नाम चलाया गया जिसका राज्य के पार्टी नेताओं ने कड़ा विरोध किया और सोशल मीडिया पर भी इस संभावित निर्णय का मजाक उड़ाया गया। कुछ समय पहले राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह का नाम चलाया गया लेकिन इस नाम से उत्तर प्रदेश के भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच कोई उत्साह नहीं देख केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नाम की चर्चा चलायी गयी। अपने नाम की चर्चा से ठीक पहले राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश में दो-तीन रैलियों को संबोधित कर चुके थे इससे अटकलों को बढ़ावा मिला लेकिन खुद राजनाथ सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश में ऐसे बहुत से योग्य नेता हैं जिन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जा सकता है।
राजनाथ सिंह जानते हैं कि वह वर्तमान में केंद्रीय गृहमंत्री के पद पर ज्यादा ‘सेफ’ हैं और यदि वह उत्तर प्रदेश आते हैं तो अपनी ही पार्टी के नेता उन्हें राजनीतिक रूप से ‘निपटाने’ के लिए सक्रिय हो जाएंगे। राजनाथ सिंह के बारे में माना जाता है कि उनके भले अन्य दलों के नेताओं से बहुत अच्छे संबंध हों लेकिन मुख्यमंत्री रहते वह खुद अपनी ही पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच अलोकप्रिय हो गये थे। प्रदेश में उनसे वरिष्ठ कई ऐसे नेता हैं जोकि राजनाथ सिंह की लगातार तरक्की को पसंद नहीं कर पाये और राजनीतिक मजबूरियों के चलते उन्हें सिंह के मातहत काम करना पड़ा। खुद राजनाथ भी तब तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में वापस नहीं जाएंगे जब तक की मुख्यमंत्री पद सुनिश्चित नहीं हो। वैसे भाजपा की बेहतर संभावनाओं के लिए राजनाथ सिंह ही सबसे उपयुक्त चेहरा हो सकते हैं। उनकी छवि दागदार नहीं है और उन्हें लंबा प्रशासनिक अनुभव है। उनका राजनीतिक कद बसपा मुखिया मायावती और अखिलेश यादव से बड़ा माना जाता है।
संभावना जतायी जा रही है कि राजनाथ सिंह की अनिच्छा को देखते हुए पार्टी उन्हें चुनाव प्रचार कमेटी का चेयरमैन नियुक्त कर सकती है ताकि उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा सके। यदि पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आई तो राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बन जाएंगे और यदि पार्टी सरकार बनाने में विफल रहती है तो राजनाथ सिंह केंद्र में बने रहेंगे। वैसे पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने पर एकराय नहीं बना पा रहा है क्योंकि राज्य के चुनावी इतिहास में पार्टी ने जब जब मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़ा है तब तब पार्टी की सीटें पहले से कम हो गयी हैं। पार्टी को इस बात की भी चिंता है कि जातिगत राजनीति के बोलबाले वाले प्रदेश में किस जाति के व्यक्ति को नेतृत्व दिया जाए।
पार्टी ने हालाँकि जातिगत समीकरणों को देखते हुए ही पिछड़ा वर्ग से जुड़े केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी। बुजुर्ग नेताओं को केंद्रीय मंत्रिमंडल में नहीं रखने का अघोषित नियम कलराज मिश्र पर लागू नहीं किया गया और सर्वण समुदाय से जुड़े शिव प्रताप शुक्ला को राज्यसभा उम्मीदवार बना कर सभी को चौंकाया गया क्योंकि केंद्रीय राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की दावेदारी पर ही मुहर लगने की संभावना थी लेकिन उन्हें झारखंड भेज दिया गया। पार्टी ने हाल ही में दलित विरोधी बयान देने वाली महिला मोर्चा की प्रमुख को भी तत्काल पद से हटा दिया था। देखना होगा कि भाजपा अपनी ओर से जो जो समीकरण बैठा रही है वह राजनीतिक रूप से कितना फायदेमंद रहते हैं। फिलहाल तो निगाहें पार्टी की राष्टï्रीय कार्यकारिणी की बैठक में होने वाले फैसलों पर हैं।

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